स्किन बैंक न होता तो ज़िंदा न होता

  • 21 जनवरी 2016
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हाल ही में जब बॉलीवुड से ख़बर आई कि बोनी कपूर और सोहैल ख़ान ने अपनी त्वचा दान करने का प्रण किया है, तो कई लोगों ने पूछा कि आख़िर त्वचा दान क्या है?

इसे समझने के लिए 26 मई 2008 की ओर मुड़ते हैं. सुबह क़रीब 8.35 बजे का वक़्त था जब मुंबई के वडाला हिल एंटाप इलाक़े में ज़ोरदार सिलेंडर धमाका हुआ. चारों तरफ़ झुलसे शरीर ज़मीन पर पड़े हुए थे. उनमें 26 वर्षीय बालकृष्ण गुडेकर भी थे.

सेल्समैन की नौकरी करने वाले बालकृष्ण एक दिन पहले ही बोरीवली से अपनी मां को पैसे देने आए थे. धमाके में बालकृष्ण के तीन भाई तो बच गए, लेकिन उनकी मां की मृत्यु हो गई और उनका शरीर 90 प्रतिशत तक झुलस गया. किसी तरह वो लोगों की मदद से टैक्सी लेकर सायन अस्पताल पहुंचे और उनका इलाज हुआ. वो 21 दिन कोमा में थे.

ये शायद अस्पताल का स्किन या त्वचा बैंक था जो बालकृष्ण के लिए वरदान साबित हुआ और वो क़रीब ढाई महीने बाद वापस घर लौट पाए.

बालकृष्ण कहते हैं, “उस वक़्त मुझे त्वचा दान के बारे में नहीं पता था. बाद में मुझे इसके बारे में पता चला. ये कहना मुश्किल है अगर स्किन बैंक नहीं होता तो क्या होता.”

दरअसल, लोगों ने नेत्र दान, गुर्दा दान, लीवर दान के बारे में तो सुना है लेकिन स्किन या त्वचा दान के बारे में शायद कम लोग जानते हैं.

मुंबई के सायन अस्पताल में शल्यचिकित्सा विभाग की पूर्व प्रमुख डॉक्टर मीना कुमार बताती हैं, “ये लिवर, किडनी ट्रांसप्लांट जैसा नहीं है. इस प्रक्रिया में डोनर की त्वचा को शरीर से निकाल कर पीड़ित के जले हुए हिस्से पर लगाते हैं. इसे आप प्राकृतिक पट्टी भी कह सकते हैं. आठ, 10 दिन बाद त्वचा निकल जाती है. ये अस्थाई कवर है.”

आमतौर पर जले हुए रोगी को ख़ुद की ही त्वचा लगाई जाती है लेकिन अगर व्यक्ति बहुत ज़्यादा जला हुआ हो तो दान की गई त्वचा को पीड़ित के शरीर पर इस्तेमाल किया जाता है.

दान की गई त्वचा को मृतक की जांघ, पीठ या पांव से निकाला जाता है. त्वचा निकालते वक़्त शरीर से ख़ून नहीं निकलता क्योंकि डोनर मर चुका होता है. मरने के छह से आठ घंटे तक मृतक की त्वचा को निकाला जा सकता है. त्वचा निकालने के बाद डॉक्टर ड्रेसिंग कर देते हैं इसलिए व्यक्ति के अंतिम संस्कार में कोई समस्या नहीं होती.

डॉक्टर मीना कुमार बताती हैं कि पीड़ित की चोट पर त्वचा रखने से महत्वपूर्ण प्रोटीन फ्लूड्स निकलना बंद हो जाते हैं, जिससे इन्फ़ेक्शन रुक जाता है. साथ ही रोज़ ड्रेसिंग करने की ज़रूरत नहीं होती और दर्द भी नहीं होता है.

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Image caption दुष्यंत शाह ने अपनी मां तारामती शाह की त्वचा को दान किया था.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की अप्रैल 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया भर में हर साल जलने से दो लाख 65 हज़ार लोगों की मृत्यु हो जाती है और भारत में हर साल एक लाख से ज़्यादा लोग जलने से सामान्य या गहरी चोट का शिकार होते हैं.

इन्हीं कारणों से वर्ष 2000 में भारत का पहला स्किन बैंक मुंबई के सायन अस्पताल में खोला गया.

वर्ष 2000 में डॉक्टर माधुरी गोरे अस्पताल के शल्यचिकित्सा विभाग की प्रमुख थीं.

