व्हाट्सऐप पर चुटकुलों के साथ बंटता पोर्न

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इंटरनेट के बढ़ते दायरे और फोन जैसे गैजेट्स के सस्ते होने के साथ ही पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्री अब बहुत आसानी से देखी और बांटी जा रही है. क्या ये औरतों और मर्दों के जीवन को बदल रही है?

यही जानने के लिए बीबीसी ने भारत की संभवत: अकेली महिला सेक्सॉलोजिस्ट डॉ. शर्मिला मजूमदार और 92 वर्ष के बहुचर्चित सेक्सॉलोजिस्ट डॉ. महेंद्र वत्स से बात की.

व्हाट्सऐप के ज़रिए पोर्न शेयर किए जाने के चलन पर विशेषज्ञों की राय

डॉ. शर्मिला मजूमदार – पोर्न भेजने को अब संजीदगी और अहमियत नहीं दी जा रही. ये आम हो चला है, मानो कोई बड़ी बात ना हो. विडंबना ये है कि पोर्न देखना ज़रूरी है तो आप देखते हैं पर ज़्यादा देखने से वो ‘कैज़ुअल’ हो जाता है.

बार-बार पोर्न देखने का सीधा असर इंसानी रिश्तों पर पड़ता है. सबसे बड़ा डर है कि ये सामग्री अपने मां-बाप के फोन और लैपटॉप का इस्तेमाल करने वाले बच्चों के हाथ लग सकती है.

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डॉ. महेंद्र वत्स - मुझे इसमें कोई फ़र्क नहीं लगता. पहले चुटकुले भेजे जाते थे अब लोग पोर्न भेजने लगे हैं. कुछ भेजना एक आदत होती है, बस आदत थोड़ी बदल गई है.

ग्रुप 20 दोस्तों का हो या 100 का, हैं तो वो दोस्त ही, किसी को ये पसंद होगा और किसी को नापसंद. निजी स्तर पर पोर्न पहले भी देखा और बांटा जाता रहा है.

क्या पोर्न देखना अच्छा है?

डॉ. शर्मिला मजूमदार – कभी-कभी पोर्न देखने में कोई परेशानी नहीं, बल्कि अगर सीमाओं को समझा जाए तो ये फ़ायदेमंद भी हो सकता है.

अपने पार्टनर के साथ पोर्न देखते हुए ‘एक्सपेरिमेंट’ भी कर सकते हैं जो रिश्ते को मानसिक और सेक्सुअल खुशी दे सकता है या फिर पोर्न फ़िल्मों पर साथ हंसने का मौका भी मिलता है.

डॉ. महेंद्र वत्स – अगर पोर्न देखना आदत बन जाए तो बहुत नुकसानदेह हो सकता है. ऐसे में शादी के बाद 'सेक्सुअल डिज़ायर' ख़त्म हो सकती है. असल यौन संबंध में खुशी भी नहीं मिलती.

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बुढ़ापे में पोर्न देखना मदद कर सकता है. आम यौन संबंध से जुड़ा पोर्न देखने से जानकारी बढ़ सकती है पर बच्चों से संबंधित पोर्न या हिंसक पोर्न दिमाग पर बुरा असर डालता है.

पोर्न से औरतों को क्या हासिल होता है और क्या नुकसान हो सकते हैं?

डॉ. शर्मिला मजूमदार – औरतों को पोर्न से कोई फ़ायदा नहीं होता. बस वो पोर्न और असल ज़िंदगी के फ़र्क के बारे में समझ बना सकती हैं और इसे मनोरंजन के तौर पर देखती हैं.

अगर हमारे देश में अच्छी 'सेक्स एजुकेशन' दी जाए और बराबरी से यौन संबंध बनाने का चलन हो तो औरतें भी अपनी ‘सेक्सुअल डिज़ायर’ को सामने रखतीं. फिलहाल ये सिर्फ उनके मन में रह जाता है.

मेरे मरीज़ों (औरत) में सिर्फ़ पांच प्रतिशत पोर्न देखती हैं वो भी अपने पार्टनर के साथ.

डॉ. महेंद्र वत्स – ज़्यादातर औरतों को पोर्न पसंद नहीं आता क्योंकि वो अपने यौन संबंधों को लेकर खुलकर बात नहीं करतीं. धीरे-धीरे ‘मैस्टरबेशन’ के बारे में जानकारी बढ़ने लगी है तो अब कई बार औरतें हमें लिखित सवाल भेजती हैं.

औरतें ज़्यादा समझदार होती हैं, इसलिए उनका पोर्न देखना बीमारी का रूप ले ले, ऐसा होने की गुंजाइश ना के बराबर है.

पोर्न से मर्दों को क्या हासिल होता है और क्या नुकसान हो सकते हैं?

डॉ. शर्मिला मजूमदार – ये सपनों की दुनिया या ‘फैंटसी’ जीने का एक ज़रिया है. जिज्ञासा पूरी करने के लिए और वो हासिल करने के लिए जो असली यौन संबंध से ना मिल रहा हो.

अगर ये आदत या ‘एडिक्शन’ का रूप ना ले तो खुद को शांत करने का एक तरीका भी बन सकता है ताकि असल यौन हिंसा करने से रोका जा सके. पर ‘एडिक्शन’ हो जाए तो डॉक्टरी मदद ज़रूरी हो जाती है.

डॉ. महेंद्र वत्स – ‘फैंटसी’ ज़रूरी है लेकिन अगर पोर्न देखना आदत बन जाए तो मर्दों की इच्छा में भी फर्क पड़ जाता है और इससे मिलने वाली खुशी भी जाती रहती है. निजी रिश्ते ख़राब हो सकते हैं और काम से भी ध्यान हट जाता है.

मेरे पास आनेवाले मरीज़ों (मर्द) में क़रीब 50 प्रतिशत ‘मैस्टरबेशन’ से जुड़ी परेशानियां लेकर आते हैं और 30 प्रतिशत ‘पोर्न एडिक्शन’ से निकलने के उपाय के लिए. ये बहुत ज़्यादा प्रचलित है.

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क्या हिंसक पोर्न देखने से असल ज़िंदगी में यौन हिंसा या यौन संबंध के दौरान हिंसक तरीके अपनाने की गुंजाइश बढ़ जाती है?

डॉ. शर्मिला मजूमदार – हिंसक पोर्न कम भी देखा जाए तो गैर-सामाजिक बर्ताव की ओर ले जा सकता है. ऐसे मर्द महिलाओं की तरफ़ ज़्यादा आक्रामक रुख रखने लगते हैं, बलात्कार पीड़ितों की ओर असंवेदनशील हो जाते है और बलात्कार के बारे में बनीं अवधारणाओं पर जल्दी यकीन कर लेते हैं.

दुनिया-भर में हुए शोध के मुताबिक बार-बार पोर्न देखनेवालों में बलात्कार, यौन हिंसा और 'सेडोमैसोकिज़म' की चाहत बढ़ जाती है और शादी या निजी रिश्तों में झगड़े-परेशानी बढ़ती है और यौन संबंधों में खुशी कम हो जाती है.

डॉ. महेंद्र वत्स – इसकी गुंजाइश ज़रूर होगी. पोर्न को लेकर ‘एडिक्शन’ आम ज़िंदगी को ही प्रभावित कर देती है.

पर अगर फ़िल्मों को देखा जाए तो वो पोर्न जैसा बहुत कुछ दिखाती हैं और कहती हैं कि ये समाज का ही आइना है. नुकसानदायक तो वो भी है.

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