'लगता है कि अपने धर्म में ही शादी करनी चाहिए'

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‘लव जिहाद’ पर बयानबाज़ी चाहे गर्म हो पर देश में ऐसी प्रेम कहानियों की कमी नहीं जिनमें शादी हुई तो प्यार भी रहा और धर्म भी.

बीबीसी की विशेष श्रृंखला की दूसरी कड़ी में मिलें करीम ख़ान और संगीता से और जानें कि वो अब क्यों अपनी बेटी को अलग धर्म में शादी नहीं करने देना चाहते -

संगीता और मैं, करीम ख़ान बहुत मुश्किल हालात में मिले. मेरे पिता बहुत बीमार रहते थे, उन्हें लकवा मार गया था और मैंने उन्हें मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती कराया था.

संगीता वहां बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थीं तो उनका केस इन्हें दिया गया था.

मेरा पूरा परिवार भोपाल में था और मैं यहां अकेला. संगीता से बहुत सहारा मिला. उनसे दिल की बातें करने लगा. बातों-बातों में एक साल गुज़र गया.

फिर एक दिन एक मरीज़ के हाथ उन्हें चिट्ठी दी, जिसमें लिखा था कि मैं उनसे प्यार करता हूं. एक दोस्त से यही कहलवाया भी. जवाब में संगीता ने पूछा, ''जिनसे प्यार करते हो, उनसे शादी करोगे क्या?''

मैंने ऐसा सोचा नहीं था, तो मना कर दिया. जब दोस्त ने उन्हें ये बात बताई तो उन्होंने भी मना कर दिया, बोलीं ऐसा रिश्ता वो नहीं चाहतीं.

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आखिर मैं मान गया और पिता जी के पास लाया और उन्होंने भी कहा कि अगर तुम इनसे दोस्ती रखते हो, घूमते-घामते हो तो इन्हीं से शादी करो, छोड़ना नहीं.

पर मेरी मां का सोचना था कि, ''तुम हिंदू लड़की से शादी कर रहे हो, वह दिखने में अच्छी नहीं है कोई बात नहीं. तुम दूसरी शादी कर लेना एक सुंदर मुस्लिम लड़की से.''

यह काफ़ी समय तक चला. वह मुस्लिम लड़कियां देखती रहीं. ये तब, जब हमारे परिवार में किसी ने दो शादियां नहीं की थीं और मेरे मम्मी-पापा ने भी प्रेम विवाह किया था. दोनों की उम्र में 24 साल का फ़र्क था. फिर भी उन्होंने शादी की.

मेरी पत्नी ने भी मुझे दूसरी शादी की छूट दी, पर मैंने यह कभी नहीं चाहा. लड़कियां कोई भेड़-बकरियां नहीं हैं, जिनकी लाइन लगा दूं.

मेरी मां को इससे भी शर्मिंदगी थी कि उनकी बहू बाहर जाकर काम करे. उनके मुताबिक़ बहू को घर रहकर बच्चों को पालना और बुज़ुर्गों का ख़्याल रखना चाहिए. वो ज़्यादा पढ़ी नहीं थीं.

पर ज़रूरतें ऐसी थीं कि संगीता को अपने मां-बाप का ख़र्च उठाना पड़ा और हमेशा से नौकरी की. हमारे दस साल लंबे अफ़ेयर के दौरान भी और आज भी.

मां मेरी हर बात मानती थीं तो धीरे-धीरे इस बात को भी उन्होंने मान लिया. फिर 1996 में मां गुज़र गईं.

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1995 में हमने कोर्ट मैरिज की और 1997 में निकाह किया. संगीता के परिवार के सभी लोग आए. दस दिन वो हमारे पास रुके, निकाह हुआ और रिसेप्शन भी.

निकाह तो ज़िंदगी शुरू करने के लिए रस्म है, पर अगर वो लोग कहते कि हिंदू रीति-रिवाज़ से फेरे लेकर रहो, तो मैं वह भी करता. पर इसकी ज़रूरत नहीं पड़ी.

और जीवन के सफ़र में हम एक साथ चल पड़े. मैंने कभी नहीं सोचा कि संगीता को अपना मज़हब बदलना चाहिए. उन्हें कहा कि तुम जैसे पसंद करो वैसे रहो.

हमारा क़िस्सा अलग सही, पर अंतर-धर्म शादियों या रिश्तों की शुरुआत स्कूल-कॉलेज में ही हो जाती है.

दरअसल किसी भी स्कूल-कॉलेज में मुसलमान बच्चों की तादाद कम होती है और हिंदू बच्चे ज़्यादा समृद्ध परिवारों से आते हैं.

मुसलमान बच्चे उनके रहन-सहन, पहनावे, साफ़ जूते, सुंदर टिफिन-बॉटल वगैरह से आकर्षित होते हैं. मैंने भी अपने जीवन में हमेशा हिंदू लड़कियों को ही पसंद किया.

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सब बहुत अच्छा है. मेरा सैंडस्टोन का बिज़नेस है, फ़ैक्टरी है. संगीता बीएमसी के स्वास्थ्य विभाग में एएनएम हैं. हमारी एक बेटी है.

पर यह बात आज समझ में आती है कि हमें शादी नहीं करनी चाहिए थी. हम अपनी बेटी को भी समझाते हैं कि किसी और धर्म में शादी मत करना.

खाने को लेकर मतभेद होता है. हमारे मुग़लई खाने होते हैं, उनका खाना नारियल से बनता है. अक़्सर हम घर से बाहर ही खाना खाते हैं.

त्योहारों पर भी मेलजोल नहीं हो पाता. संस्कृति का फ़र्क तो रोज़ महसूस होता है. लोगों से मिलने-जुलने में भी परेशानी होती है.

इतने साल बाद ही संगीता हमारे परिवार में थोड़ा हिल पाई हैं. जैसे अब हमारे घर में वह सिर पर दुपट्टा लेती हैं. वरना उनके घर में ऐसा नहीं था, तो वो नहीं लेती थीं.

हमारा रिश्ता बहुत गहरा और मज़बूत है. आज भी मैं संगीता को कोई तक़लीफ़ नहीं आने दूंगा और हमने जो किया, ठीक किया, ग़लत नहीं किया.

पर लगता है कि अपने धर्म में ही शादी करनी चाहिए. निभाना आसान होता है. तब प्यार का उफ़ान था, पर प्यार भी एक उम्र में ही अच्छा लगता है न.

(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत पर आधारित)

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