दिल्ली में फुटपाथ कितने लोगों का बसेरा?

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सत्तर वर्षीय राम बहादुर पिछले तीन दशकों से भी ज़्यादा से दिल्ली की सड़कों पर रह रहे हैं.

वो कहते हैं कि दुनिया में अब उनका कोई नहीं है. ना बीवी बच्चे, ना रिश्तेदार ना कोई दोस्त. उनकी तरह ही फुटपाथ पर जीवन बसर करने वाले अब उनके कुछ साथी हैं.

वो ज़िंदगी से हर रोज़ एक जंग लड़ रहे हैं. जंग है ज़िंदा रहने की. वो मायूस भी हैं और कहते हैं कि अब उनकी ज़िंदगी बस चंद दिनों की है क्योंकि वो अपने जीवन का बड़ा हिस्सा काट चुके हैं.

"सत्तर साल का हो गया हूँ. अब और कितने दिन बचे हैं ? बस अब, तब की बात है, और मैं चल दूंगा".

अनुमानों के अनुसार राम बहादुर की तरह ही दिल्ली की सड़कों पर गुज़र बसर करने वालों की संख्या तीन लाख से भी ज़्यादा है. इनमें महिलाओं और बच्चों की संख्या भी काफ़ी है.

यह वो लोग हैं जो अपना पेट पालने के लिए हर रोज़ मशक़्क़त करते हैं. कूड़ा चुनते हैं, शादी ब्याहों में प्लेट साफ़ करते हैं और मज़दूरी करते हैं.

जिनके हाथ पाँव सलामत हैं, वो तो किसी तरह गुज़ारा कर लेते हैं. मगर, जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं, उनकी ज़िंदगी बहुत ही मुश्किल है.

इन्हीं में से एक हैं राजेंद्र, जो दिल्ली रोज़गार की तलाश में आए थे लेकिन एक सड़क दुर्घटना में उन्होंने अपनी बाईं टांग गंवा दी.

निगमबोध घाट के पास यमुना नदी के किनारे वो खुले आसमान के नीचे सोते हैं.

बीबीसी से बात करते हुए राजेंद्र कहते हैं, "कबाड़ चुनने जा रहा था तभी सड़क पार करते हुए एक मोटरसाइकल सवार ने टक्कर मार दी. वो तो मार के भाग गया मगर मैं घायल हालत में वहीं पड़ा रह गया. किसी ने मदद नहीं की....न पुलिस वालों ने ना आने जाने वालों ने..."

वो बताते हैं, "फुटपाथ पर पड़े-पड़े पैर के ज़ख्म में कीड़े पड़ गए. कोई जानने वाला मुझे उन सरदारजी के पास उठा कर ले गया जो ग़रीबों के बीच रोज़ खाना बांटते हैं. उन्हीं सरदार जी ने मुझे अस्पताल में भर्ती करवाया मगर तब तक मेरा पैर सड़ चुका था और उसे काटने की नौबत आ गई."

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शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे जगदीश शर्मा की भी कहानी राजेंद्र जैसी है. एक तो ग़रीबी की मार, और उस पर शारीरिक अक्षमता. अब इन्हें पता नहीं कि क्या करें.

बस अड्डे के पास मेरी मुलाक़ात राजेंद्र दुबे से हुई जो किसी व्यवसायी के कहने पर रोज़ फुटपाथ पर रहने वाले बेघरों को खाना खिलाते हैं. राजेंद्र कहते हैं कि वो पिछले 10 साल से दिल्ली में अपने एक परिचित के चलाए जा रहे प्रोग्राम के तहत बेघरों के लिए भोजन का इंतजाम कर रहे हैं.

वो कहते हैं कि उन्होंने कभी सरकारी महकमे के किसी कर्मचारी को इनकी सुध लेते नहीं देखा.

सूचना के अधिकार के लिए काम करने वाले नंदलाल का कहना है कि कश्मीरी गेट और यमुना के पुस्ता के नज़दीक सबसे ज़्यादा बेघर लोग रहते है. उसी तरह वो कहते हैं कि हर साल कश्मीरी गेट थाने में सबसे ज्यादा बेघरों की मौतें दर्ज की जाती हैं.

नंदलाल का कहना है कि कुछ ग़ैर सरकारी संस्थाओं और कुछ चुनिंदा लोगों के अलावा खुले आसमान के नीचे रह रहे लोगों के बारे कोई नहीं सोचता

हालांकि दिल्ली की सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को लिखे अपने प्रतिवेदन में कहा है कि दिल्ली की सड़कों पर रह रहे बेघरों की तादात दस हज़ार के आसपास है.

सरकार का आंकड़ा खचाखच भरे 300 रैन बसेरों में रहने वाले लोगों पर आधारित है.

जिन्हें रैन बसेरों में जगह नहीं मिली, उनका ज़िक्र सरकारी आंकड़ों में भी नहीं है. वो गुमनामी में जीते हैं और गुमनामी में ही मर जाते हैं.

हाल ही में सेंटर फॉर होलिस्टिक डेवलपमेंट नाम की एक ग़ैर सरकारी संस्था ने एक शोध कर दावा किया कि दिल्ली की सड़कों पर मरने वाले अज्ञात लोगों में 80 प्रतिशत बेघर लोग ही हैं.

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