जल्लीकट्टू का विरोध साज़िश तो नहीं?

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अदालत ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगाया है और कई संगठन और लोग इससे खुश हैं, लेकिन इस प्रतिबंध से सबसे ज़्यादा खुश हैं बूचड़खाने.

जल्लीकट्टू का विरोध करने वाले लोग ये तय कर रहे हैं कि बूचड़खानों को सस्ता कच्चा माल मिलता रहे क्योंकि सांड अगर जल्लीकट्टू में शामिल नहीं होंगे तो ख़र्च न उठा पाने की वजह से किसान उन्हें बूचड़खानों को बेच सकते हैं.

जल्लीकट्टू का विरोध करने से पहले ये जानना ज़रूरी है कि ये रोमांचक खेल भर नहीं है. जल्लीकट्टू असल में ब्रीडिंग या प्रजनन की गतिविधि है.

यूरोप में इन दिनों मवेशियों को बड़े किसान रखते हैं लेकिन दक्षिण एशिया और अफ़्रीका में वो समुदाय की संपत्ति हैं.

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छोटे किसान ब्रीडिंग के लिए बड़े सांड नहीं रख सकते क्योंकि उनका रखरखाव उन्हें महंगा पड़ता है.

जल्लीकट्टू में जिन नस्लों का इस्तेमाल होता है उनमें तमिलनाडु की छह में से चार नस्लें सीधे शामिल होती हैं.

गांव की पंचायत अच्छे सांड ख़रीदती है जिनका इस्तेमाल ब्रीडिंग में और जल्लीकट्टू में होता है. ये सांड टेंपल बुल या मंदिर का सांड कहलाता है.

उत्तर भारत में दूध देने वाले मवेशी ज़्यादा हैं. मध्य भारत में पशुओं का इस्तेमाल दूध और मांस दोनों के लिए होता है. दक्षिण भारत में ऐसे मवेशी मिलते हैं जो कम दूध देते हैं लेकिन खेती संबंधी कामों के लिए अच्छे हैं.

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तमिलनाडु में जल्लीकट्टू और महाराष्ट्र, पंजाब में बैल दौड़ से नस्लों के इस तरह से विकास में मदद मिली है. जल्लीकट्टू जैसे कार्यक्रमों से अच्छे सांड का पता चलता है और उसका इस्तेमाल ब्रीडिंग में होता है.

जल्लीकट्टू पर पाबंदी से तमिलनाडु के मवेशी ख़त्म होते जा रहे हैं. कांजियम नाम की एक नस्ल 1990 में 11.74 लाख थी जो 2000 में 4.74 लाख रह गई और अब एक लाख से भी कम है.

पुलियापुलम नाम की नस्ल सिर्फ़ 30 हज़ार बची है. अगर इसकी संख्या 20 हज़ार रह गई तो ये आईयूसीएन की रेड लिस्ट में आ जाएगी. इस नस्ल पर ख़त्म होने का ख़तरा है.

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तमिलनाडु में 80 लाख मवेशी हैं. अगर ये माना जाए कि 70 लाख गायों में से आधी भी हर साल एक बछड़ा दें तो 35 लाख बछड़े होंगे. अगर जल्लीकट्टू जैसे कार्यक्रम नहीं होंगे तो ये बछड़े किस काम के रह जाएंगे?

ये कहना ग़लत है कि जल्लीकट्टू में सांड को काबू में किया जाता है या मारा जाता है बल्कि जल्लीकट्टू में सांड के कूबड़ को गले लगाया जाता है.

ये कहना ग़लत है कि जल्लीकट्टू में सांडों को नुकसान पहुंचाया जाता है. हां, 2009 में तमिलनाडु सरकार के इस बारे में क़ानून बनाने से पहले तक ऐसी कुछ घटनाएं होती थीं लेकिन बाद में ऐसा कुछ नहीं हुआ.

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सिर्फ़ एक व्यक्ति ही सांड को गले लगा सकता था. इस कार्यक्रम पर सरकारी अफ़सरों की निगरानी होती थी. कार्यक्रम के पहले और बाद में सांड की मेडिकल जांच होती थी.

ये देखा जाता था कि सांड को शराब या कोई दूसरी चीज़ तो नहीं दी गई और फिर एक प्रमाणपत्र जारी किया जाता था.

हड़प्पा घाटी की सभ्यता में मिली मुहरें ये साबित करती हैं कि बैलों को पालतू बनाने के लिए चार हज़ार साल पहले भी उनके कूबड़ को पकड़ा जाता था. इसे तमिल में येर तलवदल कहा जाता है.

जब लोगों ने एक जगह से दूसरी जगह जाना शुरू किया तो उस जगह की ज़रूरत के मुताबिक नस्लों को विकसित किया गया.

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अगर नस्लों के इतिहास की बात करें नस्लें प्रकृति और संस्कृति के मेल से बनती हैं. भारत में मिलने वाली बॉस इंडिक्स नस्ल का पालन करीब 7 हज़ार साल पहले शुरू हुआ.

शिकारी मानव ने जब बसना शुरू किया और गाय-बैलों को पालना शुरू किया जल्लीकट्टू की शुरुआत तभी से हुई.

जल्लीकट्टू का विरोध पशु अधिकार संगठनों की साज़िश है जो भारत की देसी नस्लों को ख़त्म करना चाहते हैं.

(बीबीसी संवाददाता अनुराग शर्मा से बातचीत पर आधारित)

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