सरकार चाहती है पिछले दरवाज़े से बिके शराब?

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अगले दस सालों में केरल को 'शराबमुक्त’ प्रदेश बनाने के राज्य सरकार के फ़ैसले को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

बहस इसलिए भी गर्म है क्योंकि पर्यटन और शराब सेवन के लिहाज़ से केरल भारत के अग्रणी राज्यों में है. देश की महज़ तीन प्रतिशत आबादी वाले प्रदेश में देश में पी जानी वाली कुल शराब का 14 प्रतिशत खप जाता है.

राज्य सरकार ने जब 700 शराबखाने बंद करने का निर्देश दिया तो मामला सुप्रीम कोर्ट में गया. सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि अब विदेशी शराब केवल पांच सितारा होटलों में ही पी जा सकेगी. इसके बाद बहस का गरमा जाना स्वाभाविक था.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से सरकार भले खुश हो, पर उस पर अमल आसान नहीं होगा. प्रदेश में 30 से भी कम पांच सितारा होटल हैं. अब विदेशी शराब मध्यम और निचले तबके की पहुँच से बाहर हो जाएगी.

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इससे होगा यह कि लोग या तो क़ानून तोड़ेंगे या देसी ताड़ी, जिसके सेवन पर फ़िलहाल पाबंदी नहीं है, अधिक मात्रा में पिएंगे.

कोर्ट के आदेश पर बहस इसलिए भी हो रही है क्योंकि यह संपन्न लोगों के पक्ष में चला गया है. यदि सस्ती शराब सामान्य वर्ग की पहुँच से बाहर करना होता तो केवल दाम बढ़ाकर ऐसा किया जा सकता था.

दूसरी ओर ग़रीब तबके के लोगों को कम दाम पर ताड़ी तो मिलती रहेगी और उसका सेवन भी बढ़ेगा. वैसे वो लोग ज़रूर प्रभावित होंगे जो सीमित मात्रा में शराब लेते हैं.

सरकार यदि केरल को गुजरात बनाना चाहती है तो उसे इस बारे में दोबारा सोचना चाहिए. गुजरात अकेला ऐसा राज्य है जहां 1958 से लागू शराबबंदी अब तक बरक़रार है.

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अन्य राज्य या तो शराबबंदी लागू करने से बचते रहे हैं या बंदी के फ़ैसले से पीछे हटने को मजबूर हुए हैं.

गुजरात की शराबबंदी की हक़ीकत सब जानते हैं. राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और दमन-दीव जो गुजरात से लगे हैं, इस राज्य की शराब की प्यास बुझाते रहे हैं.

अधिक दाम देकर शौकीन हर तरह की शराब आसानी से पा सकते हैं. ये शराबबंदी एक ढकोसला है.

यह ढकोसला तो शायद महात्मा गांधी को भी न भाता. नीति के तौर पर शराबबंदी लगभग सभी राज्यों में विफल रही है.

हरियाणा और आंधप्रदेश में जब शराबबंदी लागू हुई तो वहां शराब का सेवन बढ़ गया और ग़ैरक़ानूनी तौर पर बेचने वालों की चांदी हो गई.

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हुसैन ज़ैदी ने अपनी किताब 'डोंगरी टू दुबई' में बताया है, गुनाहों की दुनिया के कई बड़े नाम शराबबंदी की ही देन थे.

जो लोग महात्मा गांधी को शराब निषेध के दुष्परिणामों के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं, वे उनकी व्यावहारिकता से अनजान हैं.

एक बार मौलाना आज़ाद अपनी पत्नी के साथ गांधी जी से मिलने सेवाग्राम पहुंचे. आश्रम में रहने वाले पसोपेश में थे कि आश्रम के नियमों में बंधे रहकर अतिथियों का स्वागत कैसे करें.

मौलाना को शराब और धूम्रपान प्रिय था तथा उनकी बेगम मांसाहारी भोजन की आदी थीं. बापू के कहने पर नियमों में ढील देकर मामला हल हुआ.

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यह सही है कि जिस तरह शराबबंदी का विरोध करने वाले पीने वालों की निजी आज़ादी की बात करते हैं उसी तरह यह मुद्दा महिलाओं और बच्चों के अधिकारों से भी जुड़ा है.

बच्चों और महिलाओं की देखरेख पर ख़र्च होने वाला पैसा अक्सर शराब पर ख़र्च हो जाता है. शराबबंदी मात्र नैतिकता का मुद्दा नहीं, यह कल्याण से जुड़ा विषय भी है.

केरल सरकार ने यह साफ़ नहीं किया है कि 700 शराबखानों के बंद होने से सैकड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी का क्या होगा. शराब की बिक्री से मिलने वाले 8,000 करोड़ रुपए की कर आय का विकल्प भी अभी नहीं मिला है.

ऐसे में सरकार क्या करे. नियमों के तहत सीमित मात्रा में शराब उपलब्ध कराकर वह बेहतर ढंग से निपट सकती है, बजाय इसके कि सारे शराबखाने अगला दरवाज़ा बंदकर पिछले दरवाज़े से बिक्री जारी रखें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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