'मुसलमान अखंड भारत में 35 फ़ीसदी हो जाएंगे'

  • 5 जनवरी 2016
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इसमें भाजपा के नेशनल सेक्रेट्री जनरल राम माधव का कोई दोष नहीं. यह सब अल जज़ीरा के लड़कों की शरारत है.

जिन्होंने ऐन मौके पर राम माधव की बातें टेलीकास्ट की जब नरेंद्र मोदी लाहौर से वापसी के बाद पांव भी सीधे ना कर पाए थे.

अखंड भारत वाली बात कोई जनसंघी सत्तर के दशक तक कह देता था तो पाकिस्तान के उर्दू प्रेस में धुंआ जैसे उठने लगता.

पर आज के जमाने में राम माधव के अखंड सपने को लेकर ना पाकिस्तान मीडिया में कोई झक्कड़ चले और ना फॉरेन ऑफिस ने कोई विरोध प्रकट किया.

वैसे भी जहां अल कायदा और दाइश सारे मुसलमान देशों को अखंड ख़िलाफत में बदलने के लिए चारों तरफ फोड़मफारी और मार-काट की चेतावनी दे रहे हो.

वहां राम माधव के शब्दों से बने अखंडी रसगुल्लों को कौन पूछे. मगर मुझ जैसों को तो राम माधव के सपनों से कोई आपत्ति नहीं.

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अब देखिए ना भारत में पहले ही 15 करोड़ मुसलमान है. अगर उन्हें पाकिस्तान के बीस करोड़ और बांग्लादेश के 18 करोड़ मुसलमानों से जोड़ दिया जाए तो कुछ मिलाकर अखंड भारत में 53 करोड़ मुसलमान हो जाएंगे.

यानी इस वक्त के भारत के 16 प्रतिशत मुसलमान अखंड भारत में रातोंरात 35 प्रतिशत हो जाएंगे.

और फिर नरेंद्र मोदी का यह ऐतिहासिक जुमला भी ध्यान में रहे कि हम पांच और हमारे पच्चीस.

और सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि अखंड भारत में यह भी नहीं सुनना पड़ेगा कि जिसे तकलीफ है वो पाकिस्तान चला जाए.

घर वापसी का मतलब भी बदल जाएगा. यूं एक शुद्ध हिंदू राष्ट्र का किस्सा आप ही आप ठिकाने लग जाएगा.

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लोगबाग ख्वामखाह ही राम माधव के पीछे लठ लेकर पड़ गए हैं. हमें तो उनका स्पष्टीकरण ज़्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देता है कि ये अखंडता ताकत से नहीं प्यार-मोहब्बत और एक जैसी सांस्कृतिक आधार पर ही आएगी.

ये भी हो सकता है कि अल जज़ीरा के मंडप पर राम माधव शायद यूरोपीय यूनियन और आसियान का उदाहरण देना चाह रहे हो मगर उनके मुंह से अखंड भारत निकल गया हो.

अगर हम ठीक समझे तो फिर तो बड़ा भईया होने के नाते भारत को ही पहल करनी होगी.

अखंडता के पहले कदम के तौर राम माधव अपने सरकार से यह तो मनवा ही सकते हैं कि घर वापसी में आसानी के लिए बांग्लादेशियों और पाकिस्तानियों को वीजा फ्री एंट्री, कारोबार और प्रॉपर्टी रखने की इजाज़त हो ताकि वो खुद को अपने घर में ही महसूस कर सके.

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जब ये होगा तो बांग्लादेश और पाकिस्तान की सरकारें भी दबाव में आ जाएंगी और उन्हें भी भारत वासियों के लिए कुछ ना कुछ करना होगा.

तब कुछ आहिस्ते-आहिस्ते यूरोपीय यूनियन की तरह कुशल मंगल होता चला जाएगा.

और जब तक यह नहीं होता तब तक नागपुर के आरएसएस के हेडक्वार्टर में लगे उपमहाद्वीप के नक्शे पर अखंड भारत की जगह अखंड सार्क तो लिखवाया ही जा सकता है.

ताकि ऐसी शब्दावली से सीमापार के पिछड़े भाइयों में बेचैनी ना फैले. हमें अच्छे से मालूम है कि आरएसएस से भाजपा को उधारी में मिलने वाले कर्मचारी बोलने से पहले मोदी की कितनी सुनते हैं.

चुनांचे नरेंद्र मोदी भी मन ही मन में इसके सिवा क्या सोचते होंगे कि कौन इस घर की देखभाल करे. रोज एक चीज़ टूट जाती है.

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