सम-विषम फ़ॉर्मूला कितना कामयाब?

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दिल्ली सरकार ने राजधानी में प्रदूषण कम करने के लिए 1 से 15 जनवरी तक ऑड-ईवन फ़ॉर्मूला लागू किया था.

इन 15 दिनों में पारंपरिक और सोशल मीडिया पर इसके पक्ष और विरोध में ख़ूब चर्चा हुई.

योजना के आख़िरी दिन यानी शुक्रवार को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने योजना की सफलता पर दिल्ली वालों को बधाई दी. उन्होंने कहा, "प्रदूषण कम हुआ. लेकिन जो सबसे ज़्यादा लोगों को फ़ायदा नज़र आया कि सड़कें ख़ाली हो गईं."

उन्होंने कहा कि सड़कों में वाहन कम होने से लोगों की परेशानी कम हुई. उनके अनुसार बसों की क्षमता बढ़ी है.

केजरीवाल ने कहा कि पहले रोज़ाना 47 लाख लोग बसों से सफ़र करते थे लेकिन इस दौरान ये संख्या 52 लाख तक पहुँच गई.

उनका कहना था कि योजना के अंत में इससे निकले नतीजे की समीक्षा की जाएगी और इससे जो सीख मिली है उसी के आधार पर अगला क़दम उठाया जाएगा.

लेकिन सरकारी दावों के बावजूद लोगों के ज़हन में कई सवाल हैं. आम तौर से दिल्ली वालों के पांच सवाल हैं जिनका वे जवाब चाहते हैं.

क्या ऑड-ईवन फ़ॉर्मूले से दिल्ली में प्रदूषण कम हुआ?

दिल्ली सरकार ने योजना के शुरुआती दिनों से ही इसे कामयाब क़रार दे दिया था. दिल्ली के ट्रांसपोर्ट मंत्री गोपाल राय ने शुक्रवार को दावा किया कि योजना की अवधि के दौरान शहर में 20 से 25 प्रतिशत पदूषण कम हुआ है.

वाहनों से पैदा होने वाले पीएम 2.5 प्रदूषण में 25 प्रतिशत से अधिक कमी आई है.

हालांकि धूल और गर्द से होने वाले प्रदूषण पीएम 10 में ख़ास कमी नहीं आई है. राय का कहना था ऑड-ईवन फ़ॉर्मूला केवल वाहनों से पैदा हुए विषैले प्रदूषण पर क़ाबू पाने के लिए लागू किया गया था.

पिछले हफ़्ते दिल्ली हाई कोर्ट में भी दिल्ली सरकार ने कुछ इसी तरह के आंकड़े पेश किए थे. अदालत को ये भी बताया गया था कि दिल्ली की सड़कों पर ट्रैफ़िक में भारी कमी आई है. लेकिन इस फ़ॉर्मूले के विरोधी कहते हैं कि इस योजना का मक़सद था वायु प्रदुषण में कमी लाना. इस फ़ॉर्मूले के बाद भी हवा में अब भी प्रदूषण है, अब भी दिन में धुंध रहती है.

कोर्ट में विरोध क्यों?

हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली सरकार की इस योजना के ख़िलाफ़ कई लोगों ने याचिकाएं दाख़िल कीं जिनमें वकील आरके कपूर भी शामिल थे.

वो कहते हैं, "दिल्ली सरकार ने अदालत को बताया कि कुल प्रदूषण में वाहनों का योगदान 20 प्रतिशत है. इस 20 प्रतिशत में डीज़ल वाली गाड़ियों का योगदान 60 से 90 प्रतिशत है. इसका मतलब ये हुआ कि पेट्रोल वाली गाड़ियों से केवल 10 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है."

कपूर का तर्क ये है कि पेट्रोल वाले वाहनों में भी भारी संख्या दोपहिया गाड़ियों की है जो इस योजना में नहीं शामिल की गई हैं.

कपूर कहते हैं, "इसका मतलब ये है कि कारों से केवल 2 से 5 प्रतिशत प्रदूषण पैदा होता है. तो इस ऑड-ईवन फ़ॉर्मूले से प्रदूषण कैसे कम हो सकता है?"

