भारत का कितना बड़ा मददगार है इसराइल?

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भारत और इसराइल के बीच तेज़ी से बढ़ रहे सामरिक संबंधों पर बात करना अब टैबू नहीं रहा. मई, 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ज़ोरदार जीत के बाद, भारत और इसराइल के संबंध नए स्तर तक पहुंच गए हैं.

दोनों देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों, यहां भारतीय जनता पार्टी और इसराइल में लिकुड की सरकारें हैं. दोनों में विचारधारा के स्तर पर कई समानताएं हैं. इसने दोनों देशों के आपसी संबंधों को विस्तार दिया है.

भारत में चुनाव परिणाम आने से पहले ही अनुमान लगाया जा रहा था कि दोनों देशों के बीच रक्षा सौदे, ख़ासकर सैन्य कारोबार को बढ़ावा मिलेगा, जिस तरह के सैन्य समझौते हुए हैं, वह इसकी पुष्टि भी करते हैं.

पहले की तरह, अब दोनों देशों के नेता मौजूदा रिश्तों की मज़बूती के बारे में बात करने में झेंपते नहीं हैं. भारत में इसराइली राजदूत डेनियल कारमोन ने पिछले साल मार्च में दोनों देशों के बीच बढ़ते हुए सैन्य समझौते के बारे में कहा था, ''हमें ना तो संकोच है और ना ही हम शर्मिंदा हैं.''

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वहीं इसराइली वित्तमंत्री मोशे यालून ने बीते साल फ़रवरी में भारत का दौरा किया था. उन्होंने इस दौरान माना था कि इसराइल के सैन्य उद्योग के लिहाज़ से भारत महत्वपूर्ण है. उन्होंने भारत के साथ तकनीकी दक्षता और विशेषज्ञता को साझा करने की इच्छा भी जताई थी. उनकी इस यात्रा से दोनों देशों के बीच सरकारी और निजी सेक्टर में हथियारों के उत्पादन को फ़ायदा होने की उम्मीद की जा रही है.

1990 के मध्य से ही भारत और इसराइल के बीच सैन्य संबंध सबसे अहम रहे हैं. बीते एक दशक के दौरान दोनों देशों के बीच क़रीब 670 अरब रुपए का कारोबार हुआ है. मौजूदा समय में, भारत सालाना क़रीब 67 अरब से 100 अरब रुपए के सैन्य उत्पाद इसराइल से आयात कर रहा है.

ये आंकड़े तब और महत्वपूर्ण लगने लगते हैं जब उस तथ्य की ओर ध्यान जाता है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत जनवरी, 1992 में हुई थी. दोनों देशों के बीच रिश्ते को मज़बूती देने में इसराइल की हथियार बेचने की मंशा भी रही है.

इसमें 1999 के करगिल युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए लेज़र गाइडेड बम और मानवरहित हवाई वाहन शामिल रहे हैं. संकट के समय भारत के अनुरोध पर इसराइल की त्वरित प्रतिक्रिया ने उसे भारत के लिए भरोसेमंद हथियार आपूर्ति करने वाले देश के तौर पर स्थापित किया और इससे दोनों देशों के रिश्ते काफ़ी मज़बूत हुए हैं.

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फ़ाइटर एयरक्राफ़्ट को अगर छोड़ दें तो इसराइल ने भारत को कुछ अहम हथियार उपलब्ध कराए हैं. मौजूदा समय में इसराइल मिसाइल, एंटी मिसाइल सिस्टम, यूएवी, टोह लेने वाली तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक वारफ़ेयर सिस्टम, हवाई जहाज़ में इस्तेमाल होने वाली तकनीक और गोला-बारूद इसराइल बड़ी मात्रा में भारत को मुहैया कराता है. दोनों देशों के बीच हुए समझौतों में से ज़्यादातर इन्हीं सैन्य उत्पादों से संबंधित होते हैं.

भारत के रक्षा बाज़ार की अहमियत उस सौदे से भी ज़ाहिर होती है, जब इसराइल ने भारत को मई, 2009 और मार्च, 2010 में 73.7 अरब रुपए में रूस निर्मित इल्यूशिन द्वितीय-76 से लैस फ़ाल्कन एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (अवाक्स) बेचा था.

भारतीय वायुसेना के पास तीन ऑपरेशनल अवाक्स मौजूद हैं, इसके अलावा दो अन्य के जल्दी ही वायुसेना में शामिल होने की उम्मीद है. अमरीकी दबाव में यह तकनीक इसराइल ने चीन को नहीं दी है.

बीते दो सालों के दौरान, दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण सैन्य समझौता हुए हैं. मोदी सरकार के सत्ता में आने के कुछ ही महीनों बाद सितंबर, 2014 में भारत ने इसराइली एयरोस्पेस इंडस्ट्री की बराक- एक एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम ख़रीदने की घोषणा की थी, यह सबसे महत्वपूर्ण समझौतों में एक है.

