बुलबुल की ज़िंदगी केक पर, ड्राइवर की ब्रेक पर

  • 12 दिसंबर 2015
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भारत-नेपाल सीमा से क़रीब 16 किमी दूर नौतनवां के संपतिहा गांव के पास से गुज़रने वाली सड़क पर एक छोटा ट्रक खड़ा है. पीछे लिखा है, "बुलबुल की जिंदगी बिस्कुट और केक पर, ड्राइवर की ज़िंदगी हैंडिल और ब्रेक पर."

पहली नज़र में लगता है कि ड्राइवर कुछ रसिक, कुछ खुशमिजाज इंसान होगा, लेकिन केबिन में झांकने पर इस मज़ाकिया शायरी का दयनीय रूपक दिखता है.

दिसबंर के जाड़े में एक पतली चादर में स्टीयरिंग पर सिर रखकर सोए ड्राइवर हरिओम और बीड़ी पीता किशोर खलासी.

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वो तीन दिन पहले दिल्ली से चिप्स और कुरकुरे के पैकेट लादकर चले थे. न ट्रक मालिक को और न ड्राइवर को भारत-नेपाल के बीच तनाव और नाकेबंदी के बारे में कुछ मालूम था, सो यहां आ फंसे.

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उसके पास दिल्ली तक का डीज़ल भरवाने के पैसे नहीं, इसलिए लौट भी नहीं सकते. नाका कब खुलेगा, पूछने पर पुलिस वाले गालियां देते हैं और दूसरे ट्रक वाले मज़ाक उड़ाते हैं.

जैसे-जैसे सीमा की ओर बढ़ते हैं, ट्रकों पर पड़ी धूल की परत मोटी होती जाती है.

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ऐसे ड्राइवर मिलते हैं, जो डेढ़-दो महीने पहले नेपाल जाने को निकले थे, लेकिन उन्हें सड़क किनारे खुले में रहना पड़ा.

इनमें ज़्यादातर जाड़े के कपड़े भी लेकर नहीं चले थे. वे कहते हैं जिनका मालिक दिलदार है, उन्होंने स्थानीय बाज़ारों से कपड़े खरीदे हैं. बाकी ठिठुरते हुए काम चला रहे हैं.

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नाकेबंदी के नेपालियों से भी बुरे शिकार 16 किलोमीटर लंबी क़तार में खड़े ट्रकों के हज़ारों ड्राइवर हैं, जिनकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं.

उन्होंने यहां एक मिनी भारत बसा दिया है.

चेन्नई से हैवी मशीनरी का सामान लेकर एक महीने पहले चले नंदकुमार के पैर में चोट लगने के बाद सेप्टिक हो गया है.

वह अपना पैर प्लास्टिक से बांधे किसी स्थानीय झोलाछाप डॉक्टर से इलाज करा रहे हैं. उन्हें पैर से ज़्यादा परेशानी है-सुबह खाने में इडली नहीं मिलती.

खाने के लिए दो किलोमीटर दूर होटल पर जाना होता है, जहां सिर्फ़ आलू मिलता है और यह भी नहीं मालूम कि घर लौटना कब होगा.

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कोलकाता से शराब की खाली बोतलें लादकर नेपाल के किसी इंडस्ट्रियल एरिया में जा रहे हरियाणवी ओमप्रकाश नाराज़ हैं कि राजनीति के झगड़े में उनकी डेढ़ महीने से ऐसी-तैसी हो रही है.

ट्रांसपोर्ट कंपनी के एजेंट ने गाड़ी के काग़ज़ कस्टम वालों के पास जमा करा दिए हैं, जिसे वो लौटा नहीं रहे कि वापस ही चले जाएं.

ओमप्रकाश और उनके खलासी के पास गरम कपड़े भी नहीं. वे सड़क किनारे चलने वाली चाय की दुकानों में आग तापते रात काट रहे हैं.

आज़मगढ़ के रामनिहोर उन 35 ट्रकों में एक के ड्राइवर हैं, जो कलकत्ता से नेपाल में लगने वाली एक शराब फैक्ट्री की मशीनें लादकर आए हैं.

उन्होंने एक महीने में खाली खेतों को घूरते और दिन-रात ताश खेलते हुए नतीजा निकाला है कि नरक में भी ठेली-ठेला है.

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उन्होंने कहा, "बस्तियों और दुक़ानों के पास ट्रक पार्क करने के पैसे भी पुलिस वाले ले रहे हैं."

सड़क किनारे गांवों में एक न दिखने वाला बाज़ार आबाद हो चुका है, जहां से इन ड्राइवरों को उपले, दूध, अंडे, पानी, सिगरेट, तंबाक़ू समेत सारी ज़रूरी चीज़ों की सप्लाई थोड़ा बढ़े दाम पर हो रही है.

इन गांवों के बच्चे बताते हैं कि ग़ैर हिंदीभाषी प्रांतों से ड्राइवर अब तो भोजपुरी भी बोलने लगे हैं.

जम्मू से आए ट्रक ड्राइवर ने कहा, "अगर पता होता इतने दिन रुकना पड़ेगा तो कश्मीर से कालीन और ऊनी कपड़े ले आते. यहां बेचकर मन लगता और नुक़सान की कुछ भरपाई भी होती."

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