'नगर को गांव' बनाने के लिए आदिवासियों का आंदोलन

  • 29 दिसंबर 2015
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छत्तीसगढ़ के प्रेमनगर में नगर पंचायत के चुनाव सोमवार को ख़त्म हुए, लेकिन एक नगर पंचायत का किस्सा कुछ अजीब सा है.

सूरजपुर ज़िले का प्रेमनगर इस बात का उदाहरण है कि हुकूमत कैसे एक ग्राम पंचायत को रातों रात नगर पंचायत में तब्दील कर देती है.

प्रेमनगर के लोगों का आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि उन्हें आदिवासी अधिकारों से वंचित रखा जाए और वो सरकार की योजना में बाधा न पहुँचाएं.

एक सरकारी कंपनी प्रेमनगर में पावर प्लांट लगाना चाहती थी और ग्राम पंचायत इसका विरोध कर रही थी.

आदिवासी विशेष अधिकार क़ानून के तहत ये संभव भी है. लेकिन सरकार ने ग्राम पंचायत का चरित्र ही बदल दिया और उसे नगर पंचायत बना दिया.

नगर पंचायत में पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया यानि 'पेसा' क़ानून लागू नहीं होता है. दिसंबर में पेसा क़ानून को लागू हुए 20 साल पूरे हो गए हैं.

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चुनाव में अध्यक्ष पद की एक उम्मीदवार भद्रसानी सिंह ने कहा, "मैं अगर नगर पंचायत का चुनाव जीती तो सबसे पहले नगर पंचायत को ख़त्म करने का वादा करती हूं."

इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड यानी इफ़को और छत्तीसगढ़ सरकार ने 4 जून, 2005 को 1,320 मेगावॉट का एक पावर प्लांट लगाने की घोषणा की थी.

विशेष रूप से संरक्षित पंडो आदिवासी इलाके प्रेमनगर को पावर प्लांट स्थापित करने के लिए चुना गया. लेकिन गांव के लोग इसके लिए तैयार नहीं हुए. गांव वालों के पास अपने तर्क थे.

इलाके के सामाजिक कार्यकर्ता मेहदीलाल कहते हैं, "इस प्लांट के लिए लाखों पेड़ काटे जाने की बात सुनकर कौन विरोध नहीं करता? आखिर आदिवासियों का जीवन तो जंगल से ही होता है."

वह कहते हैं, "ग्राम सभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि यहां पावर प्लांट नहीं लगाया जाए."

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इफ़को प्रबंधन और ज़िला प्रशासन ने कई बार ग्राम सभा में अपने पक्ष में प्रस्ताव पारित करने की कोशिश की. लेकिन ग्राम सभा ने हर बार प्रस्ताव नकार दिया.

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह कहते हैं, "एक दर्जन बार ग्राम सभा के इनकार के बाद 2009 में नगर पंचायत की तैयारी शुरू हुई."

वो कहते हैं, "उस समय लोगों को पता चला कि सरकार ने अधिसूचना जारी करते हुए प्रेमनगर को ग्राम पंचायत की जगह नगर पंचायत बना दिया है."

इस अधिसूचना का साफ मतलब यह था कि अब इफ़को के पावर प्लांट के लिए ग्राम सभा जैसी कोई रुकावट नहीं थी क्योंकि प्रेमनगर अब ग्राम पंचायत नहीं, नगर पंचायत बन चुका था.

नगर पंचायत पर पेसा क़ानून लागू ही नहीं होता.

हाईकोर्ट अधिवक्ता सुधा भारद्वाज का दावा है कि संविधान के अनुच्छेद 243 जेडसी के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र में नगरीय निकाय तब तक स्थापित नहीं किया जा सकता, जब तक संसद से इसके लिए आदिवासी समुदायों के हितों के संरक्षण की शर्तों को जोड़ते हुए कोई कानून नहीं बनाया जाता.

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Image caption हाई कोर्ट अधिवक्ता सुधा भारद्वाज

वो प्रेमनगर को नगर पंचायत बनाए जाने को पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी मानती हैं.

इधर प्रेमनगर के गांव से नगर में बदलते ही इलाके के लोगों की मुश्किलें शुरू हो गईं.

इलाके में रोज़गार गारंटी योजना के सारे काम बंद कर दिए गए क्योंकि रोज़गार गारंटी योजना केवल गांवों के लिए होती है.

प्रेमनगर में वन अधिकार पत्र पर रोक लगा दी गई. वन अधिकार क़ानून में गांव के लोगों को मिलने वाले सारे व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार रद्द कर दिए गए.

प्रेमनगर के मनोहर पंडो कहते हैं, "नगर पंचायत बने सात साल हो गए, लेकिन आज भी मेरे वॉर्ड में बिजली नहीं है. हम पंडो आदिवासी आज भी नाले का पानी पी रहे हैं."

पंडो ने बताया, "रोज़ी-रोटी, जल-जंगल-ज़मीन सब छिन गया. पंचायत थी तो सुनवाई हो जाती थी. लेकिन अब कोई नहीं सुनता."

प्रेमनगर के लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी लेकिन इस साल मार्च में कोर्ट ने पुराने दस्तावेज़ का हवाला दे कर तकनीकी आधार पर याचिका ख़ारिज कर दी.

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इसके बाद से ही प्रेमनगर को ग्राम पंचायत से नगर पंचायत बनाने के ख़िलाफ़ इलाके के लोग अनिश्चितकालीन धरने पर हैं.

इस धरने में शामिल अशोक कुमार कहते हैं, "प्रेमनगर और उसके अधिकार केवल पेसा कानून में ही सुरक्षित थे. हम सरकार को यह कहने का मौका नहीं देना चाहते कि मामला अदालत में है और हम कुछ नहीं कर सकते."

उन्होंने बताया, "हम पेसा कानून, पंचायती राज और प्रेमनगर की पहचान बनाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं."

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