विद्रोही: 'जो बिना डिग्री कोसों आगे निकल गया'

  • 9 दिसंबर 2015
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कवि रमाशंकर यादव विद्रोही के निधन पर सोशल मीडिया पर उन्हें बड़ी संख्या में लोग याद कर रहे हैं.

विद्रोही की कविताएं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच ख़ासी लोकप्रिय रहीं.

दिलीप मंडल लिखते हैं, "प्रोफ़ेसरों. रमाशंकर यादव नाम का वह मासूम लड़का सुल्तानपुर, यूपी से पढ़ाई करने के लिए जेएनयू, दिल्ली आया था. तुमने रमाशंकर यादव को पढ़ाई पूरी नहीं करने दी. वह अपनी डिग्री कभी नहीं ले पाया. क्या विद्रोही प्रतिभा से डरते थे तुम? अपने निठल्लेपन का अहसास था तुम्हें? अपने बौद्धिक बौनेपन का भी? लेकिन यह तो तुम्हें दिख रहा होगा प्रोफेसर कि एक तरफ अपार लोकप्रियता बटोरे विद्रोही की रचनाएं हैं और दूसरी तरफ़ हैं तुम्हारी किताबें, जो सिलेबस में न हों, तो चार लोग उन्हें नहीं पढ़ेंगे. विद्रोही बिना डिग्री के तुमसे कोसों आगे निकल गया. छूकर दिखाओ. लिखो वैसी एक रचना.. है दम?"

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विनय भूषण लिखते हैं, "विद्रोही बिना मिलावट वाले जन कवि का नाम है. अभी तो आपके और तगड़े होने के दिन आ रहे थे, क्योंकि जन-गण-मन और भारत भाग्य विधाता अंतिम सांसें गिन रहे हैं. अभी तो ढेर सारे काम करने थे, देर-सबेर सब होगा. लेकिन पहले आपकी चिता को दहकाएंगे, मित्रों के साथ दिल्लगी करेंगे और ढफ़ली बजाकर गाना भी गाएंगे ! आप सुनिएगा.."

मृत्युंजय प्रभाकर: जाने कैसे-कैसे कवि धन्ना सेठ बन चुके और बनने की उम्मीद में खुले प्रकाशकों के यहाँ से छपते रहे पर रमाशंकर यादव उर्फ़ विद्रोही और अदम गोंडवी जैसे जन कवि के लिए प्रकाशक पैदा नहीं हुए. न ही प्रकाशन, पुरस्कार और रोज़गार माफ़िया चलाने वाले वामपंथी आलोचकों को उनका ख़्याल आया."

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कुमार सुंदरम: जेएनयू में हर साल एक चौथाई विद्यार्थी बदल जाते हैं, नए लोग आते हैं. इन नए लोगों का साबका गंगा ढाबा पर बैठे विद्रोही जी से होता था तो उनका जेएनयू की परंपरा से परिचय होता था. कैंपस के जो दशकों पुराने आंदोलनों और पड़ावों के क़िस्से हम सुनते थे, उनकी निरंतरता विद्रोही जी के रूप में हमें साक्षात दिखती थी. हम सबको विद्रोही जी ने ऐसे ही सींचा. उनका आख़िरी दिन भी आंदोलनरत छात्रों के बीच बीता. गज़ब जीवट वाले इंसान थे वह.

अब्बास शमैल रिज़्वी: विद्रोही की कविता कभी नम आँखों के बिना नहीं पढ़ी.

आलोक बाजपेई: विद्रोही जी की कविताएं. काश सब इन्हें सुन पाते और महसूस कर पाते.

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