पल्प फ़िक्शनः बदल रहा है अछूतपन का नज़रिया

हिंदी साहित्य

अंग्रेजी में जिसे पल्प फिक्शन कहा जाता है उसे हिंदी में घासलेटी या लुगदी साहित्य कहा जाता है.

हालांकि पल्प पिक्शन भी सम्मानजनक नाम नहीं था लेकिन इस श्रेणी के तहत निकली पुस्तकें पश्चिमी समाज में एक वैधता प्राप्त कर चुकी हैं. इसी कारण अब उन्हें 'बेस्टसेलर' भी कहा जाता है.

दुर्भाग्य से हिंदी में ऐसा नहीं रहा और हमारे यहां इस तरह के साहित्य को हेय दृष्टिकोण से देखा जाता रहा है. मीडिया उसकी तरफ ध्यान नहीं देता, अखबारों और पत्रिकाओं में ऐसी पुस्तकों या लेखकों पर चर्चा नहीं होती.

ऐसा नहीं है कि हिंदी में इस तरह के लोकप्रिय साहित्य को वैधता नहीं थी. देवकी नंदन खत्री या गोपाल राम गहमरी को कौन भूल सकता है? पर धीरे धीरे हिंदी अध्यापक केंद्रित अकादमिक जगत ने, जिसे अखबारों और पत्रिकाओं का भी सहयोग मिला, लेखन में एक नई वर्णव्यवस्था कायम कर दी.

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और कुशवाहा कांत, गुलशन नंदा, रानू, कर्नल रंजीत, इब्न सफी, ओम प्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक या वेदप्रकाश शर्मा जैसे लेखक 'ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत’ की श्रेणी में डाल दिए गए.

इनके लाखों पाठक रहे और आज भी हैं पर वे पाठक भी आत्मचेतना के स्तर पर साहित्य के पाठकों से अपने को हीनतर समझते हैं. मिसाल के लिए सुरेंद्र मोहन पाठक के विमल श्रृंखला के उपन्यासों में भारतीय अपराध जगत की व्यापक झलत मिलती है.

इसी तरह की रचना है मारियो पूजो की 'गॉडफादर’ (हालांकि उसका कैनवास ज्यादा बड़ा है) जो बेहद चर्चित हुई और उस पर फिल्में बनीं. वह अमरीकी संस्कृति के एक दौर को समझने का माध्यम भी है.

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मगर समानांतर सच यह भी है कि अगर किसी ने सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यासों को लेकर मौजूदा भारतीय समाज में फैलते अपराध के तानेबाने को समझने की कोशिश की तो उसे हिंदी समाज में, और भारतीय समाज में भी, संजीदा नहीं समझा जाएगा.

स्वीडन के एक लेखक थे स्टीग लार्सन. उन्होंने मिलेनियम श्रृंखला के तहत 'गर्ल विथ द ड्रैगन टैटू’ और दो अन्य उपन्यास लिखे. इस श्रृंखला के उपन्यासों ने वर्तमान स्वीडिश समाज के अंतरविरोधों को उजागर किया. इस श्रृंखला के उपन्यासों पर फिल्में बन चुकी हैं.

इसी तरह स्वीडन की एक लेखक जोड़ी है- माज स्जोवाल और पेर वाहलू (वाहलू का निधन हो गया है). पति- पत्नी की इस जोड़ी ने पुलिस केंद्रित जो उपन्यास लिखे उन्होंने स्वीडन के बेहतर कल्याणराज्य होने के मिथक को धवस्त कर दिया. नार्वेजियन लेखन जो नेस्बों की आजकल काफी धूम है और उसी तरह जापानी लेखक कीगो हीगाशीनो की.

हिंदी में जो लोकप्रिय कहे जाने वाले उपन्यासों के प्रकाशक हैं वे खुद भी इस विधा को गंभीरता से नहीं लेते. हालांकि ये दृष्टि अब धीरे धीरे बदल रही है. इसका कुछ श्रेय अंग्रेज़ी में लिखने वाले भारतीय लेखकों को भी दिया जा सकता है.

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अमिश त्रिपाठी और चेतन भगत के उपन्यास ना सिर्फ अंग्रेज़ी में बहुत मशहूर हुए बल्कि उनके हिंदी अनुवाद भी खूब बिके. हिंदी के लोकप्रिय साहित्य की कड़ी में इस साल आई किताबों में रवीश कुमार की 'इश्क में शहर होना', शशिकांत की 'नॉन रेज़िडेंट बिहारी' और सुरेंद्रमोहन पाठक की 'क्रिस्टल लॉज' प्रमुख हैं.

इस साल एक बड़े प्रकाशक ने सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यास को छापा है, लगभग उतनी ही गंभीरता से जितना कि किसी साहित्यिक कृति को छापा जाएगा. एक अन्य बड़े प्रकाशक ने लोकप्रिय साहित्य की श्रंखला भी शुरू की है.

इन श्रंखलाओं में छपने वाले उपन्यास पल्प फिक्शन तो नहीं कहे जा सकते, लोकप्रिय ज़रूर कहे जा सकते हैं और उनमें बदलते परिवेश, निजी दुविधा, अकेलापन बहुत ईमानदारी से अंकित हुआ है. भाषा में चटखपन है तो कहीं कहीं शहरीपन भी. अंग्रेज़ी के शब्दों से परहेज़ नहीं. ठीक वैसे ही लिखे गए हैं जैसे बोले जाते हैं.

ये कहना गलत नहीं होगा कि इस साल हिंदी में लोकप्रिय साहित्य की एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, जो ना सिर्फ भाषा की ताज़गी लिए है बल्कि प्रयोगात्मक है और शैली में नए प्रयोग करने से डरती नहीं.

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