'राजनीतिकरण से पुलिस फ़ोर्स का स्तर गिरा'

  • 6 जनवरी 2016
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पठानकोट एयरबेस पर चरमपंथी हमले के लिए पंजाब पुलिस की भूमिका की खासी आलोचना हो रही है.

भारत में पुलिस के राजनीतिकरण, पुलिस सुधार जैसे मुद्दों पर सालों से बात होती रही है, पर कोई क़दम नहीं उठाया गया है.

कुछ साल से पंजाब में ड्रग्स की मौजूदगी को लेकर भी प्रशासन पर उंगलियां उठती रही हैं.

बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने पंजाब के पूर्व डीजीपी केएस ढिल्लों से बात की और पूछा कि पठानकोट हमले पर कार्रवाई को वह किस तरह देखते हैं. वह कहते हैं -

बहुत सी संस्थाएं बन गई हैं और वो सभी एक ही जगह को देखती हैं. इस मामले में सेना, गुप्तचर विभाग (आईबी), रिसर्च एंड एनेलिसिस विंग (रॉ) सभी शामिल हैं. मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) तो है ही.

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ऐसे में पंजाब या किसी भी राज्य की पुलिस दूसरे दर्जे पर रहती है, लेकिन पंजाब में चरमपंथ का इतिहास देखते हुए पुलिस को लगता है कि वह ऐसे मामलों से निपटने की विशेषज्ञ है. इसलिए इनका आपस में मतभेद हो जाता है.

यह सही है कि पंजाब पुलिस के पास तजुर्बा है, लेकिन वह अलग किस्म का, अलग वक़्त का रहा है. जो समर्पण ये पाकिस्तानी चरमपंथी दिखाते हैं, वह सिख चरमपंथ में नहीं था. ये लोग नए हैं, इनके हथियार आधुनिक हैं, इनके पास समर्थन भी है.

एसपी सलविंदर सिंह का कहना है कि उनकी एसयूवी पर चरमपंथियों ने क़ब्ज़ा कर लिया, यह संभव नहीं है. वह विरोध कर सकते थे, ऐसे ही थोड़े दरवाज़ा खोल देते हैं किसी के लिए.

जब पुलिस अधिकारी ऐसे इलाक़ों में यात्रा करते हैं, तो उन्हें सावधान रहना चाहिए.

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वो कैसे पकड़े गए, कैसे उन्हें गाड़ी से फेंक दिया गया.. हुआ क्या है, यह अभी साफ़ नहीं है.

हमारे देश में पिछले कुछ सालों से संस्थानों के स्तर में गिरावट आ रही है. इतने सारे वरिष्ठ पद बन गए हैं कि इनकी गुणवत्ता भी गिर गई है. इसी वजह से ये बातें होती हैं.

पिछले कुछ साल में ड्रग्स की तस्करी बढ़ी है और यह सही बात है कि राजनीतिक समर्थन के बिना यह संभव नहीं होता.

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फिर पंजाब की पुलिस का बहुत ज़्यादा राजनीतिकरण हो चुका है, जो हमेशा से रहा है. जैल सिंह, तलवाड़ा सिंह के ज़माने में भी इसमें अलग-अलग धड़े थे.

पुलिस का राजनीतिकरण हो जाता है, तो उनका ध्यान भी इसी में लग जाता है. पंजाब में कितने सारे अधिकारी हैं, जो तस्करी करते हैं लेकिन उन्हें राजनीतिक सरंक्षण प्राप्त है.

पुलिस बल बहुत ज़्यादा बढ़ गया है. 1984 में पुलिसकर्मियों की संख्या 31,000 थी, जो अब 80,000 हो गई है. ऐसे में उनका सही ढंग से प्रशिक्षण नहीं हो सकता, उनकी निगरानी नहीं हो सकती.

पठानकोट जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए पंजाब जैसे सीमांत राज्यों को काफ़ी आधुनिक हथियार भी दिए गए हैं, लेकिन इच्छाशक्ति की कमी है. दरअसल नेतृत्व करने वाले राजनेताओं के हित कुछ और होते हैं.

राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने पुलिस सुधार के लिए 30 साल पहले रिपोर्ट दी थी, जिसे अब तक लागू नहीं किया गया. अगर इसे उसी समय लागू कर दिया जाता, तो ऐसी घटनाएं नहीं हो पातीं.

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और ऐसा नहीं कि सब जगह पुलिस अच्छी थी. कई जगह हमारी जैसी ही थी, लेकिन कई देशों ने कोशिश की और बदल ली अपनी पुलिस.

इसका सबसे ताज़ा उदाहरण दक्षिण अफ़्रीका है. इंग्लिश पुलिस भी इसी तरह की थी. उन्होंने 1829 में इसे बदल दिया.

लेकिन हम नहीं बदल रहे हैं इसको और अगर नहीं बदलेंगे तो ऐसा ही होता रहेगा हमेशा.

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