'निर्भया के भाई दीदी की याद में रोते हैं’

  • 15 दिसंबर 2015
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बच्चों पर घटना का बहुत असर पड़ा है. बच्चे पढ़ने में इतने अच्छे थे कि हमने कभी उनके लिए ट्यूशन नहीं लगाया. वो अभी भी पढ़ाई में अच्छे हैं.

हम तो रो लेते हैं, हज़ारों लोगों से बात करते हैं, लेकिन पता नहीं वो कैसे अपने आपको संभालते हैं.

हम चारों लोग किसी को अपना दुख नहीं दिखाते हैं, एक दूसरे को कहते हैं कि आप संभलो, आप ठीक रहो. ऐसे ही उन लोगों का भी चल रहा है.

'निर्भया' की मां आशा देवी से बातचीत की पहली कड़ी

बड़ा बेटा अभी भी कभी-कभी कहता है कि मम्मी मुझे तो समझ ही नहीं आता है कि मैं क्या करूं.

वो कहता है, दीदी रहती थी तो कुछ भी पूछता था, दीदी उसका हल निकालती थी.

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मैं कहती हूं कि अभी भी समझो कि दीदी तुम्हारे साथ है, अभी भी उनके बताए रास्ते पर चलो. उनके गुणों को अपनाओ. और क्या कह सकते हैं उनको ?

छोटा भाई कुछ बोलता ही नहीं है. बड़ा भाई रोता है, वो भी कुछ कहता ही नहीं है. वो बस यही कहता है, मम्मी बस अपना ध्यान रखो. वो अलग अपना रहता है.

मैं कोशिश करती हूं कि वो अपनी तरफ़ ध्यान दें. उनकी पूरी ज़िंदगी उनके सामने है. ये बातें कभी भी किसी के मन से नहीं निकलेंगी लेकिन आगे तो बढ़ना ही पड़ेगा.

'निर्भया' की मां आशा देवी से बातचीत की दूसरी कड़ी

मैं (अपने पुराने मकान से) यही सोचकर निकली कि जगह बदल जाएगी तो मन बदल जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि यहां सब अकेला हो जाता है.

यहां समय से सब (घर से) निकल जाते हैं. तो मैं तो बिल्कुल अकेले हो जाती हूं.

वहां (पुराने घर में) छोटे-छोटे घर हैं, कॉलोनी है, वहां हमेशा चहल-पहल रहती थी.

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यहां कभी-कभी तो लोग ही नहीं दिखते हैं. मुझे अपने आप में इतनी तन्हाई, इतना तनाव रहता है कि समझ ही नहीं आता है कि कोई आया या नहीं आया, या फिर बाहर क्या हो रहा है.

तो इसी को अपनी ज़िंदगी बना लिए है. मेरा ये भी मन नहीं करता है कि किसी के पास जाऊं, बैठूं, कहीं जाकर रहूं. मैंने इसी के साथ अपने को ढाल लिया. जितना मरने का दुख नहीं है, उतना जो (मेरी बेटी को) तकलीफ़ मिली उसका है.

मरना-जीना तो भगवान ने बनाया है, लेकिन किसी को मौत भी मिले और ऐसे मिले तो उसके लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है.

कुछ ही लोग हैं जो समाज खराब कर रहे हैं. मुझे समाज से बहुत समर्थन मिला. आज भी बहुत से लोग हमसे कहते हैं, आप जहां भी कहो हम वहां खड़े हैं.

लेकिन हम तो आवाज़ ही उठा सकते हैं, किसी को कुछ समझा ही सकते हैं.

हम कानून तो नहीं बदल सकते. किसी को सज़ा तो नहीं दे सकते.

समाज में बहुत बदलाव आया है.

अब लोग सोचने लगे हैं कि ऐसी घटना चाहे जिसके साथ भी हो, ऐसा नहीं होना चाहिए.

पहले लोग इसे अपनी बदनामी समझते थे लेकिन बदनामी समझकर हम खुद ही ऐसी चीज़ों को बढ़ावा दे रहे हैं.

जब तक इसके खिलाफ़ हम आवाज़ नहीं उठाएंगे, इसका विरोध नहीं करेंगे, ये चीज़ें तो होती रहेंगी.

बहुत लोग हैं जो अपना नाम छिपाते हैं.

मैंने क्या गुनाह किया कि मैं अपना नाम छिपाऊं.

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मेरी बेटी की क्या गलती थी कि मैं उसका नाम छिपाऊं, अपनी शक्ल छिपाऊं.

शर्म उनको आए जिन्होंने अपराध किया. मुझे शर्म नहीं आती. शर्म उन्हें आए जो उन्हें जेल में पाल रहे हैं.

मेरे साथ गलत हुआ है, मैं गलत के खिलाफ़ आवाज़ उठाऊंगी. और आवाज़ उस वक्त तक उठाऊंगी जब तक मुझे इंसाफ़ नहीं मिलेगा.

'निर्भया' की मां आशा देवी से बातचीत की चौथी और अंतिम कड़ी में पढ़ें...निर्भया की मां: मुझे दो बातों का दुख है'

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे के साथ बातचीत पर आधारित)

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