'क्या मनुस्मृति दहन दिन मनाएगा संघ?'

  • चंद्रभान प्रसाद
  • दलित विचारक

अचानक इस बात पर सर्वसम्मति नज़र आने लगी है कि डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने संविधान लिखा था और उन्होंने अकेले ही पहला प्रारूप तैयार किया था.

इससे पहले बनावटी ज्ञान की वजह से हमें यकीन हो गया था कि एक ड्राफ़्टिंग कमेटी थी- सच है, यह थी, जिसमें बहुत से सदस्य संविधान को तैयार कर रहे थे और डॉक्टर आंबेडकर ड्राफ़्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में बस इस प्रक्रिया की अध्यक्षता कर रहे थे.

संघ परिवार की डॉक्टर आंबेडकर को महानतम शख़्सियत बताने की जल्दी से, उन्हें देश के महानतम सपूतों में से एक बताने से, आख़िरकार डॉक्टर आंबेडकर अमर हो गए हैं.

यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर डॉक्टर आंबेडकर को भारत के संविधान निर्माता के रूप में स्वीकार करने को लेकर किसी सामाजिक ताकत को संशय था तो वह दक्षिणपंथी थी, वह जो संघ की विचारधारा में गर्व करती है.

सिर्फ़ दलितों को ही नहीं, सभी नागरकों को संघ परिवार और उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा के डॉक्टर आंबेडकर को स्वीकार करने का स्वागत करना चाहिए, विशेषकर जातिवादी हिंदू समाज के दलितों को लेकर पक्षपातपूर्ण बर्ताव को देखते हुए.

एक उदाहरण बात को पूरा कर देगा- थॉमस जेफ़रसन ने 1776 में अमेरिकन डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडिपेंडेंस लिखा और उनके समाज ने उन्हें देश का तीसरा राष्ट्रपति (1801-1809) चुनकर इसके प्रति समर्थन जताया.

दूसरी ओर भारत में, देश को ऐसा संविधान देने के बाद जो बहुत अच्छा साबित हुआ है, देश के पहले संसदीय चुनावों (1951-52) में डॉक्टर आंबेडकर को हार का सामना करना पड़ा था.

साल 1954 में जब वह महाराष्ट्र की भंडारा सीट से एक उपचुनाव में दोबारा खड़े हुए तो उन्हें फिर हार ही मिली. समाज ने अपने संविधान निर्माता को क्या शानदार पुरस्कार दिया.

जब हम डॉक्टर आंबेडकर का समर्थन करने के लिए संघ परिवार की सराहना कर रहे हैं तो कुछ सवाल भी खड़े होते हैं.

डॉक्टर आंबेडकर को 21वीं सदी में उन सिद्धांतों के लिए पहचाना जाता है, सराहा जाता है जिनके लिए वह खड़े हुए और बढ़ावा दिया. क्या संघ परिवार उन सिद्धातों के लिए खड़ा होगा जिनके लिए डॉक्टर आंबेडकर ने संघर्ष किया था और अगर उनके विचारों का समर्थन नहीं करना तो डॉक्टर आंबेडकर के समर्थन का क्या मतलब है?

जैसा कि मेरे दलित साथी पूछ रहे हैं क्या संघ परिवार और इसके सहयोगी संगठन मनुस्मृति दहन दिन मनाएंगे?

डॉक्टर आंबेडकर और उनके समर्थकों ने 25 दिसंबर, 1927 को सामाजिक बंटवारे और भेदभाव का आधार तैयार करने वाली किताब मनुस्मृति को फूंका था.

मनुस्मृति आज भी छपती है, इसलिए नहीं क्योंकि जातिवादी हिंदू समाज इसे ख़रीदता है बल्कि इसलिए क्योंकि दुनिया भर के दलितों को 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिन में जलाने के लिए इसकी प्रतियां चाहिए होती हैं.

क्या संघ डॉक्टर आंबेडकर की बात का समर्थन करेगा कि "अंग्रेज़ी शेरनी का दूध है, विजेता बनने के लिए इसे पियो."

क्या संघ डॉक्टर आंबेडकर की सूट और बूट की पसंद का समर्थन करेगा- वह एकमात्र भारतीय नेता थे जो अंग्रेज़ों की तरह कपड़े पहनते थे. विरोध जुलूसों के दौरान भी!

डॉक्टर आंबेडकर मांसाहारी थे, क्या संघ परिवार उनके पसंद के खाने का समर्थन करेगा. यह खाने के बंटवारे का मुद्दा जानबूझकर उठाया जा रहा है क्योंकि खाने के साथ भाषा, कपड़े और जीवनशैली संस्कृति नाम की चीज़ के मूल पहलू हैं.

यक़ीनन डॉक्टर आंबेडकर की सांस्कृतिक पसंद, समाजिक झुकाव, राजनीतिक विश्वास पश्चिमी थे. क्या संघ परिवार इस पर भी डॉक्टर आंबेडकर का समर्थन करेगा.

हिंदुत्व के बारे में क्या होगा? डॉक्टर आंबेडकर ने बुद्धत्व को चुना क्योंकि उनके लिए हिंदुत्व बकवास है.

क्या संघ इस मुद्दे पर उनका समर्थन करेगा और राम, कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, वेद, गीता आदि को छोड़ देगा.

डॉक्टर आंबेडकर के आर्थिक विचारों का क्या होगा? पहले संसदीय चुनाव (1951-52) के पहले घोषणापत्र में उन्होंने कहा था-

(1) खेती में मशीनों का प्रयोग होना चाहिए. भारत में अगर खेती के तरीके आदिम बने रहेंगे तो कृषि कभी भी समृद्ध नहीं हो सकती.

(2) मशीनों का प्रयोग संभव बनाने के लिए छोटी जोत के बजाय बड़े खेतों पर खेती की जानी चाहिए.

डॉक्टर आंबेडकर अमरीका से समझौता भी करना चाहते थे, अमरीकियों को ग़लत और सही बताने के लिए नहीं बल्कि उनसे सीखने के लिए, पैसा और तकनीक उधार लेने के लिए.

क्या संघ परिवार इस मुद्दे पर आंबेडकर का समर्थन करेगा? संघ के जगत गुरु के दावे का क्या होगा?

जैसा कि लेख के शुरू में कहा गया था उसे दोहराते हुए- भारत की दक्षिणपंथी शाखा डॉक्टर आंबेडकर और दलितों को भी स्वीकार करने को तैयार हो रही है तो यह स्वागतयोग्य है.

कहा तो यह जाता है कि हम किसी विचारधारा से संचालित नहीं हो सकते, हम ऐसी किसी विचारधारा का अपमान नहीं कर सकते जिससे हम सहमत नहीं लेकिन बाबा साहेब आंबेडकर, दलितों का सफलतापूर्क समर्थन करने के लिए संघ को खुद में खुली भावना लानी होगी, हाथ में लाल गुलाब लेकर बदलते भारत का स्वागत करना होगा.

क्योंकि जो बदलाव का विरोध कर रहे हैं वह डॉक्टर आंबेडकर का विरोध कर रहे हैं और साथ ही एक प्रेरक विचार के रूप में भारत का भी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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