60 साल से खिंची हैं अमरीका-ईरान में तलवारें

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ईरान अपने अधिकार वाले जल क्षेत्र में गश्त लगाने वाली दो नावों के डूबने के बाद 10 अमरीकी नाविकों को हिरासत में ले चुका है. हालांकि बाद में ईरान ने उन्हें रिहा कर दिया.

पिछले साल परमाणु समझौते में मिली सफलता के बावजूद ईरान और अमरीका के बीच तनाव बना हुआ है.

इन दोनों देशों के बीच 60 सालों से भी ज़्यादा वक़्त से एक पेचीदा संबंध क़ायम है. यहां पेश हैं दोनों देशों से जुड़ी सात अहम घटनाओं पर एक नज़र.

1953 में मोहम्मद मुसद्दिक़ का तख़्तापलट

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ईरान और अमरीका के बीच तल्ख़ रिश्तों की शुरुआत उस वक़्त हुई जब 1953 में ईरान के लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मुसद्दिक़ का अमरीका और ब्रिटेन की ख़ुफ़िया एजेंसियों की बनाई योजना के तहत तख़्तापलट कर दिया गया.

धर्मनिरपेक्ष नेता मोहम्मद मुसद्दिक़ तेल कंपनियों के राष्ट्रीयकरण की योजना बना रहे थे.

1979 में ईरानी क्रांति

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अमरीका समर्थित ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को 16 जनवरी, 1979 को धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक विपक्ष के महीनों तक विरोध करने के बाद देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था.

इस्लामी नेता अयातुल्लाह ख़ौमेनी निर्वासन से वापस लौट आए और जनमत संग्रह में उन्हें बड़ी जीत मिली. इसी साल ईरान एक अप्रैल को एक इस्लामी गणराज्य घोषित हुआ.

1979 में अमरीकी दूतावास का बंधक संकट

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1979 के नवंबर में दोनों देशों के बीच रिश्ते उस वक़्त बदतर हो गए जब चरमपंथी ईरानी छात्रों ने तेहरान में मौजूद अमरीकी दूतावास पर हमला बोल दिया और दूतावास के दर्जनों कर्मचारियों को बंधक बना लिया.

ये छात्र अमरीका से ईरान के शाह को निकाले जाने की मांग कर रहे थे. देश से निकाले जाने के बाद शाह अमरीका में कैंसर का इलाज करवा रहे थे.

1981 में 444 दिनों की क़ैद के बाद 52 बंधंकों को आख़िरकार रिहा करना पड़ा.

1988 में यात्री विमान को मार गिराया

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तीन जुलाई, 1988 को अमरीकी युद्धपोत यूएसएस विंसेनेस ने एक ईरानी यात्री जेट विमान को मार गिराया.

अमरीका ने ज़ोर देकर कहा कि यह ग़लतफ़हमी की वजह से हुआ क्योंकि ग़लती से यात्री विमान को लड़ाकू जेट समझ लिया गया.

इस विमान पर सवार सभी 290 लोग मारे गए. मारे गए यात्रियों में ज़्यादातर ईरानी नागरिक थे जो मक्का की यात्रा पर जा रहे थे.

ईरान ने अमरीका पर 'बर्बर नरसंहार' करने का आरोप लगाया.

2002- 'बुराई की धुरी' और परमाणु हथियारों का डर

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साल 2002 में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने इराक़ और उत्तर कोरिया के साथ ईरान को भी 'बुराई की धुरी' कहकर उसकी निंदा की.

उनके इस भाषण ने ईरान में ग़ुस्से की लहर पैदा कर दी थी. अमरीका ने ईरान पर गुपचुप तरीक़े से परमाणु हथियार बनाने का इल्ज़ाम भी लगाया जिसे मानने से ईरान ने इनकार कर दिया.

हालांकि एक ईरानी विपक्षी गुट ने यह ख़ुलासा किया कि ईरान परमाणु कार्यक्रमों का विकास कर रहा था जिसमें नातांज़ का यूरेनियम संवर्द्धन संयंत्र भी शामिल था.

संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निगरानी दल के साथ एक दशक तक ईरान की चर्चा और उसके बाद कूटनीतिक गतिविधियों के बाद संयुक्त राष्ट्र ने ईरान पर 2006 से लेकर 2010 तक परमाणु मुद्दे को लेकर चार दौर के प्रतिबंधों की पु्ष्टि की.

2010 में अहमदीनेजाद का संयुक्त राष्ट्र में भाषण

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न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में अपने भाषण के दौरान ईरानी राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने दावा किया कि ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि 9/11 के हमले के पीछे अमरीकी सरकार का हाथ था.

अमरीका, यूरोपीय यूनियन के देश, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और कोस्टा रिका महमूद अहमदीनेजाद के इस भाषण का विरोध करते हुए सभा से बाहर चले गए थे.

अमरीका ने उनकी टिप्पणी को 'घिनौना और भटकाने वाला' बताया था.

2013 – ओबामा-रुहानी फ़ोन कॉल

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2013 में ईरान के राष्ट्रपति का चुनाव जीतने के कुछ ही हफ़्तों के बाद हसन रुहानी ने अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से फ़ोन पर बात की.

यह तीस सालों में अमरीका और ईरान के शीर्ष नेताओं के बीच पहली सीधी बातचीत थी.

अमरीकी राष्ट्रपति ने इस संबंध में कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए दो लोगों ने अपनी दृढ़ता जताई है.

2015– ईरान परमाणु समझौता

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कई सालों तक चली बातचीत के बाद ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों को सीमित करने को लेकर दुनिया के ताक़तवर देशों के साथ एक समझौते पर पहुंचा.

इसके बदले में ईरान को मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मदद को बढ़ाने पर सहमति बनी.

अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस और जर्मनी चाहते थे कि ईरान अपनी संवेदनशील परमाणु गतिविधियों को सीमित करें ताकि यह सुनिश्चित हो पाए कि वह परमाणु हथियार नहीं बना सकता.

ईरान का कहना था कि परमाणु ऊर्जा रखना उसका हक़ था और इस पर ज़ोर दिया कि उसके परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही था.

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