'क्या अज़हर की गिरफ़्तारी की बात दिखावा थी'

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भारत ने कहा है कि पाकिस्तान के साथ विदेश सचिव वार्ता को आपसी सहमति से स्थगित करने का फ़ैसला लिया गया है.

पिछले कार्यक्रम के मुुताबिक़ 15 जनवरी को दोनों देश के विदेश सचिवों की मुलाक़ात होनी थी.

कहा जा रहा है कि भारत और पाकिस्तान राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर सही दिशा में बढ़ रहे हैं. लेकिन क्या कूटनीति के जानकार भी यही मानते हैं?

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पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रह चुके सुधीर व्यास ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि जब तक पठानकोट हमले के दोषियों के बारे में स्थिति साफ़ नहीं होती, ऐसी बातचीत का कोई मतलब नहीं है. उनका कहना है -

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाहौर यात्रा बहुत अहम थी. उसके बाद पठानकोट की चरमपंथी घटना हुई. लाहौर में मोदी की पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से मुलाक़ात के बाद ऐसी घटना होने से लोग कई तरह के सवाल उठा रहे हैं.

पूछा जा रहा है कि नवाज़-मोदी की मुलाक़ात को पाकिस्तानी सेना का समर्थन नहीं था. हक़ीक़त है कि नवाज़-मोदी की मुलाक़ात के दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नसीर ख़ान जांजुआ भी वहां मौजूद नहीं थे.

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इस घटना के लिए चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है. पठानकोट घटनाक्रम के बाद लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या जैश और पाकिस्तानी सेना के बीच मतभेद हो गए हैं.

मुझे लगता है कि जैश और पाकिस्तानी सेना ख़ासकर इसकी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के बीच काफ़ी नज़दीकियां हैं.

पठानकोट के बाद दोनों देशों ने जिस तरह की कार्रवाई की हैं, उनमें कोई स्पष्टता नहीं है. मौलाना मसूद अज़हर की गिरफ़्तारी की बात उड़ी जो बाद में ग़लत साबित हुई.

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तो क्या यह ख़बर सिर्फ़ ये दिखाने के लिए आई थी कि सारा आरोप फिर से भारत पर डाल दिया जाए कि पाकिस्तान इतने क़दम उठा रहा है, भारत को अब उत्तेजित प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए.

भारत को साफ़ करना चाहिए कि वह पाकिस्तान के साथ बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन पहले पठानकोट हमले का मुद्दा सुलझाया जाए.

विदेश सचिवों की बातचीत से पहले दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों को बैठकर इस मुद्दे की छानबीन करनी चाहिए और तय करना चाहिए कि इस हमले के लिए असल में ज़िम्मेदार है कौन?

(पूर्व उच्चायुक्त सुधीर व्यास से बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन की बातचीत पर आधारित)

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