वो बताती हैं कि बैंक की शुरुआत में लोगों को मृतक की त्वचा को दान देने के लिए मनाना बहुत बड़ी चुनौती थी.

वो कहती हैं कि त्वचा निकालने जाने वाले डॉक्टरों को मृतक के परिवार को समझाने के लिए तैयार करना भी एक बड़ी चुनौती थी.

माधुरी गोरे कहती हैं, “मैंने कई जगह पर लेक्चर्स दिए. मैगज़ीन में आर्टिकल लिखे. अख़बारों ने काफ़ी मदद की. हो सकता है कि मृतक का परिवार त्वचा दान के बारे में जानता हो, लेकिन उस समय पर अंगों या त्वचा दान के बारे में सोचना मुश्किल हो सकता है. इसलिए किसी अन्य व्यक्ति को ये सोच परिवारवालों के मन में जगाने की ज़रूरत होती है. इस कारण समाज में काउंसलर होना ज़रूरी है.”

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जहां हृदय प्रत्यारोपण को छह घंटों में, जिगर प्रत्यारणोप को 12 घंटों में, गुर्दे के प्रत्यारोपण को 24 और 48 घंटों के भीतर करना पड़ता है, मृतक की त्वचा को 85 प्रतिशत ग्लिसरॉल में छह महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

त्वचा देने वाले व्यक्ति के ख़ून की जांच की ज़रूरत नहीं होती हालांकि सेप्टिसीमिया रोगी त्वचा दान नहीं कर सकते. डोनर पर एचआईवी जैसे अन्य टेस्ट भी किए जाते हैं.

सायन अस्पताल को त्वचा दान के काम में मुंबई स्थित संडे फ्रेंड्स नाम की समाजसेवी संस्था से बहुत मदद मिली.

30 साल पुरानी इस संस्था के एक सदस्य ने बताया कि शुरुआत में “लोगों को लगता था कि त्वचा लेने से अंदर के अंग दिखाई देने लग जाएंगे, मांसपेशियां बाहर आ जाएंगी लेकिन हमने सेमिनार किए जहां मुत्यु प्रमाण पत्र जारी करने वाले डॉक्टरों को हमने बुलाया और समझाया कि इस प्रक्रिया में त्वचा के मात्र ऊपरी हिस्सो को हटाया जाता है, वो भी जांघ और पीठ से.”

इस संस्था के अनुसार अभी तक उसने क़रीब 1100 लोगों की त्वचा को इकट्ठा करने में मदद की है.

मुंबई के सायन के व्यापारी दुष्यंत शाह ने अगस्त 2008 में अपनी मां की त्वचा दान की थी.

78 वर्षीय उनकी मां तारामती शाह की जब मृत्यु हुई तो वो डायलिसिस पर थीं.

दुष्यंत बताते हैं, “एक तरफ़ जहां मुझे दुख था, मां की आंख और त्वचा दान कर मुझे ख़ुशी भी हुई. मेरी मां ने भी मुझसे कहा था कि जो भी संभव हो मेरे शरीर का दान कर देना. सायन अस्पताल से 20 मिनट में डॉक्टर आ गए थे.”

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वो कहते हैं मौत के बाद अगर आप किसी के काम आएं तो ये भी नेक काम है और उनके परिवार में किसी ने भी ऐसा करने से मना नहीं किया.

त्वचा दान करने के लिए परिवार की सहमति अनिवार्य है.

सायन अस्पताल में हर साल 700-800 जलने के मामले आते हैं जिनमें से क़रीब 70 प्रतिशत मामले महिलाओं से जुड़े होते हैं.

डॉक्टर मीना कुमार के अनुसार “ज़्यादातर मामलों में हमें कहा जाता है कि मामले दुर्घटना से जुड़े हैं. कई मामले किचन से जुड़े होते हैं. कुछ में महिलाएं ख़ुद पर केरोसीन डालकर जला लेती हैं. कभी कभी आत्महत्या की कोशिशें भी होती हैं. त्वचा की ज़रूरत उन्हें पड़ती है जो 35-40 प्रतिशत जल जाते हैं.”

औसतन क़रीब 100 लोग हर साल अस्पताल को त्वचा दान देते हैं लेकिन इस संख्या के और बढ़ने की ज़रूरत है.

सायन अस्पताल के बाद दूसरे इलाक़ों में निजी स्किन बैंक खुले हैं और कार्यकर्ताओं और डॉक्टरों को उम्मीद है कि इस बारे में जैसे जैसे जागरुकता बढ़ेगी, त्वचा दान करने वाले लोगों की संख्या में भी बढ़ोतरी होगी.

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