'घोटालों की बात आज़ाद के लिए नई बात नहीं'

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भारतीय जनता पार्टी से निलंबित दरभंगा से सांसद कीर्ति आज़ाद के लिए न तो दिल्ली के क्रिकेटरों के समर्थन में आवाज़ उठाना नई बात है और न दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन में वित्तीय घोटालों की बात.

बीते एक दशक से आज़ाद अरुण जेटली के ख़िलाफ़ उनके डीडीसीए अध्यक्ष रहते हुए कथित भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे हैं.

कीर्ति युवावस्था से ही खरी-खरी, सीधी और आक्रामक अंदाज़ में बात करने और अपनी पारदर्शिता के लिए जाने जाते रहे हैं. उन्हें बुरा को बुरा कहने में कभी हिचकिचाहट नहीं हुई, ठीक अपनी बल्लेबाज़ी की तरह. उनकी पहचान बड़ी ही सफ़ाई से आक्रामक हिट लगाने वाले बल्लेबाज़ की रही.

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एक क्रिकेटर के तौर कीर्ति हमेशा विपक्षी टीम पर हावी होने की कोशिश करते थे. अपने समय में वे ज़ोरदार हिट लगाने वाले बल्लेबाज़ रहे. जिन्होंने उन्हें खेलते देखा है, वे आज भी याद करते हैं कि अपने छक्कों से वे किस तरह गेंद को स्टेडियम के बाहर पहुंचा दिया करते थे.

ख़ासकर स्थानीय टूर्नामेंटों में उन्हें ‘मास्टर ब्लास्टर’ कहा जाता था. वे कभी गेंदबाज़ों की प्रतिष्ठा की चिंता नहीं करते.

नेशनल कोचिंग सेंटर की ओर से एस्कार्ट्स के ख़िलाफ़ एस्कार्ट्स ट्रॉफ़ी के लिए कोटला में खेलते हुए कीर्ति ने कपिल देव और मनोज प्रभाकर की गेंदबाज़ी पर चौकों-छक्कों की झड़ी लगा दी थी. हालांकि उनकी टीम मुक़ाबला मामूली अंतर से हार गई थी, पर देखने वालों को आज भी उनकी तूफ़ानी पारी याद है.

एक अन्य मुक़ाबले में मदनलाल की कप्तानी वाले मिकींस के ख़िलाफ़ 40 ओवरों के मुक़ाबले में कीर्ति आज़ाद की शानदार बल्लेबाज़ी ने मेजबान टीम से मुक़ाबला छीन लिया. युवा आज़ाद में चीज़ों को अपने अंदाज़ में बदलने का दमखम था, वह भी तब जब उसकी उम्मीद शायद ही किसी को हो.

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कोई कीर्ति आज़ाद की 1983 में दिल्ली के नेहरू स्टेडियम में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ डे-नाइट प्रदर्शनी मैच की पारी को भी शायद ही भूल पाए, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के तेज़ गेंदबाज़ जलालुद्दीन की गेंदों पर सात छक्के लगाकार टीम को निश्चित दिख रही हार से उबारते हुए रोमांचक जीत दिलाई थी.

1984 में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच अहमदाबाद में हुए वनडे मुक़ाबले से पहले भारतीय ड्रेसिंग रूम में इसे लेकर चर्चा थी कि ज्यॉफ़ लॉसन और कार्ल रैकमैन की जोड़ी के सामने कौन ओपनिंग करेगा. राज सिंह डूंगरपुर ने मज़ाक में कह दिया, ''कीर्ति इस मैच में ओपनिंग करेंगे.'' कीर्ति आज़ाद को कभी तेज़ गेंदबाज़ों का सामना करना पसंद नहीं था, पर वे इसके लिए तैयार हो गए.

हालांकि बाद में वे मिडिल ऑर्डर में ही खेले और 30 गेंदों पर चार छक्कों की मदद से नाबाद 39 रन बनाए.

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Image caption अमृत माथुर, अरुण लाल, पीयूष पांडे के साथ खड़े हैं कीर्ति आज़ाद.

कम ही लोग जानते हैं कि कीर्ति आज़ाद में ग़ज़ब का ह्मूयर सेंस भी है. वे अपने साथियों के साथ प्रैंक भी ख़ूब करते रहे हैं. लखनऊ में खेले जाने वाले शीशमहल टूर्नामेंट में 1970 के दशक में एक बार उन्होंने पर्दों की पीछे से आवाज़ निकालकर आधिकारिक स्कोरर रहमान को डरा दिया.