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इस ख़रीददारी के लिए भारत को क़रीब 965 करोड़ रुपए चुकाने होंगे, पिछली यूपीए सरकार इस समझौते से पीछे हट गई थी. लेकिन मौजूदा सरकार भारत की सैन्य रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने पर ज़ोर दे रही है. इसमें भारतीय नौ सेना को एंटी बैलिस्टिक मिसाइल से लैस करना भी शामिल है.

एक महीने बाद, भारतीय रक्षा ख़रीद परिषद ने 8,356 इसराइली निर्मित स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) और 321 लॉंचरों को 52.5 करोड़ डॉलर में ख़रीदने का फ़ैसला लिया. यह समझौता भी महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि इसराइल उपकरणों को अमरीकी जेवेलिन मिसाइल पर तरजीह दी गई.

अमरीका ने अपनी ओर से जेवेलिन मिसाइलों को बेचने की बहुत कोशिश की लेकिन दोनों देशों के बीच सैन्य-तकनीकों की अदलाबदली के अनसुलझे मसले को देखते हुए भारत सरकार ने स्पाइक पर भरोसा जताया.

हालांकि इस समझौते से इसराइल को प्रसन्न होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह समझौता भारत के उस नज़रिए के चलते संभव हो पाया जिसके तहत भारत सैन्य उत्पादों की ख़रीद के साथ-साथ सेना को आधुनिक बनाने के लिए तकनीकों को भी हासिल करने की रणनीति पर काम कर रहा है. इसका ज़िक्र सितंबर, 2014 में शुरू हुए मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट में है.

इसके अलावा भारत ने इसराइल से 2680 करोड़ रुपए की 10 हेरॉन टीपी यूएवी (मानवरहित हवाई वाहन) ख़रीदने की भी घोषणा की है. इसकी मदद से भारतीय सेना की निगरानी करने और टोह लेने की क्षमता काफ़ी बढ़ जाएगी.

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भारत अभी निगरानी और टोह लेने के लिए इसराइल में निर्मित 176 ड्रोन इस्तेमाल कर रहा है, जिसमें 108 आईएआई (इसराइली एयरोस्पेस इंडस्ट्री) सर्चर हैं जबकि 68 बिना शस्त्र वाले हेरान एक एयरक्राफ़्ट हैं. इसके अलावा भारतीय वायुसेना के पास आईएआई निर्मित हार्पी ड्रोन्स हैं.

इन परंपरागत सैन्य उपकरणों के साथ सीमा पर बाड़ लगाने से संबंधित तकनीक का भी भारत, इसराइल से निर्यात कर रहा है. इसका इस्तेमाल जम्मू एंड कश्मीर के लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर किया गया है. उदाहरण के लिए, गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नवंबर, 2014 के इसराइली दौरे के समय नेतन्याहू ने कहा था कि इसराइल भारत के साथ सीमा सुरक्षा की तकनीकों को शेयर के लिए तैयार और इच्छुक है. सीमा पार से घुसपैठ के बढ़ते मामले को देखते हुए इस दिशा में ज़्यादा सहयोग की उम्मीद है.

इसके अलावा भारत और इसराइली सैन्य कारोबार में सह उत्पादन और संयुक्त उपक्रम अन्य महत्वपूर्ण पहलू हैं. यह लंबी और मध्य दूरी तक मार करने वाले एयर मिसाइल, ईडब्ल्यूएस, अन्य हवाई सामरिक उपकरणों के विकास के लिए भारत के डिफेंस रिसर्च एंड डेवेलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) और इसराइली एयरोस्पेस इंडस्ट्री (आईएआई) एवं कुछ अन्य इसराइली फ़र्म के मध्य होने वाला सहयोग है.

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हाल ही में दोनों देशों के संयुक्त उपक्रम को तब बड़ी कामयाबी मिली जब दोनों देशों द्वारा विकसित बराक-8 एलआर-एसएएम (70 किलोमीटर की रेंज वाले) का दिसंबर, 2015 में सफलतापूर्वक प्रेक्षण किया गया. अब इस बात की संभावना है कि दूसरे देश भी भारत और इसराइल से ये मिसाइल ख़रीद सकते हैं.

इन सबको देखते हुए, भारत और इसराइल के बीच सैन्य कारोबार का भविष्य काफ़ी चमकदार दिख रहा है और इसके बढ़ने की उम्मीद है. भारत सैन्य तकनीकों को हासिल करना चाहता है और यह इकलौती ऐसी वजह है जिसके चलते उसे इसराइल के साथ अपने रिश्ते को बढ़ाने की ज़रूरत है.

भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की सुस्त रफ़्तार को देखते हुए इसराइल भारत का सबसे महत्वपूर्ण मददगार साबित हो सकता है. ऐसे में भारत और इसराइल के सैन्य कारोबार में तकनीक हस्तांतरण सबसे अहम पहलू है, इसका ज़िक्र भारतीय प्रधानमंत्री भी कर चुके हैं.

इससे ज़ाहिर है कि दोनों देशों के बीच आपसी रिश्ते रक्षात्मक सौदे और राष्ट्रीय सुरक्षा की सामरिक चुनौतियों पर निर्भर होंगे.

(लेखक भारत और इसराइल के सैन्य रिश्तों पर पीएच.डी कर रहे हैं.)

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