अर्थव्यवस्था के बेहतर होने का भरोसा

  • 19 जनवरी 2016

करीब 15 साल पहले गोल्डमैन सैक्स के पूर्व अर्थशास्त्री जिम नील ने ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) देशों की कल्पना की थी. उन्होंने माना था कि इन पांच देशों में आर्थिक विकास की सबसे ज़्यादा संभावना है.

लेकिन आज की तारीख में इन ब्रिक्स देशों में केवल भारत की स्थिति बेहतर दिखाई दे रही है. 2015 में भारत की आर्थिक विकास दर 7 फ़ीसदी से ज़्यादा रही है.

ज़ब दुनिया भर में आर्थिक मंदी को लेकर सुगबुगाहट का दौर देखने को मिल रहा है, ऐसे में सबकी नज़रें भारत की धीमी लेकिन सतत आर्थिक विकास दर पर ही टिकी है.

गुड़गांव के होंडा मोटरबाइक फैक्टरी में काम करने वाले स्थानीय ब्रह्मपाल को उम्मीद है कि 2016 का साल आर्थिक तौर पर बेहतर होगा. वे इसकी वजह भी बताते हैं.

उन्होंने बताया, “प्राकृतिक तेल की क़ीमतें कम हुई हैं. खाद्यान्न पर होने वाला खर्च पहले की तरह नहीं बढ़ा है. होम लोन लेना सस्ता हुआ है. ऐसे में मुझे उम्मीद है कि हम इस साल कुछ बचत करने में कामयाब होंगे.”

होंडा की फैक्टरी में ब्रह्मपाल मोटरसाइकिल की टायर बनाने के लिए मेटल वाले रिम पर रबर ट्यूब लगाते हैं. उनकी कंपनी होंडा भारत में मोटर बाइक की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी है.

उन्हें बेहतर समय की उम्मीद तो है लेकिन रूपए के मूल्य में अवमूल्यन के चलते विकास के तेजी से आने की उम्मीद नहीं है.

भारतीय अर्थव्यवस्था की गति को भांपने के लिए दोपहिया वाहनों की बिक्री एक उपयुक्त पैमाना है. इसकी वजह तो यही है कि भारत जैसे विकासशील देश में दोपहिया वाहनों का इस्तेमाल ख़ूब होता है.

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भारत के करीब एक चौथाई घरों में कम से एक मोटरबाइक तो ही है, भारत में कार वाले परिवारों की तुलना में ये चार गुना ही ज़्यादा है.

बीते साल भारत में मोटर साइकिल की बिक्री में अर्थव्यवस्था जितनी वृद्धि देखने को नहीं मिली. पिछले कुछ महीनों में मांग में भी कमी देखने को मिली है.

होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर्स, भारत के वाइस प्रेसीडेंट यादविंदर सिंह गुलेरिया कहते हैं, “लगातार दूसरे साल ख़राब मानसून के चलते दोपहिया वाहनों के बाज़ार पर असर पड़ा है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में बिक्री बढ़ी नहीं, लेकिन शहरी बाज़ार में उम्मीद बाक़ी है, ऐसे में मुझे लगता है कि भारतीय बाज़ार में मोटरबाइक उद्योग में वृद्धि जारी रहेगी.”

लेकिन क्या इस भरोसे से भारतीय बाज़ार में नए निवेश आने की उम्मीद है?

होंडा जैसे निर्माता ज़्यादा नौकरियां दे सकें, भारत को इसकी जरूरत है. इसके लिए विदेशी निवेश का आना भी जरूरी है.

कई विश्लेषक ये भी मानते हैं कि सरकार विदेशी निवेश को आकर्षित करने की दिशा में सही क़दम बढ़ा रही है.

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लेकिन अभी उसका रिजल्ट नहीं मिला है. आर्थिक फर्म जेपी मॉर्गन के भारत के मुख्य अर्थशास्त्री साजिद चिनॉय कहेत हैं, “मेरे ख़्याल से भारत में निजी निवेश ने रफ़्तार नहीं पकड़ी है. यह कई सालों से निष्क्रिय है. 2000 के मध्य में निजी निवेश काफ़ी ज्यादा था. यह बड़ा अंतर है. सरकार निजी निवेश का आकर्षित करने के लिए काफ़ी कोशिश कर रही है. हो सकता है इसमे उसे कामयाबी मिली लेकिन ऐसा अब तक हुआ नहीं है.”

वैसे ब्रह्मपाल जैसे लोगों की आम चिंता यही कि नौकरी सुरक्षित रहे, परिचित और संबंधी को नौकरी मिले और वे अपना घर आसानी से चल सके.

अर्थव्यवस्था का असर इन सब पर पड़ेगा, लेकिन अभी भविष्य को लेकर ब्रह्मपाल चिंतित नहीं हैं.

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