भारत-पाक वार्ता और 'पाक सेना की आशंका'

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भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बेहतरी के लिए जो बातचीत चल रही है, ये साफ़ है कि उसमें पाकिस्तानी सेना की सहमति शामिल है.

पाकिस्तानी सेना भी समझती है कि रिश्तों को बेहतर करना चाहिए लेकिन उसकी आशंका इस बात को लेकर रहती है कि बातचीत केवल चरमपंथ तक ही सीमित न रह जाए और कश्मीर का मुद्दा पीछे छूट जाए.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाहौर दौरे के बाद भी यह सवाल उठा कि क्या पाकिस्तानी सेना को मोदी के इस दौरे के बारे में मालूम था.

सरकार के लोगों का कहना है कि सेना की रजामंदी के बिना इतना बड़ा फ़ैसला नहीं लिया जा सकता.

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जहां तक मोदी के अफ़ग़ानिस्तान की संसद में दिए गए भाषण में पाकिस्तान के ज़िक्र की बात है तो आप जहां पर होते हैं तो हालात के मुताबिक़ बात करते हैं.

मोदी काबुल में थे तो वो अफ़ग़ानिस्तान की बात कर रहे थे. वहां पर जंग हो रही है, चरमपंथ हैं. बाहर से भी चरमपंथी आ रहे हैं.

मोदी ने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर कहा कि कुछ ताकतें नहीं चाहती कि भारत अफ़ग़ानिस्तान में काम करे और दोनों देशों के रिश्ते बेहतर हों. मुझे लगता है कि यह इशारा पाकिस्तान की तरफ़ था.

हालांकि उन्होंने बाद में पाकिस्तान का नाम लेकर कहा कि वह दक्षिण एशिया और अफ़ग़ानिस्तान के बीच पुल का काम कर सकता है. उनका मकसद यह है कि जो अफ़ग़ान ट्रांजिट व्यापार है उसे भारत तक बढ़ाया जाना चाहिए.

लेकिन मोदी लाहौर आए तो इसका मतलब यही है कि वह पाकिस्तान से भी बात करना चाहते हैं. यह फ़ैसला तो पहले ही हो चुका है कि दोनों देशों के दरम्यान बातचीत होगी.

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मोदी के इस दौरे से पाकिस्तान में अच्छा संदेश गया है. बहुत लोगों ने इसका स्वागत किया है. उम्मीद है कि इससे बात आगे बढ़ेगी.

हालांकि अब भी दोनों देशों के रिश्ते नाजुक दौर में हैं. अभी भारत में कुछ वाकया हो जाए तो फिर सब चीजें रुक जाएंगी.

मुंबई हमले में कथित तौर पर शामिल लोगों को सज़ा देने की भारत की मांग पाकिस्तान ने अभी पूरी नहीं की है. इससे भी रिश्ते सुधरने में मुश्किल आ रही है.

(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से बातचीत पर आधारित)

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