चेन्नई बाढ़ के क्या हैं सबक

  • 18 दिसंबर 2015
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भारी बारिश और चेन्नई की बाढ़ ने न केवल भारत के इस महानगर को बल्कि बाकी देश के लिए भी ज़रूरी सबक सिखा दिए हैं.

और यह सबक केवल प्रशासकों, राजनेताओं या रियल एस्टेट के लिए ही नहीं, बल्कि सभी लोगों के लिए अहम हैं.

पिछले 30 सालों से मद्रास हाईकोर्ट में वक़ालत कर रहे वरिष्ठ वकील ए रमेश ने बीबीसी हिंदी को बताया, “मैंने अपनी पूरी लाइब्रेरी और मुवक्किलों के दस्तावेज गंवा दिए. उम्मीद है कि इन दस्तावेजों को मैं अपने कम्प्यूटर और कोर्ट से दोबारा हासिल कर लूंगा. लेकिन इन क़िताबों से ज़्यादा अदालती कार्यवाही के लिए लिखे गए नोट्स की फ़िक्र है, जिनकी भरपाई पैसे से नहीं की जा सकती.”

रमेश चेन्नई के पॉश इलाक़े में रहते हैं और एक दिसम्बर से अपने ऑफ़िस नहीं जा सके हैं, जहां ग्राउंड फ़्लोर पर सात फ़ुट तक पानी भर गया था.

तो, लोगों के लिए पहला पाठ क्या है? रमेश का कहना है कि ऐसी किसी आपदा में होने वाले भारी नुकसान से बचने के लिए अपने प्रॉपर्टी के काग़ज़ात, टैक्स की रसीदें, बीमा पॉलिसी, बैंक और फ़िक्स डिपॉज़िट के दस्तावेज आदि इलेक्ट्रॉनिक रूप में सुरक्षित कर लेने चाहिए..

ऐसी आपदाओं के लिए इंश्योरेंस डेवलपमेंट आथॉरिटी या इरडा ने ई-पॉलिसी की सलाह दी है. ऐसे में क्लाउड कम्प्यूटिंग का इस्तेमाल करने की सलाह है.

लेकिन, चेन्नई में ऐसी बाढ़ क्यों आई?

जानी मानी पर्यावरणविद् और ‘केयर अर्थ’ एनजीओ की मुखिया डॉक्टर जयश्री वेंकटेशन कहती हैं, “चेन्नई ऐसा शहर है, जहां औसत बारिश होती है. लेकिन शहर को कम बारिश के अनुसार प्लान किया गया है. इसलिए, इसके बारे में बुनियादी समझ ही ग़ायब है.”

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वो कहती हैं, “यहां छिछली ज़मीनें बहुतायत में हैं, जिन्हें बेकार समझा जाता है और इन्हें विकसित करने के लिए दे दिया जाता है. इसलिए जब बारिश होती है, निचले इलाक़े सबसे बुरी तरह प्रभावित होते हैं.”

ऐसे में शहर के पर्यावरणीय तंत्र, भौगोलिक स्थिति, भूगर्भीय स्थिति को समझना होगा और इसी के अनुसार, योजनाएं बनाई जानी चाहिए. मिट्टी का परीक्षण करना चाहिए.

डॉक्टर वेंकटेशन कहते हैं, “देखादेखी की कोशिश न करें. जो शंघाई में सफल है वो चेन्नई में असफल हो सकता है.”

उनके अनुसार योजना बनाते समय किसी एक समुदाय या रियल एस्टेट कंपनियों के हितों को ध्यान में रखने की बजाय सभी नागरिकों की चिंताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए.

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इस आपदा से प्रशासन के लिए क्या सबक हैं?

चेन्नई सिटी कार्पोरेशन के कमिश्नर विक्रम कपूर कहते हैं, “शहर में जो भी ड्रेनेज सिस्टम बनाया गया है वो अभी तक शहर में होने वाली बारिश को ध्यान में रखकर बनाया गया है. हमें ऐसा सिस्टम बनाना होगा जिसमें शहर के बाहर से आने वाले पानी का भी ध्यान रखा जाए.”

उनका आशय शहर के बाहर स्थित चेमबाराबाक्कम जैसी झीलों और पड़ोसी कांचीपुरम ज़िले के तालाबों से है, जहां से भारी बारिश के कारण आए पानी ने शहर को डुबा दिया.

कपूर ने कहा, “हमें अपनी विरासत को सुरक्षित रखने और अलग तरह से सोचने की ज़रूरत है. हमें इस तरह से ड्रेनेज सिस्टम की ज़रूरत है जो सिर्फ शहर को ही नहीं, बल्कि इस पूरे इलाक़े को ध्यान में रख कर बनाया गया हो.”

लेकिन उन लोगों के लिए क्या सबक हैं, जो घर लेना चाहते हैं?

पहली बात तो ये कि घर ऐसी जगह न लिया जाए जहां कभी कोई जलाशय था. इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह किसी जलाशय से कितना नज़दीक है और यहां ड्रेनेज सिस्टम कैसा है.

दूसरी बात ये है कि जिस भी इलाक़े में लोग रहते हैं, वहां उन्हें इस बात की जांच करनी चाहिए कि बारिश का पानी निकलने की व्यवस्था है कि नहीं.

अगर आपका घर बारिश का पानी निकलने वाले ड्रेन से नहीं जुड़ा है तो यह क़ानून का उल्लंघन है. जब बारिश होती है या इलाक़े में बाढ़ आती है तो पानी के साथ सीवेज भी आपके घर में आ जाता है.

ये सबक बहुत ही अहम हैं क्योंकि आमतौर पर आज़माए जाने वाले उपाय, आपदा के समय काम नहीं करते, जैसा कि उत्तराखंड और चेन्नई में हुआ, यहां इससे केवल स्थितियां भयावह ही हुईं.

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