गाय बचाने की मुहिम में जुटा है यह मुसलमान

  • 21 दिसंबर 2015

“गाय काटने वालों ने मेरे भाई को मार डाला. मैं उनको कैसे छोड़ सकता हूँ?”

मेरठ के तीस साल से भी कम उम्र के आसिफ़ जब ये कहते हैं तो उनका चेहरा ग़ुस्से और ग़म दोनों में तमतमाता दिखता है.

भाई के मौत का ग़म और गाय को काटने वालों के प्रति उनका ग़ुस्सा, क्या ज़्यादा है, इसका अंदाज़ आप लगाते रहिए, तब तक आसिफ़ आपको बीते 18 महीने के दौरान गाय बचाने के लिए किए गए कामों की फ़हरिस्त सुनाने लगते हैं.

मेरठ के सिद्दीक़ी नगर के इस नौजवान ने पिछले कुछ दिनों एक दर्जन के आसपास ऐसे वाहन पकड़वाए हैं जिनपर आरोप है कि वो गायों को काटने के लिए ले जा रहे थे.

इन्होंने अपने साथियों संदीप पहल और राहुल ठाकुर के साथ मिलकर दस के आसपास मिनी कमेले (पशु वधशाला) भी बंद कराए हैं.

संदीप पहल गौ रक्षा के लिए सच के नाम से सोसाइटी चलाते हैं और राहुल ठाकुर ने श्री कृष्णन गौ रक्षा दल बना रखी है जो हज़ारों गायों की जान बचाने का दावा करती हैं.

गाय को बचाने का सिलसिला आसिफ़ के परिवार के लिए नया मसला भर नहीं है. दरअसल आसिफ़ के भाई दिलशाद 2001 से ही गैर-क़ानूनी कमेलों के ख़िलाफ़ मुहिम चला रहे थे.

पिछले साल 27 जून को उन्हें गोली मार दी गई और इस साल 22 जनवरी को उनकी मौत हो गई.

आसिफ़ के अनुसार दिलशाद ने सौ के क़रीब अवैध छोटे कमेले बंद कराए और कितने ही मुस्लिम कसाईयों के ख़िलाफ़ मेरठ के लिसाड़ी गेट, दिल्ली गेट और ब्रह्मपुरी थानों में केस दर्ज कराए.

आसिफ़ ने पुलिस को अपनी शिकायत में लिखा कि उसके भाई के हत्यारों ने गोली मारने से पहले दिलशाद को गाली देते हुए उन पर धंधा चौपट कराने का आरोप लगाया था.

Image caption आसिफ़ और दिलशाद के पिता शकील अहमद, अपने घर के सामने.

दिलशाद की हत्या के संबंध में पांच लोगों को नामज़द किया गया है. चार अभियुक्त अभी जेल में हैं.

आसिफ़ बताते हैं कि उनके और उनके भाई के गायों की सुरक्षा के प्रति जुनून की वजह से ज़्यादातर मुसलमान क़साई उनको हिन्दू कहते हैं. उन्होंने कहा, “वो हमसे नफ़रत करते हैं, वो कहते थे कि दिलशाद तो पंडत बन गया है.”

तनाव की वजह से दिलशाद की अम्मा नजमा बेगम का कुछ दिन बाद इंतक़ाल हो गया और अब्बा मोहम्मद शकील अहमद (60 साल से ऊपर) बीमार रहने लगे हैं. आसिफ़ के अनुसार “वो यही सोचते रहते हैं की हमारा क्या होगा.”

दिलशाद के बाद, आसिफ़ के दो भाई आरिफ़, इमरान और एक बहन शबाना हैं. सारा परिवार एक मुसलमान-बाहुल्य निम्न मध्यम वर्गीय कालोनी सिद्दीक़ी नगर में रहता है. कालोनी एक खुले नाले के दोनों तरफ़ बसी है. दिलशाद का परिवार कपड़े का व्यापार करता है.

पहल सुप्रीम कोर्ट में वकील भी हैं. वो बताते हैं कि पहले दिलशाद गाय तस्करी करने वालों के ख़िलाफ़ मुहिम में शामिल थे और अब आसिफ़.

पहल की जान को भी ख़तरा है और मेरठ की लोकल इंटेलिजेंस यूनिट ने उनको मुस्लिम इलाक़ों में जाने को मना किया हुआ है.

Image caption मेरठ में गाय बचाने की मुहिम के साथी हैं राहुल ठाकुर.

राहुल ठाकुर पर भी पांच जानलेवा हमले हो चुके हैं. वो बताते हैं कि अपने मुसलमान साथियों और पहल के साथ मिलकर वो अब तक क़रीब 9000 गायों की जान बचा चुके हैं.

लिसाड़ी गेट पुलिस स्टेशन के मुख्य रवींद्र यादव जो दिलशाद भारती केस के इंचार्ज भी हैं बताते हैं उन्होंने पिछले दो साल में 100 के क़रीब लोगों के ख़िलाफ़ अवैध पशु काटने को लेकर कार्रवाई की है.

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