माघ बिहू पर इस बार नहीं लड़ेंगी बुलबुलें

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असम में क़रीब 400 साल पुरानी पारंपरिक बुलबुल की लड़ाई इस साल नहीं होगी. माघ महीने की एक तारीख़ यानि कि 15 जनवरी को होने वाले आयोजन पर मंगलवार को गुवाहाटी हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच की न्यायाधीश रूमी कुमारी फूकन की अदालत ने प्रतिबंध लगा दिया था.

इस मौक़े पर होने वाले उत्सव की आयोजन समिति ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिका भी दायर की है लेकिन गुरुवार शाम तक उस पर सुनवाई नहीं हुई थी.

कोर्ट के फ़ैसले के बाद हयाग्रीब माधव मंदिर के पुजारी आमरण अनशन पर बैठ गए हैं. मंदिर के द्वार बुधवार को ही बंद कर दिए गए थे.

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मंदिर के पुजारियों का कहना है कि पक्षियों की लड़ाई धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत भगवान विष्णु के समय हुई थी.

असमिया कैलेंडर के अनुसार एक माघ यानि 15 जनवरी को असम के जातीय उत्सव माघ बिहू की शुरूआत हाजो में बुलबुल लड़ाई से होती है, जिसे देखने सैकड़ों लोगों की भीड़ जुटती है.

गुवाहाटी से 35 किलोमीटर दूर हाजो के प्राचीन हयाग्रीब माधव मंदिर के पास जमा लोगों में बुलबुल की लड़ाई पर रोक लगाए जाने से निराशा नज़र आई.

उस उत्सव में लड़ाने के लिए 300 से अधिक पक्षियों को विभिन्न स्थानों से हाजो लाया जाता है.

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इस मामले की याचिकाकर्ता पीपल फॉर एनिमल्स संस्था से जुड़ीं संगीता गोस्वामी कहती है, "प्रशिक्षण देने के साथ ही लड़ाई से दो दिन पहले इन पक्षियों को ख़ाली पेट रखा जाता है और अक्सर ज़्यादा क्रूर बनाने के लिए नशा भी दिया जाता है."

"भूख इन पक्षियों को एक दूसरे पर हमला करने पर मजबूर करती है. इसमें सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाले पक्षी के मालिक को 10,001 रुपये का इनाम दिया जाता है."

उत्सव आयोजन समिति के सदस्य दिजेन भराली ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि बुलबुल की लड़ाई सालों पुरानी परंपरा का हिस्सा है, हालांकि इस बार कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए बुलबुलों की लड़ाई का आयोजन नहीं किया जााएगा.

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उन्होंने कहा कि हयाग्रीब माधव मंदिर संचालन समिति और बुलबुल लड़ाई आयोजन समिति की बैठक में इस बार बुलबुलों की लड़ाई न करवाने का फ़ैसला किया गया है.

हालांकि हाईकोर्ट से इस परंपरा को जारी रहने देने का आग्रह करती हुई एक याचिका दायर की गई है जिस पर 20 तारीख़ को सुनवाई होगी.

संगीता कहती हैं कि अगर मंदिर समिति इस क़ानूनी जंग को आगे बढ़ाती है तो वह भी इसके लिए तैयार हैं.

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