क्यों दुविधा में है सीपीएम?

  • 27 दिसंबर 2015
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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) इस समय दुविधा में है. साल 2011 में पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर होने के बाद उसकी लोकप्रियता लगातार घट रही है.

पिछले चार साल के दौरान हुए चुनावों में सीपीएम और उसके सहयोगियों की एक के बाद एक शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है.

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक घटनाक्रम से एेसे संकेत मिल रहे हैं कि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस से लोगों का मोहभंग हो रहा है और पिछले कुछ चुनावों में उसका वोट प्रतिशत घटा है.

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लेकिन इनका लाभ सीपीएम के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे को नहीं, बल्कि बीजेपी को मिला है. 2014 के आम चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर चार फ़ीसदी से बढ़कर 17 फ़ीसदी हो गया जबकि टीएमसी ने 39 फ़ीसदी वोट के साथ ज़्यादातर सीटों पर कब्ज़ा किया.

इन चुनावों में वाम दलों का वोट शेयर घटकर 30 फ़ीसदी रह गया जबकि कांग्रेस के खाते में 9.5 फ़ीसदी वोट आए थे.

अब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीने बचे हैं और सीपीएम के कुछ स्थानीय नेताओं ने कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन बनाने की कोशिश शुरू कर दी है ताकि टीएमसी और बीजेपी को चुनौती दी जा सके.

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पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, श्यामल चक्रवर्ती, सुजान चक्रवर्ती, अशोक भट्टाचार्य जैसे नेताओं का मानना है कि यदि वाम दल और कांग्रेस का गठबंधन हो जाता है तो वे सत्ताधारी दल को अच्छी चुनौती देने की स्थिति में आ जाएंगे.

दक्षिण 24 परगना के बड़े नेता कांति गांगुली ने सार्वजनिक रूप से यह मांग की है कि पार्टी के बड़े नेताओं को कार्यकर्ताओं को मिल रहे फ़ीडबैक पर ध्यान देना चाहिए और कांग्रेस के साथ गठबंधन करना चाहिए ताकि पश्चिम बंगाल में टीएमसी को पराजित किया जा सके.

हालांकि सीपीएम का केन्द्रीय नेतृत्व फ़िलहाल उलझन में है. 2016 की शुरुआत में केरल और पश्चिम बंगाल दोनों ही राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. केरल में पार्टी का मुक़ाबला कांग्रेस के साथ ही है जो सत्ता में है.

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पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ किसी भी तरह का तालमेल केरल में वाम दलों के लिए मुश्किलें पैदा करेगा. केन्द्रीय नेतृत्व इस बात से सहमत हो सकता है कि कांग्रेस के साथ तालमेल पश्चिम बंगाल में उसे चुनावी फ़ायदा दे सकता है लेकिन वह इसके लिए सहमत नहीं होगा.

दूसरी तरफ कांग्रेस का एक वर्ग भी पश्चिम बंगाल में सीपीएम के साथ चुनावी गठबंधन के पक्ष में है.

मानस भुइयां और कुछ दूसरे नेताओं खुले तौर पर इस बारे में अपनी आवाज़ बुलंद की है लेकिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने यह फ़ैसला आलाकमान पर छोड़ दिया है.

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सीपीएम नेता सुजान चक्रवर्ती का कहना है कि उनकी पार्टी कांग्रेस के रुख़ को भांपने के लिए 'इंतजार करो और देखो' की नीति अपनाएगी.

उन्होंने कहा, "अगर कांग्रेस गठबंधन के लिए तैयार नहीं है तो उसके पास प्रस्ताव भेजने का कोई फ़ायदा नहीं है." कांग्रेस के साथ तालमेल के लिए सीपीएम को सहयोगी दलों को भी साथ लेना ज़रूरी है जो संभव होता नहीं दिख रहा है.

सीपीआई, फ़ॉरवर्ड ब्लॉक और आरएसपी भी कांग्रेस के साथ गठबंधन के घोर विरोधी है और उन्होंने साफ तौर पर अपनी राय पहले ही जाहिर कर दी है.

