नाबालिग़ को मौका मिले, पर सुधार के बाद: जस्टिस खरे

  • 21 दिसंबर 2015
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निर्भया गैंगरेप मामले में एक नाबालिग दोषी को तीन साल के बाद रिहा करने से जुविनाइल जस्टिस एक्ट पर तीखी बहस छिड़ गई है.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वीएन खरे चाहते हैं कि रिहाई से पहले नाबालिग़ अपराधी के बारे में एक प्रमाणपत्र जारी होना चाहिए कि उसमें कितना सुधार हुआ है.

बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा कि देखा जाना चाहिए कि दोषी को अपने किए पर कितना पछतावा है और वो ख़ुद को सुधारना भी चाहते हैं या नहीं?

जस्टिस खरे का कहना था कि नाबालिग़ मुजरिम को सुधारगृह भेजने का मक़सद यही होता है कि उसे सुधरने का भरपूर मौक़ा मिले और वह सामान्य जीवन फिर शुरू कर सके.

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Image caption 'निर्भया' बलात्कार मामले का नाबालिग मुजरिम.

वो मानते हैं, "नाबालिग दोषी को सुधरने का मौक़ा ज़रूर मिलना चाहिए वर्ना वह हार्डकोर अपराधी बन जाएगा. पर यह सुधार अंदर से होना चाहिए और दिखना भी चाहिए. यदि उसमें सुधार नहीं हुआ हो तो उसे सुधारगृह में रखने का मक़सद ही पूरा नहीं होता है."

जस्टिस खरे कहते हैं, "इसलिए उसे एक सर्टिफ़िकेट दिया जाए कि वह वाक़ई सुधर गया है. जब तक यह सर्टिफ़िकेट नहीं मिले, तब तक उसे सुधारगृह से रिहा न किया जाए."

Image caption निर्भया के परिजन नाबालिग मुजरिम को नहीं छोड़ने की मांग कर रहे हैं.

लेकिन न्यायधीश खरे का कहना था कि क़ानून में सुधार का असर मौजूदा मामलों पर नहीं पड़ेगा क्योंकि किसी भी क़ानून के पास होने के समय के पहले के मुक़दमों पर उसे लागू नहीं किया जा सकता है.

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इसका मतलब ये है कि यदि जुविनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन कर भी दिया जाए तो निर्भया केस में इस आधार पर फ़ैसला नहीं लिया जा सकता.

दिल्ली के निर्भया केस में नाबालिग़ अपराधी को छोड़े जाने के बाद ये मांग उठी है कि जुविनाइल जस्टिस एक्ट के तहत नाबालिग़ की उम्र 18 साल से घटा कर 16 साल की जाए.

इस मामले को लेकर दिल्ली में रविवार को भी विरोध प्रदर्शन हुए हैं.

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