रहमान इतने डर गए कि उन्होंने अपना होटल ही बदल लिया. जब उन्हें पता चला कि ये कीर्ति की कारगुज़ारी थी, तब जाकर उन्होंने राहत की सांस ली.

दिल्ली की टीम में कीर्ति के रूममेट रहे अरुण खुराना ने मज़ाक उड़ाए जाने के डर से टीम प्रबंधन से कहा था कि वे उनका कमरा बदल दें. इसके बाद वरिष्ठ क्रिकेटर सुरिंदर खन्ना सालों तक आज़ाद के रूम मेट रहे.

कीर्ति आज़ाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा कामयाबी नहीं मिली, पर वे 1980 लेकर 1990 के मध्य तक दिल्ली क्रिकेट के आधार स्तंभ रहे. उनके नेतृत्व में ही दिल्ली ने 1991-92 में 16 साल के अंतराल के बाद रणजी ट्रॉफ़ी जीतने का कारनामा दिखाया था. यह भी संयोग है कि दिल्ली जिन पांच मौक़ों पर रणजी चैंपियन बनी, उनमें खेलने वाले कीर्ति अकेले खिलाड़ी हैं.

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Image caption 1983 की वर्ल्ड कप चैंपियन टीम में शामिल थे कीर्ति आज़ाद.

अपने दिवंगत पिता भागवत झा आज़ाद की राजनीतिक विरासत संभालने वाले कीर्ति ने अपना नेतृत्व गुण भी क्रिकेट में ज़ाहिर किया है. मनोज प्रभाकर, मनिंदर सिंह, अजय जडेजा, अजय शर्मा, सुखविंदर सिंह, राहुल सांघवी, अतुल मोहिंदर और अश्विनी कपूर जैसे क्रिकेटर उनकी कप्तानी में ही उभरकर सामने आए.

कीर्ति आज़ाद 2002 से 2006 के बीच उत्तर क्षेत्र की ओर से राष्ट्रीय चयनकर्ता भी रहे. यह वो दौर था जब एमएस धोनी, पार्थिव पटेल, एल बालाजी, आकाश चोपड़ा, इरफ़ान पठान, गौतम गंभीर और श्रीसंत जैसे क्रिकेटरों ने अपना डेब्यू किया था.

कीर्ति आज़ाद सालों से डीडीसीए में फंड के इस्तेमाल में अनियमितता का आरोप लगाते आए हैं. उन्होंने उस दौर में डीडीसीए अध्यक्ष रहे अरुण जेटली से इस्तीफ़ा भी मांगा था कि वे डीडीसीए के मामले ठीक से नहीं देख पा रहे हैं. जेटली ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले डीडीसीए का अपना पद छोड़ा था.

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वैसे कीर्ति के निशाने पर केवल जेटली ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने भाजपा के साथी और वरिष्ठ क्रिकेटर चेतन चौहान के ख़िलाफ़ भी कई मुद्दों पर आवाज़ उठाई.

जब आज़ाद उत्तर क्षेत्र से राष्ट्रीय चयनकर्ता बने, तब चौहान को दिल्ली की सेलेक्शन कमेटी का चेयरमैन बनाया गया. आज़ाद ने चौहान पर आरोप लगाया था कि वे उन्हें जानकारी दिए बिना टीम चुन लेते हैं और कप्तान विजय दहिया को भी केवल टीम की जानकारी दी जाती है. कीर्ति आज़ाद, चौहान पर दूसरे के कंधों के सहारे निशाना लगाने का आरोप लगाते रहे हैं.

इसके अलावा कीर्ति आज़ाद इंडियन प्रीमियर लीग के भी कटु आलोचक रहे. उन्होंने इसे मैच फ़िक्सिंग को बढ़ावा देने वाला टूर्नामेंट बताया. आईपीएल से जुड़े विवादों में उन्होंने यह भी कहा की बीसीसीआई से जुड़ाव होने पर उन्हें ग़ुस्सा भी आ रहा है और शर्म भी.

बिशन सिंह बेदी और कीर्ति आज़ाद जैसे क्रिकेटरों की तमाम कोशिशों के बाद भी डीडीसीए में पिछले कुछ दशक में कोई बदलाव नहीं आया. ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या आज़ाद की ये कोशिश डीडीसीए में कोई बदलाव ला पाएगी?

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