'दत्तात्रेय के पत्र लिखने से शुरू हुई समस्या'

  • 18 जनवरी 2016
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हैदराबाद सेंट्रल विश्वविद्यालय में अंबेडकर छात्र संघ से जुड़े दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय का लिखा एक पत्र विवाद का केंद्र बन गया है.

रोहित और चार अन्य दलित छात्रों को कुछ दिन पहले विश्वविद्यालय के हॉस्टल से निकाला गया था और रोहित ने रविवार को आत्महत्या कर ली थी.

अब केंद्रीय मंत्री बंडारु दत्तात्रेय के ख़िलाफ़ आत्महत्या के मामले में एफ़आईआर दर्ज की गई है और उन पर एससी-एसटी कानून के तहत भी मामला दर्ज किया गया है.

हालांकि भारतीय चैनल एनडीटीवी से बात करते हुए दत्तात्रेय ने आरोपों को ख़ारिज किया है और कहा है कि छात्र की आत्महत्या का उनके लिखे पत्र से कोई संबंध नहीं है.

उधर हैदराबाद की उस्मानिया यूनियवर्सिटी में अंबेडकर छात्र संघ के अध्यक्ष मात्ताकृष्ण ने बीबीसी को बताया, "पिछले साल अगस्त में दत्तात्रेय ने जो पत्र लिखा था, उसी के बाद से विश्वविद्यालय में यह सारी समस्याएं शुरू हुईं. पहले भी 11 दलित छात्रों ने सामाजिक भेदभाव के कारण आत्महत्या की है. "

बंडारु दत्तात्रेय ने अगस्त, 2015 में मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी को पत्र लिखा था.

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विश्वविद्यालय परिसर में प्रदर्शन कर रहे अंबेडकर स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन के सदस्यों ने भाजपा से जुड़ी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के अध्यक्ष सुशील कुमार के साथ कथित तौर पर धक्का-मुक्की की थी. इसके बाद दत्तात्रेय ने यह पत्र लिखा था.

बंडारु दत्तात्रेय ने लिखा था, "विश्वविद्यालय कैंपस जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्र विरोधी राजनीति का अड्डा बनता जा रहा है. ये इससे साफ़ होता है कि जब याकूब मेमन को फांसी दी गई थी तो अंबेडकर छात्र संघ के छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया था. "

दत्तात्रेय ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर मूकदर्शक बने रहने का आरोप लगाया था.

दत्तात्रेय के पत्र के बाद मानव संसाधन मंत्रालय ने विश्वविद्यालय को एक पैनल बनाने का आदेश दिया था जिसने निलंबन का फ़ैसला किया था.

फिर छात्रों के विरोध के बाद प्रभारी कुलपति ने निलंबन का फ़ैसला वापस ले लिया था.

विश्वविद्यालय के कुलपति अप्पा राव पिंदिले ने कहा, "मैंने जब सितंबर में पदभार संभाला, तब मुझे बताया गया कि चूंकि जांच एक स्टैचूटरी समिति ने की है इसलिए इसके फ़ैसले को पलटा नहीं जा सकता."

उनका कहना है, "कार्यकारी परिषद की उपसमिति का अध्यक्ष होने के नाते मैंने उनके अकादमिक कोर्स से निलंबन का फ़ैसला वापस ले लिया ताकि वे फ़ेलोशिप से हाथ न धो बैठें. हमने इसके बदले में उन्हें सिर्फ हॉस्टल से निलंबित करने का फ़ैसला किया."

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इस बीच एक छात्र के अभिभावकों ने निलंबन को हाई कोर्ट में चुनौती दे दी. फिर कार्यकारी परिषद के फ़ैसले की जानकारी आने मिलने से पहले ही एएसए के नेतृत्व वाली ज्वाइंट ऐक्शन कमेटी ने विश्वविद्यालय के बाहर धरना शुरू कर दिया.

अप्पा राव ने कहा, "ये दुख की बात है कि एक छात्र ने जान दे दी. लेकिन उसका सुसाइड नोट देखकर साफ़ है कि उसने निलंबन की वजह से आत्महत्या नहीं की है. उसने पत्र में वजह अपनी मानसिक स्थिति बताई है."

लेकिन मात्ताकृष्ण कहते हैं," रोहित ने बचपन से ही भेदभाव का सामना किया है और अब भी उसे ऐसा ही महसूस होता था, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया."

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उनका आरोप है, "इसमें कोई शक नहीं है कि दत्तात्रेय के पत्र से ही ये सब हुआ है. उन्हें हमें राष्ट्र विरोधी, जातिवादी और अतिवादी नहीं कहना चाहिए था."

दलित मामलों के विशेषज्ञ और विश्वविद्यालय में प्रॉफेसर रह चुके प्रॉफेसर कांचा इल्लैया कहते हैं, "इस विश्वविद्यालय में आने वाले दलित छात्र सचमुच होनहार होते हैं. वे अपनी बात रखते हैं तो ऊंची जाति के छात्र इसका विरोध करते हैं. प्रशासन को ऐसी स्थिति से निपटने के लिए विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए. "

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