केंचुआ पकड़ने गए थे, निकल आया सांप

  • 18 दिसंबर 2015
सीबीआई मुख्यालय इमेज कॉपीरइट PTI

बंगाली में एक कहावत है: केछो खुरते गिये शांप बेरिये एलो (केंचुआ खोदते हुए सांप निकल आया). अंग्रेज़ी में कुछ इसी तरह की उपमा है- जिसे कीड़ों के टिन को खोलना कहा जाता है.

इसका अर्थ यह हुआ कि किसी एक फ़ैसले और कार्रवाई की वजह से मुश्किल हालात का पैदा होना.

यह मुहावरा मंगलवार के घटनाक्रम के संदर्भ में सटीक बैठता है जब सीबीआई ने दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी (प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार) के कार्यालय पर छापा मारा और इस प्रक्रिया में एक चुने हुए मुख्यमंत्री (अरविंद केजरीवाल) को अपने ऑफ़िस में जाने से रोक दिया.

इमेज कॉपीरइट EPA

यकीनन अधिकारियों ने यह नहीं सोचा होगा कि इस मामले की वजह से पूरा विपक्ष अपने मतभेदों को भुलाकार नरेंद्र मोदी सरकार के ख़िलाफ़ उठ खड़ा होगा. विशेषकर प्रधानमंत्री के बाद सरकार के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति वित्त मंत्री अरुण जेटली के ख़िलाफ़.

यह वास्तव में दुर्लभ है कि सारी राजनीतिक जमात एक मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी और एनडीए का विरोध कर रही है.

इस मुद्दे ने वामदलों और तृणमूल कॉंग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी जैसे विरोधियों और तो और बीजू जनता दल (जिसका अक्सर मोदी सरकार के प्रति झुकाव दिखता है) को एक कर दिया.

यह भी महत्वपूर्ण है कि यह ऐसे समय में हुआ है जबकि कांग्रेस, वामदल और बसपा सबसे कमज़ोर स्थिति में हैं.

राजेंद्र कुमार और जेटली के विरुद्ध यह आरोप नए नहीं है- यह कुछ साल पुराने हैं. लेकिन हुआ यह कि सीबीआई के छापे ने चिंगारी दिखा दी है पैंडोरा का बक्सा खुल गया है.

यूनान की पौराणिक कथा के अनुसार, सभी बुराइयां जिस बक्से या जार में बंद थीं, उसे पैंडोरा ने खोल दिया था जिसकी वजह से दुनिया में उथल-पुथल मच गई थी. यह उस कर्म का भारतीय राजनीतिक प्रतिरूप है.

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पता था कि सीबीआई क्या करने जा रही है? अगर हां तो क्या उन्हें यह अहसास नहीं था कि इस काम के व्यापक राजनीतिक प्रभाव क्या होंगे?

इमेज कॉपीरइट PTI

इस बात को कि सरकार का सीबीआई पर कोई नियंत्रण नहीं है बहुत कम लोग मानते हैं. भारत की इस प्रमुख जांच संस्था के निदेशक ने बाकायदा कहा है कि किसी भाजपा मंत्री या सरकारी अधिकारी ने उन्हें या किसी और अन्य को फ़ोन नहीं किया है जैसे कि वह बता रहे हों कि उन्हें क्या करना चाहिए था.

और वह सही कह रहे थे, सीधी सी बात यह है कि आज बहुत कम लोग यह यकीन करते हैं कि सीबीआई वास्तव में सत्तासीन लोगों से स्वतंत्र और स्वायत्त है.

मज़ेदार बात यह है कि आज जो सवाल पूछा जा रहा है वह यह है: जेटली और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में क्या अंतर है? दोनों पर भ्रष्टाचार को देखकर आंखें मूंदने का आरोप है.

उनकी तुलना गांधी जी के तीन बंदरों से की जा रही है जो न बुरा बोलते हैं, न बुरा देखते हैं और न बुरा सुनते हैं.

इस मामले के दो अलग पहलू हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए.

पहला तो यह कि जेटली के मामले में कहानी में कमाल के पेंच हैं. डीडीसीए में अपने कार्यकाल के दौरान कथित भ्रष्टाचार के प्रति कोई कार्रवाई न करने का आरोप उन पर सबसे पहले पूर्व क्रिकेटर और भाजपा के ही संसद सदस्य ने लगाया था. उनका नाम है कीर्ति आज़ाद.

बहरहाल दर्ज किए जाने योग्य बात यह है कि आज़ाद का कहना है कि वह किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं हैं बल्कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने वाले सिपाही हैं जैसे उनके पिता थे जो भारत की आज़ादी की जंग में शामिल थे.

दूसरा पहलू कथित राजनीतिक बदले का है. कांग्रेस के अनुसार, जिस तरह पार्टी अध्यक्ष (सोनिया गांधी) और उपाध्यक्ष (राहुल गांधी) को नेशनल हेरल्ड मामले में अदालत के समक्ष पेश होने के लिए बुलाया गया है उससे यह साफ़ हो जाता है.

अक्टूबर 1977 में मोरारजी देसाई सरकार (जिसके गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह थे) ने इंदिरा गांधी को गिरफ़्तार करने का फ़ैसला किया था.

इमेज कॉपीरइट Reuters

तब इंदिरा ने ज़मानत पर रिहा होने से इनकार कर दिया और ज़ोर दिया कि वह कम से कम एक रात सलाखों के पीछे बिताएंगी. इंदिरा गांधी की बहू और पोता भी आने वाले शनिवार (दिसंबर 19) को उन्हीं के पदचिन्हों पर चलना चाह रहे हैं.

इंदिरा गांधी ने अपनी गिरफ़्तारी का इस्तेमाल खुद को ऐसा व्यक्ति बताने में सफलतापूर्वक किया जिसे उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी परेशान कर रहे हैं.

उन्होंने लोगों को इस बात का विश्वास दिलाने की कोशिश की कि आपातकाल के दौरान उनके नाम का इस्तेमाल कर 'ज़्यादती' करने वालों के कामों के लिए उन्हें सज़ा नहीं दी जानी चाहिए.

इमेज कॉपीरइट EPA

यह इंदिरा की राजनीतिक वापसी की शुरुआत थी जो दरअसल दो साल बाद दिसंबर 1979 में आम चुनाव के बाद हुई.

जो लोग इतिहास से सबक नहीं सीखते, वो पहले की गई ग़लतियों को दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार