पठानकोट से सामने आई भारत की कमज़ोरी

  • 9 जनवरी 2016
भारतीय सैनिक, ताबूत में इमेज कॉपीरइट AFP

भारत ही नहीं दुनिया भर में किसी ख़ास मामले में चरमपंथ के ख़िलाफ़ अभियान (काउंटर टेररिज़्म- सीटी) की आलोचना करना काफ़ी आसान है.

पठानकोट हमले के मामले में ऐसा ही हुआ जहां सटीक और विस्तृत गुप्तचर सूचना पहले ही उपलब्ध थी.

इसमें लक्ष्य की पुख़्ता पहचान भी शामिल थी जो हमला शुरू होने से 14 घंटे से भी पहले पता चल चुकी थी और इससे भी पहले गुप्तचर सेवा के शुरुआती टुकड़े जुड़ते ही ज़मीनी प्रतिक्रिया भी बहुत जल्द ही शुरू हो गई थी.

पठानकोट में एयरफ़ोर्स बेस के रणनीतिक महत्व को देखते हुए, पूर्व सूचना के बिना भी घुसपैठ होती तो उसे हार ही माना जाता. छह चरमपंथियों का समूह बेस में काफ़ी अंदर तक घुस गया था और उनसे निपटने में सात सुरक्षाकर्मी मारे गए जबकि 20 अन्य घायल हो गये.

इस तथ्य ने भारत की व्यापक और अपरिहार्य कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है.

इमेज कॉपीरइट AFP

हालांकि पठानकोट में बचाव अभियान की विशिष्ट कमियां और नाकामियां सिर्फ़ तात्कालिक चिंता की बात नहीं है, ये बड़ी और ढकी हुई रणनीतिक कमियों और कमज़ोरियों की ओर इशारा करती हैं.

तीन दशक से ज़्यादा समय से भारतीय धरती पर पाकिस्तान प्रायोजित चरमपंथ (जो 1984 में ख़ालिस्तानी चरमपंथ को समर्थन के साथ शुरू हुआ था) जारी है और ख़ौफ़नाक चरमपंथी हमलों के रूप में असंख्य 'चेतावनियां'- जिनमें 1993 के मुंबई हमले (जिनमें 257 लोग मारे गए थे), 26/11 (2008 में हुए हमले में 164 लोग मारे गए थे) शामिल हैं- मिल चुकी हैं.

इसके बाद भी राष्ट्रीय स्तर पर चरमपंथ से मुकाबले की योग्यता और क्षमता बहुत ही ख़राब हालत में हैं.

इमेज कॉपीरइट Reuters

हर बड़े हमले के बाद नेता बड़ी-बड़ी बातें करने लगते हैं, पुराने नारे दोहराते हैं, गुस्से का इज़हार करते हैं और देश को वायदा करते हैं कि ऐसी ज़्यादती 'फिर कभी नहीं' होगी.

कुछ दिन बाद तुलनात्मक रूप से हल्के और कुछ महीने बाद सबसे बुरे हमले के बाद.... सब कुछ भुला दिया जाता है और फिर सब वैसे ही चलने लगता है.

यकीनन इस व्यवस्था को बदलने के लिए बहुत थोड़े और अनियमित प्रयास हुए हैं लेकिन मुख्यतः वे विचार के स्तर पर ही नाकाम हो गए हैं. योजनाकारों की कल्पना बेहद सीमित ढंग से पिछले बड़े हमले से बचने की ख़ास ज़रूरतों से आगे जा ही नहीं पातीं.

मुंबई के 26/11 हमलों के बाद इसका ज़ोर समुद्र से आने वाले ख़तरों से निपटने पर था तो अब पठानकोट हमले के बाद अपनी रणनीतिक परिसंपत्तियों और प्रतिष्ठानों को सुरक्षित करने की बात कही जा रही है.

इमेज कॉपीरइट
Image caption (फ़ाइल फ़ोटो)

स्थानीय स्तर पर थोड़े बहुत अटपटे सुधार होते हैं लेकिन पूरे सिस्टम की कमज़ोरियां बनी रहती हैं.

दूसरी नाकामी रैंबो मॉडल पर अत्यधिक निर्भरता है. यह विचार है कि असाधारण रूप से प्रशिक्षित और सुसज्जित कुछ लोग हर तरह की स्थिति में संभावित चरमपंथी संकट से निपट सकते हैं.