इस पृष्ठभूमि में सीपीएम का रविवार से कोलकाता में महाधिवेशन हो रहा है जो 30 दिसंबर तक चलेगा.

पार्टी ने शनिवार को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक जनसभा की.

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इस महाधिवेशन को संगठन में नई जान फूंकने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है क्योंकि पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर होने के बाद से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर चले गए हैं.

पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को रिटायर करने और युवाओं को अहम पदों पर बिठाने की मांग भी लंबे समय से की जा रही है. उम्मीद की जा रही है कि इससे नई पीढ़ी पार्टी की ओर आकर्षित होगी.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या केवल बुज़ुर्ग नेताओं को बदलना पार्टी के लिए रामबाण साबित होगा? पार्टी के पास लोगों को देने के लिए क्या राजनीतिक संदेश है?

बीते 25 सालों में दुनिया का राजनीतिक परिदृश्य तेज़ी से बदला है. सोवियत संघ और उसके ईस्ट यूरोपियन ब्लॉक का अस्तित्व मिट चुका है, चीन पूंजीवाद के रास्ते पर चल पड़ा है.

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कई लातिन अमरीकी देशों में वाम दल संसदीय प्रक्रिया के तहत सत्ता पर काबिज़ हुए हैं और बंदूक के दम पर क्रांति का संदेश अब युवाओं को आकर्षित नहीं करता है.

बढ़ती बेरोज़गारी और उद्योगों में निवेश की कमी ने पश्चिम बंगाल के युवाओं को निराश कर दिया है और उन्होंने दूसरी राजनीतिक विचारधारा का रुख़ करना शुरू कर दिया है जो उन्हें आर्थिक विकास का वादा करती है.

2014 के आम चुनावों में बीजेपी को मिला समर्थन इसी बात को दिखाता है. हालांकि वाम दल समझ नहीं पा रहे हैं कि इस स्थिति से कैसे निपटा जाए.

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राजनीति में पूरी तरह सक्रिय नहीं रह गए बुद्धदेव भट्टाचार्य का मानना है कि औद्योगिकीकरण ही पश्चिम बंगाल के विकास का एकमात्र रास्ता हैं लेकिन भूमि अधिग्रहण की समस्या का उनके पास कोई समाधान नहीं है.

पश्चिम बंगाल जैसे घनी आबादी वाले राज्य में किसी नए उद्योग के लिए ज़मीन उपलब्ध कराने से बड़ी संख्या में विस्थापन होगा. सिंगुर और नंदीग्राम का उदाहरण आज भी लोगों के दिमाग में है जो वाम दलों के सत्ता से बाहर होने का मुख्य कारण बना था.

सीपीएम के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि भूमि अधिग्रहण के मुद्दे से पार्टी कैसे निपटेगी. पार्टी के पास राज्य के आर्थिक विकास को फिर से पटरी पर लाने की कोई ठोस योजना नहीं है और यही वजह है कि वह इस सवाल से बच रही है.

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इन सवालों का जवाब देने के बजाय सीपीएम ने अपनी पूरी ताक़त ममता बनर्जी और उनकी सरकार के नकारात्मक कामों को उजागर करने में लगा दी है.

पार्टी नेताओं को यह भी पता है कि केवल इसके सहारे वे टीएमसी को सत्ता से बेदखल नहीं कर सकते लेकिन किसी सकारात्मक राजनीतिक योजना के अभाव में उन्होंने अपनी सारी उम्मीदें कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन पर लगा दी है.

बुद्धदेव भट्टाचार्य ख़ुद स्वीकार करते हैं कि फ़िलहाल टीएमसी ही फिर से सत्ता में आती दिख रही है.

चुनावों के लिए एक उचित रणनीति बनाने पर दुविधा और बदलते वक़्त के मुताबिक़ न ढल पाने से सीपीएम दुविधा की स्थिति में दिख रही है.

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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