तमिलनाडु में अदालत के दर पर भगवान !

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समझ से परे है कि 'भगवान के अपने देश' केरल के ठीक पड़ोस में बार-बार ऐसा क्यों होता है कि भगवत लीला सवालों के घेरे में आ जाती है.

उन सवालों का हल आसानी से नहीं निकलता और हर दफ़ा मामला कोर्ट कचहरी तक पहुंच जाता है.

क़रीब दो दशक पहले तमिलनाडु में विवाद इस विषय पर था कि भगवान कौन सी भाषा बोलते और समझते हैं. पूछा जा रहा था कि अगर पूजा अर्चना संस्कृत की जगह तमिल में हो, मंत्र तमिल में पढ़े जाएं तो भगवान को क्या समस्या होगी?

क्या भक्त की प्रार्थना स्वीकार नहीं होगी?

अर्चकों-पुजारियों ने इसका कड़ा विरोध किया. उनका तर्क था मंत्रों की शक्ति देवभाषा संस्कृत में निहित है. भाषा बदलने पर मंत्र अपनी शक्ति खो देंगे. लेकिन ग़ैर-ब्राह्मण वर्ग इससे सहमत नहीं था.

विवाद इस क़दर बढ़ा कि उसने राजनीतिक शक्ल ले ली. एक अरसे तक रस्साकशी चलती रही. तमिल में प्रार्थना का विरोध खुलकर कोई नहीं कर रहा था, लेकिन राजनीतिक दलों में सशक्त उच्च वर्ग को नाराज़ करने का साहस भी नहीं था.

दूसरी तरफ़, वोट की राजनीति उन्हें व्यापक ग़ैर-ब्राह्मण वर्ग के ख़िलाफ़ जाने से रोक रही थी.

जब सवाल प्रेस कॉन्फ्रेंस में और रास्ता चलते पूछा जाने लगा, तो एक मंत्री ने ग़ुस्से में कहा, "अगर भगवान तमिल नहीं समझते तो उन्हें तमिलनाडु में रहने का हक़ नहीं है."

यह मामला अदालत में गया पर पूरी तरह नहीं सुलझा. लेकिन इसी बीच सत्तर के दशक का एक दूसरा मुक़दमा सुनवाई के लिए पेश हो गया.

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इस बार सवाल था कि मंदिर के पुजारी के रूप में क्या ब्राह्मण के अलावा किसी और की नियुक्ति की जा सकती है? पूजा पद्धति में प्रशिक्षित और वेदों, पुराणों, आगम शास्त्र में दक्ष किसी अन्य वर्ण के व्यक्ति को पुजारी क्यों नहीं बनाया जा सकता?

राज्य सरकार ने इसे संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के हनन की तरह देखा. तर्क दिया गया कि पुजारी होने पर केवल एक वर्ण का विशेषाधिकार कैसे हो सकता है. दूसरी ओर, पुजारी इसे अपने संवैधानिक अधिकारों के हनन के रूप में पेश कर रहे थे.

सन 1971 में तमिलनाडु की तत्कालीन सरकार ने क़ानून में संशोधन करते हुए कहा कि वेदों में प्रशिक्षित कोई व्यक्ति मंदिर का पुजारी नियुक्त किया जा सकता है, चाहे वह किसी वर्ण या जाति का हो. समानता का अधिकार मंदिर में भी लागू होना चाहिए.

मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंचा तो अदालत ने यह कहकर उसे वहीं छोड़ दिया कि मंदिर में ‘पंडित-पुजारी की नियुक्ति सिर्फ़ शास्त्र के प्रावधानों के अंतर्गत की जा सकती है.’ फ़ैसले के बाद मामला ठंडा पड़ा पर विवाद अपनी जगह क़ायम रहा.

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इसमें प्रश्न संविधान के सोलहवें अनुच्छेद की व्याख्या का था. तय यह किया जाना था कि पांचवीं उपधारा में दर्ज धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का विस्तार कहां तक है? क्या उसमें कर्मकांड को शामिल माना जाएगा?

सन 2006 में, द्रविड़ मुनेत्र कषगम की सरकार ने दोबारा इसी आशय का एक आदेश जारी किया, जिसे आदि शैव शिवचार्यार्गल नाल संगम ने अदालत में चुनौती दी.

न्यायमूर्ति राजन गोगोई और एनवी रमणा ने कहा कि अर्चकों की ‘नियुक्ति शास्त्रोक्त आधार पर होने में संविधान में दर्ज समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं होता.’

पीठ ने शासकीय आदेश को खारिज नहीं किया लेकिन यह कहते हुए सभी हिंदू वर्णों के लिए अर्चकों की नियुक्ति का पट ज़रा सा खोल दिया कि भविष्य में ‘ऐसे किसी विवाद में राज्य सरकार के आदेश को भी ध्यान में रखा जाए.’

मतलब यह कि अनुच्छेद 16 (5) के तहत अर्चकों की नियुक्ति हिंदू कर्मकांड और आगम शास्त्र के अनुरूप ही होगी लेकिन किसी मामले में विवाद होने पर अदालत देखेगी कि वह नियुक्ति संविधान सम्मत है या नहीं. उससे संविधान की किसी व्यवस्था का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है.

यानी कि एकमुश्त आदेश देने की जगह सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मुद्दों को अलग-अलग मामलों में ज़रूरी होने पर विचार के लिए छोड़ दिया.

एक तरह से देखा जाए तो अदालत के फ़ैसले ने सभी हिंदू वर्णों जातियों के लिए मंदिर में अर्चना का कपाट खोलने की जगह और मुक़दमेबाज़ी के लिए न्यायालय के कपाट खोल दिए हैं. मामला हल होने की जगह और उलझ गया है.

अदालत के फ़ैसले को केवल इस अर्थ में स्वागत योग्य कहा जा सकता है कि उसने सभी वर्णों के लिए मंदिरों के दरवाज़े थोड़ा और खोल दिए हैं. इस संभावना को कुछ और प्रबल बना दिया है.

लेकिन इसे क्रांतिकारी निर्णय कहना शायद उचित नहीं होगा क्योंकि दरवाज़ा जितना खुला है उतना ही बंद भी है. हर बार उसे खोलने के लिए अदालत की शरण में जाना पड़ेगा.

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