ये भारत-पाकिस्तान के बदलते रिश्ते

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पठानकोट हमले का सुराग़ ढूंढने की कोशिशों के सिलसिले में पाकिस्तान में छापों, गिरफ़्तारियों और संयुक्त जांच दल के गठन की ख़बरें आ रही हैं.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने पिछले हफ़्ते कहा था कि पाकिस्तान को हमले के सुबूत दिए गए हैं और अब पाकिस्तान पर ये निर्भर है कि वो इसकी जांच के लिए क्या क़दम उठाता है.

लेकिन इन गतिविधियों के बावजूद इस बात की पुष्टि पूरी तरह से नहीं हो सकी है कि शुकरवार को दोनों देशों के विदेश सचिव के बीच तय बैठक होगी या नहीं.

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दोनों देश इस बारे में अब तक ख़ामोश हैं जिससे दोनों पड़ोसियों के बीच रिश्ते में एक बार फिर से अनिश्चितता पैदा हो गई है.

कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इसका कारण है पाकिस्तान के लिए मोदी सरकार की विदेश नीति में फोकस की कमी.

विशेषज्ञ सतीश मिश्रा कहते हैं, "फोकस नहीं है, और अच्छी तरह से सोची कार्य योजना नहीं है. पिछले 20 महीनों में (जब से नरेंद्र मोदी सत्ता में आए हैं) बात चीत शुरू करने पर सहमति होती है, फिर कुछ हो जाता है और बात चीत का प्रयास ख़त्म हो जाता है. जो स्पष्ट सोच है वो नज़र नहीं आती"

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भारत के पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा इसकी पुष्टि करते हुए कहते हैं, "लग ऐसा ही रहा है कि कुछ महीनों से विदेश नीति एक चरम से दूसरे चरम पर जा रही है".

लेकिन क्या मोदी सरकार के दौर में ही भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है? इस बात पर सभी सहमत हैं कि उतार-चढ़ाव का ये सिलसिला सालों पुराना है.

मसूद ख़ान पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक हैं.

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वो कहते हैं कि ऐसा काफ़ी अरसे से देखने को मिल रहा है.

मसूद ख़ान कहते है, "भारत-पाकिस्तान के रिश्ते उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं. बात चीत का सिलसिला शुरू होता है. फिर कोई घटना हो जाती है या कोई ग़लत फ़हमी हो जाती है, फिर वार्ता टूट जाती है. इसके बाद एक बार फिर से ये सिलसिला शुरू होता है. और एक बार फिर से कोई क़िस्सा हो जाता है और कोशिशें स्थगित करनी पड़ती हैं".

1980 के दशक में दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार के आसार नज़र आए थे लेकिन 1989 में कश्मीर में सशस्त्र उग्रवाद के शुरू होने से शान्ति भंग हुई और कई सालों तक रिश्तों में सुधार न हो सका.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शान्ति का हाथ बढ़ाया, लाहौर और अमृतसर के बीच बसें भी चलने लगीं, लेकिन फिर करगिल हो गया.

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राजीव डोगरा कहते हैं कि शान्ति जब भी बनने की उम्मीद बनती है भारत में हमले होने लगते हैं.

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डोगरा कहते हैं, "(जनरल) मुशर्रफ़ साहेब ने 2003 में कहा था कि भारत में आतंकवाद हमलों के लिए पाकिस्तान की धरती का इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा लेकिन 2004 से 2008 तक भारत में 23 आतंकी हमले हुए जिन में 2006 और 2008 में मुंबई में दो बड़े हमले हुए. तो भारत में पाकिस्तान पर पूरी तरह से भरोसा करने से परहेज़ किया जाता है"

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भारत में आम धारणा ये है कि शान्ति भंग करने वाले तत्व पाकिस्तान में हैं. लेकिन पाकिस्तानी विशेषज्ञ मसूद ख़ान के अनुसार ऐसे तत्व दोनों देशों में हैं.

मसूद ख़ान कहते हैं, "मेरे विचार में ऐसे तत्व पाकिस्तान में भी हैं और भारत में भी मौजूद हैं जो नहीं चाहते कि दोनों देशों के बीच शान्ति पनप जाए".

मसूद ख़ान ने इस बात को सराहा है कि पठानकोट के बाद दोनों देशों के नेता उलटे सीधे बयान नहीं दे रहे हैं.

भारत के पूर्व राजनयिक नटवर सिंह भी इस बात से संतुष्ट थे कि पठानकोट हमले के बाद दोनों तरफ़ के नेताओं ने संयम से काम लिया है जो उनके विचार में इस बात की अलामत है कि नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान नीति सही डगर पर है.

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विशेषज्ञ सतीश मिश्रा के अनुसार बयान बाज़ी न करने के पीछे कोई बात ज़रूर है. हो सकता है कि ये प्रधानमंत्री की पाकिस्तानी के लिए नीतियों में ठहराव के संकेत हों.

सतीश मिश्रा कहते है, "अब मुझे लगता है कि मोदी सरकार की जो पाकिस्तान नीति है उसमें एक लाइन सीधी और स्पस्ट दिखाई देती है. पठानकोट में हमला हुआ था उसको वार्ता से नहीं जोड़ा जा रहा है".

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दोनों देशों के विशेषज्ञ एक बात से सहमत ज़रूर हैं और वो ये है कि हमलों और बाधाओं के बावजूद बात-चीत जारी रखनी चाहिए ताकि रिश्तों में सालों के उतार-चढ़ाव को स्थिर करके दक्षिण एशिया में शान्ति का एक ठोस माहौल बनाया जाए.

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