बिहार के लिए दिल्ली अभी बहुत दूर है

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2000 के दशक के मध्य में शुरू हुई ऊंची विकास दर और बेहतर प्रशासन की वजह से बिहार तेज़ बदलाव के दौर से गुज़र रहा है.

2006-07 और 2013-14 के दौरान राष्ट्रीय सामाजिक विकास योजना (एनएसडीपी) में बिहार की विकास दर दो अंकों में रही.

साथ ही राज्य ने प्रति व्यक्ति आय में भी विकास किया, हालांकि प्रति व्यक्ति आय में बिहार राष्ट्रीय आय के सिर्फ़ 42 प्रतिशत पर रहा और यह निहायत कम है.

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Image caption बिहार में सबसे ज़्यादा रोज़गार के मौके निर्माण क्षेत्र में बने.

बिहार की तेज़ विकास दर के पीछे राज्य के सेवा क्षेत्र की मुख्य भूमिका रही. इसके अलावा बेहतर प्रशासन, मज़बूत वित्तीय प्रबंधन और सरकार के ख़र्च में बढ़ोतरी से भी फ़ायदा हुआ.

सरकारी ख़र्च अंदरूनी और बाहरी, दोनों स्रोतों से बढ़ा. विकास मद में केंद्र सरकार से राज्य सरकार को मिले पैसों की मुख्य भूमिका रही. इसके अलावा संस्थागत निवेश भी ख़ासा रहा.

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इस दौरान ऊंची विकास दर के साथ साथ ही राज्य में ग़रीबी में काफ़ी कमी आई. साल 2004-05 में बिहार में ग़रीबी रेखा से नीचे लोगों की तादाद 54 फ़ीसदी थी, जो साल 2011-12 में घटकर 34 प्रतिशत हो गई.

इस दौरान सेवा क्षेत्र का योगदान बढ़ने से अलग-अलग क्षेत्रों में और ग्रामीण-शहरी इलाक़ों में भी असमानता बढ़ी. बिहार के विकास की बड़ी वजह बड़े पैमाने पर हुए पलायन भी रही है और इसी वजह से ग़रीबी भी दूर हुई.

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Image caption रोजी रोटी की तलाश में बिहार से पलायन बढ़ा है.

मानव विकास संस्थान के एक अध्ययन में पता चला कि 1981 और 2011 के बीच राज्य से बाहर जाने वालों की तादाद में ज़बर्दस्त इज़ाफ़ा हुआ. साल 2011 में 15 से 39 साल की उम्र के बीच बाहर गए लोगों में 45 प्रतिशत कामकाज की तलाश में बाहर गए.

दूसरी ओर, इसी दौरान 25 से 39 साल के बीच की आयु के बाहर गए लोगों में 56 फ़ीसदी लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में बाहर गए थे.

ग्रामीण आमदनी का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा बाहर गए लोगों के भेजे गए पैसे का है.

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दूसरी ओर, बिहार के विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौती रही रोज़गार के कम मौक़ों का बनना. साल 2005 से 2012 के बीच राज्य में सिर्फ़ 34 लाख नौकरियां दी गईं.

इसका लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ़ निर्माण क्षेत्र में रहा. बाक़ी नौकरियां सेवा क्षेत्र में निकलीं.

पर इससे ज़्यादा परेशानी की बात यह है कि राज्य में अच्छी नौकरियां काफ़ी कम तादाद में दी गईं. नौकरी करने वालों में सिर्फ़ 6 प्रतिशत नियमित हैं और इनमें 2.5 फ़ीसदी नियमित भी हैं और उन्हें औपचारिक रूप से नौकरी दी गई है.

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Image caption बिहार की 60 प्रतिशत शिक्षित महिलाएं बेरोज़गार हैं.

चिंता की दूसरी बात बिहार में बड़ी तादाद में शिक्षित बेरोज़गारों का होना है. राज्य में ऐसे लोगों की संख्या तक़रीबन 16 प्रतिशत है. शहरी इलाक़ों में तो शिक्षित बेरोज़गारों की संख्या 26 प्रतिशत है. साठ फ़ीसदी शिक्षित महिलाएं बेरोज़गार हैं.

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इसके साथ ही, वेतन में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हुई है और इस वजह से ग़रीबी भी दूर हुई है.

आने वाले दिनों में बिहार में युवाओं की तादाद में ज़बर्दस्त इज़ाफ़ा होने वाला है. मौजूदा वक़्त में इसकी लगभग 40 फ़ीसदी आबादी 14 साल से कम उम्र की है.

शेष भारत में ऐसे लोगों का औसत 30 प्रतिशत है. इसलिए ज़रूरत है कि अच्छी शिक्षा, कौशल विकास और नौकरियों पर ज़ोर दिया जाए.

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विकास की मौजूदा ऊंची दर पर भी सभी लोगों को राज्य में ही नौकरी दे पाना मुश्किल है. इसे देखते हुए साफ़ है कि आने वाले समय में भी बिहार से बाहर लोगों का जाना जारी रहेगा.

इस वजह से एक मज़बूत विस्थापन नीति बनाना और उसे लागू करना निहायत ही ज़रूरी है. इस नीति का ज़ोर शिक्षा, कौशल विकास और बाहर गए लोगों के सीखे हुनर के राज्य में सही इस्तेमाल पर होना चाहिए.

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बिहार में आज ज़रूरत विकास गति को और तेज़ करने के बजाय मौजूदा विकास दर को बरक़रार रखने और उसे विस्तार देने की है.

राज्य की मौजूदा विकास दर पूरे देश की विकास दर से लगभग 50 फ़ीसदी ज़्यादा है. इस दर पर बिहार का विकास चलता रहे तो इसे राष्ट्रीय औसत पर पंहुचने में 25 साल लग जाएंगे.

औसत राष्ट्रीय आय साल 2030 तक हासिल करने के लिए बिहार को 13 प्रतिशत की सालाना दर से विकास करना होगा.

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इसके लिए कई मोर्चों पर एक साथ मिलकर बहुत बड़े पैमाने पर काम करना होगा. मानव विकास की वृद्धि, ढांचागत सुविधाओं की दिक़्क़तों को दूर करना और कृषि और औद्योगिक विकास करना इसमें शामिल हैं.

इसके लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश के साथ-साथ प्रशासन और तमाम संस्थाओं को भी मज़बूत करना होगा.

इसके साथ ही नए मौक़ों का भरपूर फ़ायदा उठाने और आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए प्रभावशाली रणनीति भी बनानी होगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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