2016: भारत के सामने मौजूद पांच चुनौतियां

भारतीय किसान इमेज कॉपीरइट AP

इस साल भारत के सामने क्या पांच प्रमुख चुनौतियां हैं, इस पर इंडियास्पेंड ने एक शोध किया है.

इसके मुताबिक़ भारत को खेती की समस्या, जलवायु परिवर्तन, कुपोषण, निरक्षरता और महंगाई से निपटने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे.

1. कृषि

सिर्फ़ 0.2% की वृद्धि दर और 60 करोड़ लोगों की निर्भरता की वजह से खेती एक समस्या बनी हुई है.

साल 2015 बेमौसमी बारिश के साथ शुरू हुआ था. सरकारी अनुमानों के अनुसार इसकी वजह से 1.8 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में खड़ी फ़सल नष्ट हो गई थी, जो रबी की फ़सल का 30% थी.

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में किसानों की आत्महत्याओं की वजह से देश का ध्यान कृषि क्षेत्र की दुर्दशा की ओर गया.

देश के 60 करोड़ खेती पर निर्भर हैं और पिछले वित्तीय वर्ष में इसकी वृद्धि दर मात्र 0.2% थी. पिछले दो दशकों के कऱीब पांच साल तक कृषि क्षेत्र में नकारात्मक वृद्धि देखी गई. इनमें सूखे के तीन साल शामिल हैं.

इमेज कॉपीरइट AP

खाद्य असुरक्षा और कुपोषण से जूझ रहे भारत को कृषि क्षेत्र में बड़े और धमाकेदार सुधारों की आवश्यकता है.

अर्थशास्त्री अजय छिब्बर ने हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस के अपने कॉलम में लिखा, "सरकार को डब्ल्यूटीओ (विश्व व्यापार संगठन) में बाली पैकेज से अपने पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) और घरेलू खाद्य सब्सिडी व्यवस्था को सुधारने का मौका मिला है लेकिन इसने उन योजनाओं को दरकिनार कर दिया और भारतीय खाद्य निगम में सुधार की शांता कुमार समिति की रिपोर्ट को अनदेखा कर दिया. खाद सब्सिडी के गड़बड़ा चुके सिस्टम को सही करने की भी कोशिश नहीं की जा रही है."

2. जलवायु परिवर्तन

देश के 640 में से 302 ज़िलों में सूखे जैसी स्थितियां हैः क्या भारत की जलवायु बदल रही है?

इमेज कॉपीरइट AP

भारत के 29 राज्यों में से नौ - उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल - ने सूखा घोषित कर दिया है और 20,000 करोड़ की केंद्रीय सहायता की मांग की है.

300 से अधिक ज़िलों में सूखे जैसी स्थितियां जलवायु परिवर्तन से गहरे जुड़ी हुई हैं.

मध्य भारत में मॉनसून के चरम पर होने वाली भारी बारिश बढ़ रही है और हल्की बारिश घट रही है.

इंडियास्पेंड के ज़रिये भारतीय और वैश्विक शोधों से पता चलता है कि यह स्थानीय और वैश्विक मौसम में बदलाव की वजह से हैं.

सिर्फ़ 2014-15 में 92,180 पशु मारे गए, 725,390 घर नष्ट हो गए और 27 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में फ़सल प्रभावित हुई.

भारतीय कृषि शोध संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार साल 2020 तक मुख्य फ़सलों, जैसे कि मकई और गेहूं की उपज 18% और 6% तक गिर सकती है.

3. कुपोषण

हालत में सुधार के बावजूद भारत में दुनिया के सबसे अधिक 4 करोड़ अविकसित बच्चे (जिनका कद अपनी उम्र के औसत से कम है) हैं. यह कुल बच्चों का 38.7% है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार सबसे ख़राब और सबसे अच्छी आर्थिक स्थिति वाले राज्यों में पोषण का अंतर साफ़ नज़र आता है. उदाहरण के लिए झारखंड में पांच साल से कम आयु के 47% बच्चे अविकसित हैं जबकि केरल में मात्र 19%.

झारखंड में 42.1% बच्चों का वज़न कम है, जो पूर्वी तिमोर के 45.3% से थोड़ा ही कम है. इसका अर्थ यह हुआ कि झारखंड यमन और नाइजर से भी बदतर स्थिति में है जहां कम वज़न वाले बच्चों की तादाद क्रमशः 35.5% और 37.9% है.

ये आंकड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन के हैं.

सबसे गरीब राज्यों को 'उच्च प्राथमिकता वाले राज्य' की श्रेणी में रखा जाता है और उन्हें कुपोषण से बचने के लिए केंद्र से विशेष राशि मिलती है.

संपन्न राज्यों में से मणिपुर में कम वज़न के बच्चे सबसे कम (14%) हैं जो भूटान (12%) और मॉरीशस (13%) के नज़दीक है.

