अरुणाचल कांग्रेस के हाथ से निकल जाएगा?

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अरुणाचल प्रदेश एक बार फिर विवादों में है, लेकिन इस विवाद का अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावों से कोई लेना-देना नहीं है.

मौजूदा संकट राजनीतिक दलबदली से पैदा हुआ है. न यह अरुणाचल के लिए नया है और ना ही पूर्वोत्तर के बाक़ी सभी राज्यों के लिए जहां चंद विधायक ही पाला बदलकर सत्ता समीकरण बदल सकते हैं.

लेकिन अरुणाचल के संकट को प्रांत के राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा के 'खुले पक्षपाती' रवैये ने और बढ़ा दिया है.

अरुणाचल विधानसभा में 60 विधायक हैं. 2014 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 42 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया. बीजेपी को 11, पीपुल्स पार्टी अरुणाचल प्रदेश को पाँच सीटें मिली जबकि दो स्वतंत्र विधायक चुने गए. पीपीए ने कांग्रेस में विलय कर लिया और कांग्रेस के पास 47 सीटें हो गईं.

ये बड़ा बहुमत ही पार्टी की समस्या की जड़ बन गया. दलबदल विरोधी क़ानून में जहां दलबदलने के लिए कड़े प्रावधान हैं वहीं दल बदलने के लिए कम से कम विधायकों की संख्या भी निर्धारित है.

60 या इससे कम सदस्य वाली विधानसभाओं के लिए ये संख्या 12 है जिसमें मुख्यमंत्री भी शामिल हैं.

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Image caption बीजेपी भी अरुणाचल में सत्ता हासिल करने के प्रयास कर रही है.

सत्ता हासिल करने के एक साल के भीतर ही कांग्रेसी मुख्यमंत्री नबाम तुकी को पार्टी के भीतर असंतोष का सामना करना पड़ रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक़ 27 विद्रोही विधायक उन्हें पद से हटवाने के लिए दिल्ली में कैंप कर रहे हैं जिनमें से 21 ने उनके ख़िलाफ़ दस्तख़त भी कर दिए हैं.

यदि ये 21 भाजपा से मिल जाते हैं तो अरुणाचल विधानसभा में तुकी सरकार की हार तय है. हालांकि अरुणाचल विधानसभा का शीत सत्र मध्य जनवरी में ही शुरू होगा.

लेकिन राज्यपाल ने शीत सत्र से एक महीना पहले यानी 15 दिसंबर को ही हस्तक्षेप कर दिया. उनके इस क़दम को राज्य में विद्रोही कांग्रेसी विधायकों की मदद से बीजेपी सरकार गठित करवाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है.

उन्होंने विपक्ष के सदन के अध्यक्ष नबाम रेबिया को हटाने के प्रस्ताव को शीत सत्र का पहला एजेंडा भी बना दिया है.

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Image caption अरुणाचल में कांग्रेस बग़ावत का सामना कर रही है.

हालांकि विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया ने 16 दिसंबर को सदन की कार्रवाई ही नहीं होने दी. उन्होंने ये 21 बाग़ी विधायकों में से 14 को दलबदल क़ानून के तहत निलंबित करने का दावा भी किया है.

हालांकि राज्यपाल के आशीर्वाद से बाग़ी विधायक और विपक्षी विधायक उप सभापति टीएन थोंगडोक की अध्यक्षता में अग्रिम सत्र चलाने में कामयाब भी हो सके. चूंकी विधानसभा उनके पास नहीं थी इसलिए बाग़ी सत्र का पहला दिन एक कम्यूनिटी हॉल और दूसरा दिन एक होटल में आयोजित किया गया.

इस सत्र में न सिर्फ़ विधानसभा अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव बल्कि मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव भी पारित किया गया. सत्र में पूर्व वित्त मंत्री कालिखो पुल को सदन का नेता भी चुन लिया गया.

विधानसभा अध्यक्ष ने गुवाहाटी हाईकोर्ट में याचिका दायर की और गुरुवार को अदालत ने अग्रिम सत्र चलाने के राज्यपाल के आदेश पर एक फ़रवरी तक रोक लगा दी. अदालत ने अरुणाचल के घटनाक्रम को परेशान करने वाला भी बताया.

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Image caption कांग्रेस के बाग़ी विधायक मुख्यमंत्री नबाम तुकी को हटाना चाहते हैं.

इसी बीच राज्यपाल ने भी हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने की बात कही है.

स्थिति इसलिए भी जटिल है क्योंकि संशोधित दलबदलू क़ानून के तहत दलबदलने की अनुमति ही नहीं है. 1985 के इस क़ानून में 2004 में हुए संशोधन से पहले तक एक तिहाई संख्या होने पर सदस्य दल बदल सकते थे.

एक पार्टी दूसरी में विलय कर सकती है लेकिन मौजूदा स्थिति में ये भी नहीं हो सकता. एक पार्टी पहले विघटित हो सकती है और बाग़ी दूसरी पार्टी में शामिल हो सकते हैं लेकिन उसके लिए दो तिहाई बहुमत ज़रूरी है.

दरअसल अरुणाचल में कांग्रेस के बाग़ी विधायक अभी इस संख्या से दूर हैं.

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