'पढ़ाई पंच-सरपंच के लिए ज़रूरी, विधायकों के लिए नहीं'

  • 29 दिसंबर 2015
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हरियाणा पंचायती राज एक्ट संशोधन के मुताबिक अब केवल पढ़े-लिखे लोग ही पंचायतों में चुनाव लड़ सकेंगे.

इस पर लगाई गई रोक पर सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर को फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष को सही ठहराया.

सामान्य वर्ग के लिए 10वीं, महिलाओं और अनुसूचित जाति के लिए 8वीं तक का पैमाना तय किया गया है.

अनुसूचित जाति से पंच बनने की इच्छुक महिलाओं के लिए 5वीं कक्षा पास करने का पैमाना निर्धारित हुआ है.

सरकार ने इस संशोधन से पंचायतों की शैक्षिक योग्यता तो निर्धारित कर दी है, लेकिन सवाल यह भी खड़ा हुआ है कि संसद और विधानसभाओं में जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं की शैक्षिक योग्यता का भी कोई पैमाना होगा क्या?

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Image caption हरियाणा के कृषि, ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री ओम प्रकाश धनखड़

इस सवाल पर हरियाणा के कृषि, ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री ओम प्रकाश धनखड़ का मानना है कि इसकी ज़रूरत नहीं है, क्योंकि सांसदों और विधायकों को सरपंचों की तरह लेखा-जोखा नहीं रखना होता है.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "आम तौर पर विधायकों और मंत्रियों को वो काम नहीं करने होते जो सरपंच को करने होते हैं. सरपंच और पंचायतें एक साथ कार्यपालिका और व्यवस्थापिका भी हैं."

वो आगे कहते हैं, "इसलिए सरपंच का पढ़ा लिखा होना ज़रूरी है. सरपंच को लेखा-जोखा भी तैयार करना पड़ता है. लेकिन विधायक और सांसद सिर्फ नियम-कानून कैसे बने इस पर विचार करते हैं."

सितंबर में जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की तरफ से हरियाणा पंचायती राज एक्ट में किए गए संसोधन पर रोक लगाई थी तो कई संभावित उम्मीदवारों को उम्मीद जगी थी कि वे पंचायत का अगला चुनाव लड़ पाएंगे.

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Image caption सरपंच और बीडीसी मेंबर का चुनाव लड़ चुकीं हिसार की कमलेश

लेकिन कोर्ट के इस फैसले ने इन उम्मीदवारों को निराश किया है. सरपंच और बीडीसी मेंबर का चुनाव लड़ चुकीं हिसार की कमलेश को इस बार जीत की पूरी उम्मीद थी.

लेकिन कम पढ़ी-लिखी होने के चलते वह भी चुनाव नहीं लड़ सकेंगी.

कमलेश कहती हैं, "बीडीसी के चुनावों में मैं पिछली बार 11 वोटों से हारी थी. इस बार मुझे जीत की पूरी उम्मीद थी. लेकिन अब मैं चुनाव नहीं लड़ पाउंगी. इस संशोधन से अनपढ़ लोगों को बहुत दुख पहुंचा है."

इस संशोधन से नाखुश लोगों का तर्क है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी शिक्षा मुहैया नहीं करा पाना सरकारों की असफलता है, ऐसे में शिक्षा को चुनाव लड़ने का पैमाना बनाना एकदम ग़लत है.

इसके ख़िलाफ़ याचिका दायर करने वाली जगमती सांगवान कहती हैं, "अपने नागरिकों को शिक्षित नहीं कर पाना सरकारों की विफलता है. अब शिक्षा को चुनाव लड़ने का पैमाना बनाकर सरकारें अपनी असफलता के डंडे से जनता को पीट रही हैं और ये अन्यायपूर्ण है."

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Image caption जगमती सांगवान

हिसार के निवर्तमान जिला पार्षद सुरेश कुमार भी पढ़े-लिखे नहीं हैं. लेकिन राजनीति में काफी सक्रिय हैं. नए नियमों के मुताबिक अब वह भी आने वाले चुनाव नहीं लड़ सकेंगे.

इसे लेकर वह काफी नाराज हैं और कहते हैं, "हमारे संविधान ने हमें आर्थिक-सामाजिक बराबरी नहीं दी लेकिन राजनीतिक बराबरी तो दी है. लेकिन इस संशोधन ने तो इस राजनीतिक बराबरी के अधिकार को भी छीन लिया है."

लेकिन कृषि, ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ को हरियाणा पंचायत राज एक्ट में हुए इस संशोधन से काफी उम्मीदें हैं.

वह कहते हैं, "हम हरियाणा के एक तिहाई गांवों में ग्राम सचिवालय बना रहे हैं. हर तीन ग्राम पंचायतें उस सचिवालय से जुड़ जाएंगी."

उन्होंने कहा, "इन सचिवालयों में हर किस्म की जानकारी कंप्यूटर में होगी. आज देश डिजिटल इंडिया के रास्ते पर जा रहा है."

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वह आगे कहते हैं, "ग्रांम पंचायतों के काम भी कंप्यूटर और इंटरनेट के ज़रिए हो रहे हैं. ऐसे में शिक्षित लोग इस काम को ज़्यादा बेहतर कर सकेंगे."

अनुसूचित जाति बहुल ग्रामसभा डंढूर के 64 वर्षीय पूर्व सरपंच फुला राम कहते हैं, "सरकार की ओर से सरपंचों को सेक्रेटी दिया जाता था जो उन्हें पढ़ने-लिखने के काम में मदद करता था और पंचायत सदस्यों में से भी कई लोग पढ़े-लिखे होते हैं."

वह कहते हैं, "यह मानना ग़लत है कि अनपढ़ लोग पंचायतें नहीं चला सकते. ये ज़्यादती है."

इस संशोधन में शिक्षा के पैमाने के अलावा शौचालय की अनिवार्यता और बिजली बिल का बकाया न होना, बैंक लोन न होना और गंभीर अपराधों में चार्जशीट दाखिल न होना जैसी शर्तें भी शामिल हैं.

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जगमती सांगवान कहती हैं, "इसका असर यह होगा कि 83 प्रतिशत दलित महिलाएं और 71 प्रतिशत सामान्य श्रेणी की महिलाएं चुनाव नहीं लड़ सकेंगी."

उन्होंने कहा, "अगर पांचों शर्तों को लागू किया जाता है तो 75 फीसदी लोग चुनाव नहीं लड़ पाएंगे."

हालांकि ओम प्रकाश धनखड़ कहते हैं, "यह तर्क इस लिहाज़ से तो बढ़िया है कि इतने अधिक लोग चुनाव लड़ने से वंचित हो जाएंगे. लेकिन हरियाणा की सारी आबादी चुनाव लड़ने नहीं जाती. ढाई करोड़ में से करीब 7.20 लाख लोग चुनाव लड़ते हैं. ये चयन उसमें से होना है."

जगमती सांगवान कहती हैं कि यह संशोधन उन जगहों पर व्यावहारिक आधार पर भी संभव नहीं है जहां दलित महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हैं.

वह कहती हैं, "एक ब्लॉक में नौ गांवों के अंदर 11 वॉर्डों में एक भी दलित महिला इन शर्तों के मुताबिक योग्य नहीं है. ऐसे में दलित महिला के लिए आरक्षित सीट में कौन चुनाव लड़ पाएगा?"

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के चलते हरियाणा सरकार को पंचायती राज एक्ट में किए गए संशोधन के मामले में काफी बल मिला है.

लेकिन इस संशोधन से कई पंचायत स्तर के नेताओं के सारे समीकरण बिगड़ गए हैं.

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