हालांकि अब पहले के मुक़ाबले ज़्यादा बच्चों का टीकाकरण होता है फिर भी जुलाई में जारी बच्चों के त्वरित सर्वेक्षण में राज्यों में भारी अंतर नज़र आता है.

उदाहरण के गुजरात में इसकी दर 56% है जो न सिर्फ़ राष्ट्रीय औसत (65.3%) से काफ़ी कम है बल्कि आमतौर पर 'पिछड़े' कहे जाने वाले राज्यों बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड से भी बहुत है.

4. निरक्षरता

भारत में निरक्षरों की आबादी इंडोनेशिया की कुल जनसंख्या से ज़्यादा हैं. मुल्क में अनपढ़ों की तादाद 28.20 करोड़ है.

साल 2015-16 के बजट में शिक्षा पर ख़र्च को 16% घटा दिया गया.

साल 2014-15 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के लिए आवंटन बजट कुल सरकारी ख़र्च का 4.6% था जिसे 2015-16 में कम करके 3.9% कर दिया गया.

विकेंद्रीकरण में सुधारों के तहत कर केंद्रीय आय में राज्यों का हिस्सा 32% से बढ़ाकर 42% हो गया.

लेकिन सामाजिक क्षेत्र के लिए जो आवंटन हुआ करता था उसमें कमी कर दी गई.

इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में बताया गया था कि इससे स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र किस तरह प्रभावित हो सकते हैं.

विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 2010 में दुनिया में शिक्षा पर किया जाने वाला ख़र्च जीडीपी का 4.9% था जबकि भारत में यह मात्र 3.3% था.

इमेज कॉपीरइट Getty

स्कूल जाने वाले कुल बच्चों में 18% ऐसे हैं जो माध्यमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते. हालांकि संविधान के तहत यह एक मौलिक अधिकार है.

हालांकि स्कूलों के ख़र्च का 80% शिक्षकों के वेतन पर होता है लेकिन शिक्षक घटिया स्तर के हैं और अक्सर अनुपस्थित रहते हैं. पिछले साल की शुरुआत में महाराष्ट्र में 99% शिक्षक सालाना मूल्यांकन परीक्षा में फ़ेल हो गए.

इंडियास्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार पांच में से एक शिक्षक ही सही तरीके से प्रशिक्षित किए जा सके हैं जबकि पिछले दशक में प्रशिक्षण पर 6.22 अरब रुपये से अधिक ख़र्च किए गए.

5. महंगाई

बुरी ख़बर हैः व्यापार कम हो गया है. अच्छी ख़बर हैः थोक बिक्री की मुद्रास्फ़ीति कम हुई है; लेकिन बुरी बात यह है कि इसका फ़ायदा उपभोक्ताओं तक पहुंच पा रहा है, जिसके मायने हैं महंगाई कम नहीं हुई है.

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

भारत दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है लेकिन इसकी आर्थिक वृद्धि के पूर्वानुमान कम हो गए हैं और बहुत सारे ऐसे कारण हैं जो चिंता का विषय हैं.

मुद्रास्फ़ीति भी चिंता की वजह है, जो मुख्यतः खाने की मुख्य वस्तुओं, दालों के दाम बढ़ने की वजह से बढ़ी है. इंडियास्पेंड के मुताबिक़ यह अभी कायम रहेगी.

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और थोक बिक्री मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) दो सूचियां हैं जिनसे अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फ़ीति की स्थिति का पता चलता है.

पेट्रोलियम, लोहा और स्टील डब्ल्यूपीआई के महत्वपूर्ण तत्व हैं. जनवरी, 2015 में डब्ल्यूपीआई शून्य से भी नीचे चला गया और साल के अंत में भी शून्य से नीचे बना रहा.

इमेज कॉपीरइट Getty

कच्चे माल की गिरती कीमतों और विश्व में वस्तुओं की कमज़ोर कीमत ने डब्ल्यूपीआई को निम्न स्तर पर रखा जिसका अर्थ यह हुआ कि भारत को 2015 के हर महीने विश्व के बाज़ारों से कम दाम पर कच्चा माल मिल रहा था.

राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के अध्यक्ष प्रोनाब सेन ने इंडियन एक्सप्रेस में अपने कॉलम में लिखा कि सीपीआई की उच्च दर का अर्थ यह हुआ गिरती कीमतों (जिसके संकेत डब्ल्यूपीआई से मिलते हैं) का फ़ायदा उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचाया जा रहा.

हालांकि डब्ल्यूपीआई गिरना वैश्विक बाज़ार में प्रतियोगिता के लिहाज से भारतीय उत्पादकों के लिए फ़ायदेमंद रहा है लेकिन भारतीय निर्यात भी अप्रैल-नवंबर 2015 के बीच, पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में, 10% तक गिर गए हैं.

इमेज कॉपीरइट

वैश्विक आर्थिक मंदी के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कमज़ोर मांग की वजह से 2015-16 की दूसरी तिमाही के अंत तक आयात और निर्यात दोनों में 10% की कमी आई है.

(इंडियास्पेंड की रिसर्च पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार