पवार को राष्ट्रपति भवन में रहने का मौक़ा मिलेगा?

  • 10 दिसंबर 2015
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‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले..’

मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल का यह हिस्सा इंसान की अनगनित इच्छाएं पूरी करने की चाहत दिखाने के लिए अक्सर इस्तेमाल होता है.

मेरे लिहाज़ से ये लाइनें शरद पवार की ज़िंदगी और उनके समय को दिखाती हैं, जो 75 साल के होने वाले हैं.

राजनीतिज्ञों में एक राजनीतिज्ञ, शरद पवार भारत में सभी नेताओं में सबसे कद्दावर नेता हैं.

वो हमेशा से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखे जाते रहे हैं.. आज़ाद ख़्याल, व्यवहारिक, चतुर और हरफ़नमौला.

1976 से पवार कोई भी चुनाव नहीं हारे, यह एक ऐसी अनोखी बात है जिसमें उन्होंने इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे पूर्व प्रधानमंत्रियों को भी पीछे छोड़ दिया.

हालांकि, आज पवार का राजनीतिक क़द बहुत सिमट गया है.

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अब जबकि दिल्ली, मुंबई और बारामती में उनकी हीरक जयंती पर बड़े-बड़े कार्यक्रम होने हैं, दिलचस्प सवाल यह है कि क्या नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पवार के जन्मदिन के आयोजन में मंच साझा करेंगे (या एक तस्वीर के लिए एक साथ आएंगे).

मोदी और सोनिया को एक मंच पर लाने के विचार के पीछे, पवार की ख़ुद को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक दिखाने की इच्छा है.

हालांकि उनकी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) महाराष्ट्र में सत्ता में नहीं है और वे अब केंद्रीय मंत्री भी नहीं हैं.

लेकिन एक बड़ी योजना के हिस्से के रूप में पवार को किसी तरह राष्ट्रपति पद के अगले उम्मीदवार के रूप में दिखाने की सदिच्छा शामिल है.

कहते हैं कि दशकों सत्ता का सुख उठाते रहने वाले पवार को विपक्ष में रहना अच्छा नहीं लग रहा है.

चूंकि चुनावी राजनीति के लिए वह बहुत बूढ़े हो चुके हैं, इसलिए राष्ट्रपति भवन अगला और सबसे स्वाभाविक क़दम दिखता है.

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बड़ा सवाल यह है कि राष्ट्रपति चुनाव के लिए सदन में अधिकांश वोट नियंत्रित करने वाले मोदी और एनडीए, बीजेपी और संघ के अंदरूनी लोगों को छोड़ यह महत्वपूर्ण पद पवार को उपहार में देंगे?

अगर पवार के दमदार रानजीतिक कैरियर पर नज़र डालें, तो पता चलेगा कि इस राजनेता की झोली में बहुत ही सफलताएं और असफलताएं हैं.

1978 में वे महज़ 38 साल की उम्र में पहली बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने.

उन्होंने बहुत चालाकी से पार्टी में दोफाड़ कर वसंतदादा पाटिल की कांग्रेस सरकार गिरा दी और प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ़्रंट के बैनर तले जनता पार्टी के साथ गठबंधन सरकार बनाई.

1991 वह साल था, जब उन्हें लगा कि वह हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री बनने के सपने के बहुत क़रीब हैं.

यह राजीव गांधी के बाद का युग था और कांग्रेस सत्ता में आई थी. लेकिन पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में उन्हें रक्षा मंत्री पद से संतोष करना पड़ा.

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जब राजीव गांधी के वारिस की खोज हो रही थी तो पवार ने ज़्यादा सक्रिय होने की ग़लती की और सुरेश कलमाड़ी की मदद से बड़े-बड़े भोज कराने लगे.

कांग्रेस परिवार में शोक की लहर के समय उनकी ‘बेचैनी’ घातक साबित हुई और उनको मुश्किल से 54 सांसदों का साथ मिल पाया.

अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद पवार ने राव का संकटमोचक बनने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन सिंह के विरोध के चलते सोनिया गांधी के सामने उनका क़द छोटा पड़ गया.

लेकिन मुंबई दंगों और इसके बाद बम धमाकों के बाद अपने राज्य में उनकी मज़बूत वापसी हुई.

जब जैन हवाला स्कैंडल सामने आया तो किसी ने उस समय केंद्रीय गृह मंत्री शंकरराव चाह्वाण से पूछा कि इस घोटाले में पवार का नाम क्यों नहीं है. चाह्वाण ने बहुत सपाट जवाब दिया, ''क्या आप नहीं जानते कि हवाला के सभी लेनदेन भरोसे पर किए जाते हैं?''

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कांग्रेस के शीर्ष नेता के रूप में सोनिया गांधी के आगमन ने पवार को निराश कर दिया.

मई 1999 में जब शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ विदेशी मूल का मुद्दा उठाया, उसके कुछ दिन पहले ही पवार ने अपने गुरुद्वारा रकाबगंज रोड के बंगले पर एक दावत दी थी.

हालांकि ग़लत ही सही कई लोगों ने सोचा कि यह पार्टी, सोनिया की तरफ़ से उन्हें जयललिता और अन्य संभावित सहयोगियों से बातचीत की ज़िम्मेदारी सौंपे जाने पर आयोजित की गई थी.

उस समय सौम्य पवार के चेहरे पर बहुत मधुर मुस्कान तैर रही थी.

लेकिन किसी ने नहीं सोचा कि वो कांग्रेस वर्किंग कमेटी में हंगामा खड़ा करने की योजना बना रहे थे.

इसका सबसे क़रीबी सुबूत था कि उस शाम सुंदर प्यालों में बरगंडी बारामती वाइन परोसी गई.

यहां तक कि पवार ने इससे जुड़ी एक दिलचस्प कहानी भी सुनाई थी, ''असल में मैंने अपनी नेता (उस समय सोनिया गांधी) को बताया था कि मैं दूरदर्शी हूँ क्योंकि मैंने ऐसी वाइन बनाने के लिए 20 साल पहले ही एक इतालवी व्यापारी से साझेदारी की थी.''

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उन्होंने यह भी बताया कि वे पिछले कई साल से अंगूर की नई किस्म ‘शरद सीडलेस’ पैदा कर रहे हैं और उससे वाइन बना रहे हैं.

इसके बाद पवार सोनिया के साथ मेलजोल बढ़ाते दिखे, यहां तक कि उन्होंने वफ़ादारी वाले कई चुटकुले भी सुनाए. हालांकि ऐसा लोगों का सोचना था, लेकिन दोबारा ग़लती हुई.

दावत में कहे गए चुटकुले बहुत ही कड़े थे. उनका अगला क़दम क्या था, उस शाम को इस बात से वो अनभिज्ञ नहीं थे.

असल में सोनिया गांधी अब उनकी नेता नहीं रह गई थीं; उनका इतालवी मूल का होना खूबी नहीं खामी बन गया था और पवार का विज़न सोनिया गांधी की तारीफ़ नहीं, बल्कि उन्हें दफ़न कर देना था.

लेकिन उन्होंने उस शाम अपनी कटार छिपाए रखी और गोपनीयता बरती.

और जैसा कि हम सब जानते हैं कि शिवाजी और अफ़जल ख़ान के बीच मशहूर मिलन मराठा शस्त्र भंडार का सबसे ख़तरनाक़ हथियार है.

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लालू यादव ने तत्काल सवाल किया कि क्या शरद पवार मई 1999 से पहले नहीं जानते थे कि सोनिया गांधी का जन्म इटली में हुआ था?

असल में महाराष्ट्र की एक महिला नौकरशाह ने पवार को बताया था कि उसने एक सर्वे किया है जिसमें पता चला है कि अगर वे सोनिया के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं तो उन्हें ‘दूसरे लोकमान्य तिलक’ जैसी प्रसिद्धि मिल जाएगी.

लेकिन इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में पवार की नई पार्टी एनसीपी कांग्रेस के पीछे रह गई और उन्हें उस राज्य में गठबंधन सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का जूनियर पार्टनर बनना पड़ा, जो कभी उनकी जागीर समझी जाती थी.

2005 में वे देश के सबसे धनी और सबसे ताक़तवर खेल निकाय बीसीसीआई के अध्यक्ष बने. यह उनकी निजी उपलब्धि थी, जिसने जगमोहन डालमिया के एकाधिकार को भी तोड़ा.

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मगर कई लोग मानते हैं कि यह उस आदमी के लिए एक क़दम पीछे की बात थी, जो कभी प्रधानमंत्री बनना चाहता था.

तब दिल्ली और महाराष्ट्र के राजनीतिक हलकों में चर्चा थी कि बीसीसीआई अध्यक्ष बनने का संकेत था कि पवार ने आखिरकार देश पर शासन करने का अपना ख़्वाब त्याग दिया है.

इसकी जगह वे छोटी खुशी तलाशने लगे थे. बीसीसीआई मुखिया के रूप में वो बराबर विदेश जाने, आईसीसी बैठकों में शामिल होने, स्टेडियमों को मंज़ूरी देने, सौदे करने और अपने धनी और मशहूर दोस्तों को संरक्षण देने की स्थिति में आ गए, पर आम पार्टी समर्थकों के लिए इसके कोई मायने नहीं थे.

हालांकि पवार के क़रीबियों ने दावा किया कि वह हमेशा ही खेलों के प्रशंसक रहे थे. पवार नेशनल रेसलिंग फ़ेडरेशन से जुड़े थे.

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मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन एक सदस्य ने बताया, ''उन्हीं की कोशिशों की वजह से एशियाई खेलों में कबड्डी को जगह मिली.''

एक और समर्थक ने बताया कि वो महाराष्ट्र ओलंपिक एसोसिएशन के भी अध्यक्ष रहे हैं.

कहा जाता था कि क्रिकेट के साथ पवार का पारिवारिक जुड़ाव था- उनके ससुर सदाशिव गनपतराव शिंदे लेग स्पिनर थे और लॉर्ड्स के मैदान से अपने करियर की शुरुआत की थी.

राजनीति और क्रिकेट में कई पारियां खेल चुके पवार को क्या राष्ट्रपति भवन में रहने का मौका मिलेगा?

उनके धुर समर्थक सप्ताह भर चलने वाले उनके जन्मदिन समारोहों में मोदी और सोनिया गांधी की मौजूदगी पर बहुत गणित लगा रहे हैं.

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