क्यों ज़रूरी है आपके लिए एनजीटी को जानना?

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क्या आप अपने घर या दफ़्तर के पास पर्यावरण संबंधी किसी बड़ी दिक्क़त के शिकार हैं? क्या आप पर्यावरण संबंधी किसी सरकारी आदेश या न्यायिक फ़ैसले का उल्लंघन होते देख रहे हैं और उसके ख़िलाफ़ शिकायत करना चाहते हैं?

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और क्या प्रदूषण और पर्यावरण के नुक़सान से आपको शारीरिक या मानसिक क्षति पहुंची है? अगर हां, तो आपके समाधान की जगह नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल या राष्ट्रीय ग्रीन न्यायाधिकरण या एनजीटी हो सकती है. सरल भाषा में इसे एक 'पर्यावरण अदालत' कहा जा सकता है जिसका गठन 2010 में एक संसदीय क़ानून के ज़रिए हुआ था.

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इसका उद्देश्य पर्यावरण संबंधी मामलों का निपटारा जल्द हो सके.

ज़रा ध्यान दें एनजीटी की कुछ अहम 'उपलब्धियों' पर:

  • एनजीटी ने सरकार से दिल्ली से होकर उत्तर प्रदेश में बहने वाली यमुना नदी के 52 किलोमीटर तक के तटीय इलाक़े को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने के लिए कहा.
  • छत्तीसगढ़ राज्य के हसदेओ-अरण्य वन में यूपीए सरकार द्वारा दी गई कोयला खनन की आज्ञा को एनजीटी ने निरस्त किया.
  • राजधानी दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण के चलते एनजीटी ने सुनिश्चित किया कि 10 वर्ष से पुरानी सभी डीज़ल गाड़ियों के चलने पर रोक लगाई जाए.
  • एनजीटी के आदेश पर दिल्ली के रिहायशी इलाक़ों में कारख़ानों पर नकेल कसी गई.
  • एनजीटी की पुणे बेंच ने महाराष्ट्र सरकार से पटाखों से होने वाला वायु प्रदूषण नियंत्रित करने के अलावा सार्वजनिक जगहों पर पटाखे छुड़ाने वाले आयोजकों पर पर्यावरण टैक्स लगाने को कहा.
  • हिमाचल प्रदेश को एनजीटी से आदेश मिले कि रोहतांग पास जाने वाली सभी व्यवसायिक डीज़ल गाड़ियों से ज़्यादा कर लिया जाए और उनकी संख्या घटाई जाए.
  • ग्रेटर नोएडा समेत कम से कम सात औद्योगिक क्षेत्रों में कथित वायु प्रदूषण फैलाने वाली कई फ़ैक्ट्रियों पर कार्रवाई के निर्देश एनजीटी की तरफ़ से आए.
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सवाल उठना लाज़मी है कि नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल के गठन की ज़रूरत क्यों पड़ी.

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दरअसल वर्ष 2010 का एनजीटी एक्ट एक लंबी और चुनौतीपूर्ण मुहिम का नतीजा है. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इसके गठन के पहले पर्यावरण संबंधी कई पेचीदा मामलों में इस बात पर ज़ोर दिया था कि इनके लिए एक विशेष पर्यावरण अदालत होनी चाहिए. एनजीटी के गठन के बाद से विभिन्न पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर क़रीब 200 फ़ैसले आ चुके हैं. ज़ाहिर है कि एनजीटी द्वारा सैकड़ों पर्यावरण संबंधी आदेशों से सभी सहमत नहीं रहे होंगे. कई दफ़ा ऐसा भी हुआ है कि पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश समेत भाजपा के नितिन गडकरी जैसे कई लोगों ने एनजीटी के आदेशों पर अपनी असहमति भी जताई है.

लेकिन तेज़ी से अहम हो रहे इस न्यायाधिकरण की महत्ता का अंदाज़ा सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से लगाया सकता है.

अप्रैल, 2014 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू के नेतृत्व वाली एक पीठ ने दिल्ली में वायु प्रदूषण पर लिए गए एनजीटी क़दमों की सराहना करते हुए कहा, "ये न्यायाधिकरण एक अहम सरकारी संस्था है जो आम जनता की भलाई करना चाह रही है. उन्हें हतोत्साहित करने के बजाय हमें उनकी मदद करनी चाहिए."

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