प्रदूषण के लिए कार वाले कितने गुनहगार?

  • 9 दिसंबर 2015
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दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर एक बार फिर बेचैनी और नाराज़गी है.

अभी ठीक से ठंड पड़ भी नहीं रही है, लेकिन राजधानी में वायु प्रदूषण ख़तरनाक़ स्तर तक पहुंच गया है.

दुनिया के सबसे प्रदूषित इस शहर पर नाइट्रोजन ऑक्साइड, ओज़ोन, बेंजीन, कार्बन मोनो ऑक्साइड और सल्फ़र डाई ऑक्साइड के ज़हरीले कॉकटेल के अलावा आसानी से फेफ़ड़ों में पहुँचने वाले पार्टिकुलेट मैटर का घना बादल है.

खराब होती हवा की गुणवत्ता के साथ ही इसे लेकर लोगों में ग़ुस्सा बढ़ रहा है.

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विदेशी चिंतित हैं. ख़बरें हैं कि नॉर्वे बढ़ते वायु प्रदूषण के चलते दिल्ली को सबसे 'कठिन पोस्टिंग' वाली जगह के रूप में अधिसूचित करने पर विचार कर रहा है.

दिल्ली में एक अंतरराष्ट्रीय स्कूल ने अपने छात्रों की आउटडोर गतिविधियां रद्द कर दी हैं और एक अदालत ने पूछा है कि क्या दिल्ली ‘गैस चेंबर’ में तब्दील हो चुकी है.

हम सब जानते हैं कि दिल्ली की ख़राब हवा की वजह क्या है: डीज़ल का धुआं, इमारतों के निर्माण से उठने वाली गर्द, ईंट भट्ठे और शहर के चारों ओर फ़सल जलाना.

दिल्ली की मौजूदा 85 लाख गाड़ियों में हर दिन 1400 नई गाड़ियां जुड़ रही हैं और यही प्रदूषण का मुख्य स्रोत है.

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ईंधन पर सब्सिडी का मतलब है, अधिक डीज़ल गाड़ियों की ख़रीद.

2012 के एक अध्ययन में बीमार फ़ेंफ़ड़ों वाले बच्चों की बड़ी तादाद मिली थी. सर्दियों में सालाना अस्पतालों के इमरजेंसी वार्ड में सांस की तकलीफ़ से जुड़े अनुपात से ज़्यादा मामले आते हैं.

हमें पता है कि क़रीब 15 साल पहले दिल्ली ने काफ़ी हद तक हवा को साफ़ किया था.

प्रदूषक उद्योग शहर से बाहर किए गए, दुनिया की सबसे बड़ी सीएनजी चालित सार्वजनिक यातायात प्रणाली शुरू हुई, व्यावसायिक वाहनों की उम्र 15 साल तय की गई और कड़ा उत्सर्जन मानक यूरो-4 लागू किया गया.

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साथ ही, मेट्रो के साथ साइकिल ट्रैक बने. इस कवायद से शहर की आबोहवा बदली.

लेकिन क़रीब आठ साल पहले इस सुधार पर पानी फिरना शुरू हो गया और दिल्ली वायु प्रदूषण के दूसरे चरण की मुश्किल लड़ाई भूल गई.

पिछली सर्दियों में दिल्ली के सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट (सीएसई) ने अक्टूबर और दिसंबर के बीच स्मॉग (धुंध) के '12 मौक़े' पहचाने, जब लगातार तीन दिन धुंध रही.

इस दौरान सबसे ख़तरनाक पीएम2.5 प्रदूषण का स्तर 250 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ज़्यादा रहा जो स्थानीय मानकों से चार गुना अधिक था.

इस साल अक्टूबर के पहले सप्ताह से अब तक पीएम2.5 का स्तर मानक से सात गुना बढ़ गया है.

दूसरी तरफ़ चीन के बीजिंग शहर ने उत्सर्जन मानकों को और कड़ा किया है, कारों की संख्या घटाई है, डीज़ल कारों पर रोक लगाई है और आपात कार्रवाई की है.

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सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉयचौधरी के मुताबिक़, ''हम प्रदूषण से निपटने में नाकाम रहे. कोई आक्रामक नीति नहीं अपनाई गई है.''

शहर की हवा को साफ़ रखने के लिए सार्वजनिक परिवहन में सुधार, मेट्रो स्टेशनों के आसपास ट्रैफ़िक कम करने और दूरदराज के इलाक़ों से स्टेशनों को जोड़ने की ज़रूरत है.

गाड़ियों पर कंजेशन टैक्स लागू करने और पार्किंग को महंगा करने से शहर की कार की लत कम की जा सकती है.

इसके अलावा डीज़ल पर सब्सिडी को कम करना या डीज़ल गाड़ियों पर भारी टैक्स लगाना इसमें मदद कर सकता है.

ज़्यादा प्रदूषण वाले दिन सरकार को आपात कार्रवाई करनी चाहिए.

तो इस बार बढ़ते प्रदूषण के चलते दिल्ली कर क्या रही है?

जैसा होता है, इस बार भी उहापोह वाली स्थिति है.

मीडिया में हंगामे और जजों की नाखुशी के बाद दिल्ली सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक दिन छोड़कर सम-विषम नंबर प्लेट वाली गाड़ियों को सड़क पर चलाने की योजना पेश की.

बहुत से लोग इसे बिना सोची समझी रणनीति क़रार दे रहे हैं.

कोई नहीं जानता कि क़रीब एक करोड़ 80 लाख आबादी वाले इस शहर में यह योजना कैसे लागू होगी.

हालांकि सरकारी प्रस्ताव में कुछ गंभीर क़दम उठाने की भी बात है, जैसे बिजली संयंत्र बंद करना, वैक्यूम क्लीनर से सड़कों की सफ़ाई, ट्रकों की आवाजाही पर रोक और कुछ सड़कों पर पार्किंग पर प्रतिबंध.

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Image caption (फ़ाइल फ़ोटो)

पर्यावरण मामले देखने वाले वकील रित्विक दत्ता के मुताबिक़, ''जैसे ही सर्दियां और जनवरी ख़त्म होगी, चीजें पहले जैसी हो जाएंगी. तब कोई भी प्रदूषण को लेकर बात नहीं करेगा.''

हवा साफ़ रखने में दिल्ली की नाक़ामी, सुधार लागू करने में समस्या की ही एक बानगी है क्योंकि कठिन फ़ैसलों के लिए आक्रामक योजना चाहिए.

केवल एयर प्यूरिफ़ायर्स और मास्क के इस्तेमाल से समस्या हल नहीं होगी.

दिल्ली और बाक़ी भारत को स्वच्छ हवा से जुड़े एक समग्र क़ानून पर सोचने की ज़रूरत है. यह क़ानून 1981 का है और ठीक से लागू नहीं हुआ.

एक वकील के मुताबिक़ इस क़ानून के तहत अभी तक एक भी सज़ा नहीं हुई है. हालांकि इसके उल्लंघन पर कम से कम 18 महीने की सज़ा का प्रावधान है.

सरकारों ने भी सब्सिडी में कटौती से हाथ खींचा, जिसका फ़ायदा अंततः अमीरों को हुआ.

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रॉयचौधरी कहती हैं, ''सभी राजनीतिज्ञ अलोकप्रिय फ़ैसलों पर जनता के ग़ुस्से से डरते हैं.''

इस समस्या के अन्य पहलू भी हैं.

कई लोगों को लगता है कि दिल्ली का प्रदूषण पड़ोसी राज्यों और शहरों में पहुँचता है. पिछले हफ़्ते नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सरकार से पूछा था कि क्या दिल्ली की पुरानी गाड़ियां कम प्रदूषित शहरों में भेजी जा सकती हैं?

बहुतों का मानना है कि चौड़ी सड़कें और तंग फ़ुटपाथों वाली दिल्ली ग़रीबों के लिए नहीं है.

यहां केवल 10 प्रतिशत निवासी ही कार से काम पर जाते हैं. अधिकांश कार मालिक सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं.

ये भी तथ्य है कि दिल्ली में ग़रीबों के लिए सस्ते मकानों (18 से 25 वर्ग किलोमीटर) से ज़्यादा जगह एक कार की पार्किंग (25 वर्ग किलोमीटर) को दी जाती है.

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मीडिया भी इसमें मददगार नहीं है. जब पड़ोसी पंजाब में किसान खेतों में पुआल जलाते हैं तो इसकी बहुत कम कवरेज होती है कि दिल्लीवासियों पर इसका क्या असर हो रहा है.

बढ़ता वायु प्रदूषण एक राष्ट्रीय आपदा है, पर मीडिया और नीति निर्धारक इसे सिर्फ़ दिल्ली की समस्या के रूप में देखते हैं.

दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 13 भारत में हैं, तो 12 के बारे में क्या हो रहा है?

दत्ता के अनुसार, ''दिल्ली बाक़ी देश के लिए चेतावनी होनी चाहिए. बाक़ी को नज़रअंदाज़ करना या पड़ोसी राज्यों में प्रदूषण भेजना आत्मघाती होगा.''

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