याचिका दाख़िल करने वाली एक और वकील श्वेता कपूर कहती हैं, "ये योजना मोटर वाहन अधिनियम की धारा 115 के तहत लागू की गई थी जिसमें प्रदूषण कवर नहीं होता. इसीलिए हमने इसे अदालत में चुनौती दी थी."

श्वेता कहती हैं कि इस स्कीम से "हमारे संपत्ति के अधिकार और इसके फ़ायदा उठाने का भी उल्लंघन होता है".

क्या दिल्ली की जनता ने इस योजना को अपनाया?

अख़बारों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर हुए सर्वेक्षण से ये संकेत मिलते हैं कि दिल्ली की अधिकतर जनता ने इसे अपनाया है.

हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार के एक सर्वे में 61 प्रतिशत ने इसे कामयाब क़रार दिया और 68 फ़ीसद ने कहा कि इसे जारी रखा जाना चाहिए.

केवल 18 प्रतिशत लोगों ने इसका विरोध किया. मिंट अख़बार के एक सर्वेक्षण में 71 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इस योजना को 15 जनवरी के बाद भी जारी रखना चाहिए जबकि लगभग 29 प्रतिशत इसे ख़त्म करने के पक्ष में थे.

क्या इसे आगे फिर से लागू किया जाएगा?

मुख्यमंत्री केजरीवाल ने पहले ही कह रखा है कि आगे इसे जारी करने का फ़ैसला आंकड़ों के विश्लेषण के बाद लिया जाएगा. गोपाल राय कहते हैं कि उनके मंत्रालय में लोग अपनी सलाह भेज रहे हैं जिन में अधिकतर लोग इस स्कीम को जारी रखने की सलाह दे रहे हैं. लेकिन हाई कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली सरकार जब भी इस तरह की योजना लाएगी उसे विरोधी तर्क पर भी विचार करना होगा.

विरोधी तर्क क्या हैं?

वकील आरके कपूर कहते हैं कि उन्होंने अदालत को ये बताया कि दिल्ली सरकार प्रदूषण को कम करने के लिए ऑड-ईवन के बजाए कई दूसरे क़दम उठा सकती है. उन्होंने चार सुझाव दिए.

"पहला पेट्रोल और डीज़ल में मिलावट को ख़त्म करो जिससे प्रदूषण फैलता है. दूसरा डीज़ल के दाम बढ़ाओ, तीसरा दिल्ली में पर्याप्त सीएनजी स्टेशन बनाए जाएं ताकि लोग सीएनजी गाड़ियों का इस्तेमाल कर सकें और चौथा प्रदूषण कंट्रोल केंद्र की संख्या बढ़ाई जाए और जिन वाहन चालकों ने प्रदूषण सर्टिफ़िकेट नहीं हासिल किए हैं उन पर भारी जुर्माना लगाओ."

याचिका दायर करने वाली नुपूर मल्होत्रा के अनुसार विकलांगों को इस योजना से अलग रखना चाहिए. गुंजन खन्ना ने भी याचिका दायर करके कहा था कि साइकिल ट्रैक बनाने का सही इंतज़ाम होना चाहिए.

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आरके कपूर के अनुसार दिल्ली सरकार अगर टूटी-फूटी सड़कों की मरम्मत करे, सड़कों और फुटपाथों से अतिक्रमण हटाए और ट्रैफ़िक सिग्नल को बेहतर बनाया जाए तो यातायात का प्रवाह ऑड-ईवन के बग़ैर भी हासिल किया जा सकता है.

कुछ आलाचकों का कहना है कि दिल्ली सरकार को पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में सुधार लाने की ज़रुरत है. ट्रांसपोर्ट मंत्री गोपाल राय के मुताबिक़ दिल्ली सरकार इस साल 2000 अतिरिक्त बसें लाने की योजना बना चुकी है. राय के मुताबिक़ अप्रैल में धूल से फैलने वाले प्रदूषण पर क़ाबू पाने के उपाय किए जाएंगे.

फ़िलहाल दिल्ली सरकार इस योजना को कामयाब क़रार देकर जश्न मनाने के मूड में है. केजरीवाल ने रविवार को दिल्ली वालों को जश्न में शामिल होने का न्योता भी दिया है.

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