पठानकोट में यह 'स्पेशल फ़ोर्स मानसिकता' ही नाकामी की वजह बनी. वहां ग़लती यह हुई कि बचाव अभियान को एक छोटे समूह के सुनियोजित हमले के रूप में देखा गया जबकि यह विस्तृत जगह- हालांकि वह पूरी और अच्छी तरह घिरी हुई थी- को सुरक्षित करना होना था.

इमेज कॉपीरइट epa

इसका परिणाम यह हुआ कि प्रतिक्रिया तभी की गई जब चरमपंथी एयरफ़ोर्स बेस में घुस गए. फिर स्पेशल फ़ोर्स यूनिट ने चरमपंथियों का अच्छे-ख़ासे लंबे चौड़े इलाक़े में पीछा कर उनसे मुठभेड़ की और अंततः लंबे गतिरोध के बाद उन्हें ढेर कर दिया.

यह परिणाम दिल्ली में बैठकर फ़ैसला करने वालों की नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) को प्राथमिकता देने की इच्छा की वजह से आया.

पठानकोट में मौजूद भारी संख्या में सैन्य बल पर ध्यान नहीं दिया गया जिसमें कमांडो और स्पेशल फ़ोर्स यूनिट भी थीं, जिनका नियंत्रण स्थानीय अधिकारियों के पास था जो संभवतः एयरफ़ोर्स बेस की सुरक्षा करने की ज़रूरतों और चुनौतियों से बेहतर ढंग से वाकिफ़ होते.

इस 'स्पेशल फ़ोर्स मानसिकता' और आम पुलिस, गुप्तचरी और जवाब देने की क्षमताओं की उपेक्षा और उनकी जगह उच्च विशेषज्ञता वाली चरमपंथ विरोधी यूनिट तैयार करने की प्रवृत्ति ने ज़्यादातर भारतीय क्षेत्र और आबादी को चरमपंथी हमलों के लिए आसान शिकार बना दिया है.

इमेज कॉपीरइट AP

26/11 के बाद आई सरकारों ने अपनी बहुत से चरमपंथ विरोधी योजनाओं को लागू करने की कोशिश की लेकिन हकीकत यह है कि ज़्यादातर शोशेबाज़ी रहीं, मुख्यतः प्रतीकात्मक और वास्तव में कारगर होने के बजाय सुरक्षा का भ्रम पैदा करने वाली रहीं.

बुनियादी स्तर पर, जैसे कि पुलिस और गुप्तचर सेवाओं की योग्यताओं और क्षमताओं को लेकर व्यवस्था में संसाधनों की भयंकर कमी रही.

अपराधियों की निगरानी की आधारभूत व्यवस्था क्राइम और क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम्स जैसी प्रणाली जिसके तहत सभी पुलिस स्टेशनों को एक नेटवर्क के तहत जोड़ा जाना है और राष्ट्रीय स्तर पर एक केंद्रीय डाटाबेस बनाया जाना है- जैसी योजनाएं भी इन्हें लागू करने में असंबद्धता और प्राथमिकता में न होने की वजह से लटक गई हैं.

हालांकि राज्य और केंद्र दोनों स्तर पर गुप्तचर क्षमताएं कुछ बढ़ी हैं और तकनीकी गुप्तचरी की क्षमताओं ने कुछ सफ़लताएं दर्ज की हैं लेकिन दरअसल जो आवश्यताएं हैं उनके अनुपात में यह बहुत मामूली हैं.

इमेज कॉपीरइट Reuters

महत्वपूर्ण यह है कि नीति निर्माता सुरक्षा की अभाज्यता को पहचानने में नाकाम रहे हैं. इस तथ्य को कि आम पुलिस और गुप्तचर सेवाओं की कमज़ोरियां ख़ुद-ब-ख़ुद सभी क्षेत्रों की कमज़ोरियों में तब्दील हो जाती हैं- चरमपंथ विरोधी अभियानों समेत.

जब तक हम स्पेशल फ़ोर्सेस की क्षमताओं पर निर्भर रहेंगे और आधुनिक और प्रभावी कानून-व्यवस्था और सुरक्षा प्रबंधन का एक सबको ढकने वाला ढांचा तैयार नहीं करेंगे तब तक हम चरमपंथ के शेर की पूंछ का पीछा करने के बेकार काम में उलझे ही रहेंगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार