सूफ़ी संगीत का है रूहानी रिश्ता

  • 5 जनवरी 2016
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'मैं सूफ़ी हूँ सरबस्ता, मेरा कौन पिछाड़े रस्ता'.

सूफ़ी संगीत से हम सब किसी न किसी रूप में वाबस्ता हैं, कुछ बॉलीवुड की वजह से तो ज़्यादातर नुसरत फ़तेह अली खां साहब की कव्वालियों और आबीदा परवीन की आवाज़ के ज़रिए. यक़ीनन सूफ़ी संगीत रूहानी है.

हिंदुस्तान के एक उभरते हुए सूफ़ी गायक हैं ध्रुव सांगरी जो बिलाल चिश्ती के नाम से भी जाने जाते हैं.

ध्रुव ने सात साल की उम्र से ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत व तबले की तालीम लेनी शुरू कर दी थी. आगे चलकर ध्रुव का रुझान सूफ़ी संगीत की तरफ हो गया.

उन्होंने दिल्ली क़व्वाल बच्चे घराने के उस्ताद मिराज अहमद निज़ामी साहब से क़व्वाली सीखना शुरू किया. क़व्वाली सरताज उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खां साहब की सोहबत ने ध्रुव की गायकी को चार चाँद लगा दिए.

ध्रुव ने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्नातक किया. 2001 में उन्होंने अपने सूफ़ी ग्रुप के साथ 'रूह' नाम से सूफ़ी बैंड बनाया.

उन्होंने पारसी-अरबी कविताओं, हज़रत अमीर ख़ुसरो, संत कबीर, बाबा फ़रीद, बुल्ले शाह, मीरा बाई आदि प्रसिद्ध कवियों की रचनाओं को अपनी सुरीली आवाज़ में पेश किया है.

ध्रुव कई राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सूफ़ी गायकी से दर्शकों का मन मोह चुके हैं. उन्होंने सिर्फ़ सूफ़ी गाने ही नहीं गाए बल्कि कई बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए गीत भी लिख चुके हैं.

उन्होंने 'कोक स्टूडियो' के लिए भी गाया है. ध्रुव दिल्ली में रहते हैं और सूफ़ी संगीत की रूहानियत को कायम रखने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं.

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Image caption सूफ़ी संगीत अपनी मस्तमौला अदा और मलंग अंदाज़ के लिए जाना जाता है. इस संगीत को ख़ुदा से मिलने का ज़रिया माना जाता है.
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Image caption 'छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना लगाई के ' अमीर ख़ुसरो का लिखा यह गीत जितनी बार भी सुना जाए दिल को छूता है.
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Image caption सूफ़ी अरबी लफ्ज़ है जो मूल रूप से 'सफ़ा' से बना है. सफ़ा माने पाकीज़गी. माना जाता है ऊपरवाले से मिलने लिए रूह और दिल पूरी तरह पाक़-साफ़ होना चाहिए.
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Image caption ' मन कुंतो मौला ' इस क़व्वाली को हम न जाने कितनी आवाज़ों में सुन चुके हैं, आज भी यह क़व्वाली दिल ही नहीं रूह को भी छूती है. क़व्वाल का अर्थ होता है जो बाकौल हो, याने अपनी दुआ को अपने संगीत के जरिए ख़ुदा तक पहुंचाए.
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Image caption हिंदुस्तान में सूफ़ी संप्रदाय की शुरुआत बारहवीं शताब्दी से मानी जाती है.जब अज़मेर के आस - पास चिश्ती सिलसिले की आहट हुई.
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Image caption सूफ़ी मानते हैं क़व्वाली ख़ुदा के नज़दीक होने का रास्ता है,जिसमें आप सारी दुनिया भूल कर हर शह में बस ख़ुदा को ही पाते हैं.
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Image caption सूफ़ी संगीत दरवेशों का संगीत है. यह वो रूहानियत है जो इंसान को ख़ुद से जुदा कर ख़ुदा से मिला देती है.
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Image caption ध्रुव कहते हैं पीर निज़ामुद्दीन औलिया और हज़रत अमीर खुसरो के साए में क़व्वाली ने अपने उरूज़ को पाया.
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Image caption ख़्वाजा अमीर ख़ुसरो का एक दोहा है "खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय,वेद, क़ुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय ". भारतीय गायन में क़व्वाली और सितार को अमीर ख़ुसरो ही देन माना जाता है.
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Image caption ध्रुव मानते हैं वक़्त के साथ सूफ़ी संगीत में बदलाव आया है पर ज़ुबान और तहज़ीब आज भी इस संगीत को ज़िंदा रखे हुए है.

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