काश, जयललिता भी सड़कों पर निकलतीं..

क़रीब 60 लाख की आबादी वाले एक शहर का आधा हिस्सा बारिश में डूब जाता है. कई इलाक़ों में दूसरी मंज़िल तक पानी भरा होता है और लोग जान बचाने के लिए छतों से गिड़गिड़ा रहे होते हैं.

अस्पतालों में दवाइयाँ और कथित तौर पर ऑक्सीजन कम पड़ने से मरीज़ों की मौत होती है और कई नवजात शिशुओं का जन्म सड़कों पर होता है.

70 एमएम के पर्दे पर चमकीले भड़कीले दिखने वाले करोड़पति तमिल सुपरस्टारों के घरों में सीवर का पानी बेडरूम में जमा हो रहा होता है.

इस सबके बीच 250 से ज़्यादा लोग बेमौसम बरसात और बाढ़ का शिकार हो चुके होते हैं. ये वर्ष 2015 का भारत है और शहर है तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई.

इसके बावजूद, शहर कुछ ही दिनों बाद मदद की बैसाखी त्याग कर अपने पैरों पर चलने की कोशिश में है.

इस सब का पता लगाना उतना ही आसान है जितना मुश्किल इस बेमौसम बरसात की पेचीदगियों में जाना.

चेन्नई शहर के बाशिंदों ने न सिर्फ़ पूरे भारत बल्कि दूसरे मुल्क के लोगों के सामने भी एक ऐसा उदाहरण पेश किया है जिसे दोबारा न ही दिखाना पड़े तो अच्छा. सरकार और प्रशासन तो हर प्रदेश में, हर ज़िले में, आपदा के समय पूरी हरकत में होते हैं.

लेकिन चेन्नई का आम आदमी अगर पिछले एक हफ़्ते से हरकत में नहीं होता तो शायद राज्य सरकार हलकान हो चुकी होती.

अमीर-गरीब में फ़र्क ख़त्म होते पहली बार देखा जब चार पांच फुट पानी में दोनों अपने हाथों में अनजान लोगों के लिए खाना, पानी और कपडे लिए खड़े दिखे.

मर्सिडीज़ और बीएमडब्लू जैसी महंगी कारों वाले भी बारिश में अपने घरों से राशन लेकर वैसे ही बाहर निकले जैसे कोई गरीब बस्ती वाला अपने पडोसी के लिए निकलता है.

कमाल की बात ये रही कि ज़्यादातर लोगों ने मुझे मना किया कि उनका नाम न दिया जाए और तस्वीर न खींचीं जाए.

"हम सिर्फ वॉलंटियर है इसलिए कृपया फोटो मत खींचिए. हम कुछ भी ख़ास नहीं कर रहे है."

खाने का पैकेट बांटना हो या कम्बल या सैनिटरी नैपकिन, कोई कसर किसी भी चेन्नई वाले ने शायद ही छोड़ी हो.

बड़ी मिन्नतें करनी पड़ीं एक बड़ी महंगी गाड़ी से कपडे और खाने उतारने वाली मीनाक्षी से ये जानने में कि वे टी-नगर इलाके में अपनी 'मेड, उसके पति और बच्चों की सुध लेने आईं थीं'.

फ़िल्मी सितारे इडली सांभर बांटने सड़कों पर थे और आम आदमी अपनी छत का सहारा अनजानों को दे रहा था.

बतौर एक रिपोर्टर कई आपदाएं कवर करनी पड़ीं हैं लेकिन यहाँ जो देखा हैं वो अविस्मरणीय है.

सोचता हूँ कि अगर जयललिता, करूणानिधि, दयानिधि मारन जैसे कई और 'लोकप्रिय' लोग भी अपने घरों से बाहर मदद के लिए आए होते तो कितना बेहतर रहता?

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