ईसा की मूर्तियों से मिली प्रेरणा

  • 23 जनवरी 2016
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माधवी पारेख मशहूर कंटेम्पररी आर्टिस्ट हैं. साल 1942 में गुजरात में आनंद जिले के संजय गाँव में जन्मी माधवी नहीं जानती थीं कि वह आगे जाकर कलाकार बनेंगी.

शादी के बाद माधवी अपने चित्रकार पति के साथ मुंबई आ गईं. यहाँ उनका परिचय कला जगत से हुआ. वे अपने पति के साथ चित्र प्रदर्शनियों, म्यूज़ियम वगैरह देखने जाती थीं.

माधवी ने एक दिन चित्र बनाने की इच्छा ज़ाहिर की, तो उनके पति मनु पारेख ने उन्हें चित्रकला की बारीकियां सिखानी शुरू कीं.

मनु ख़ुद जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स से पढ़े थे. माधवी ने कुछ समय मॉन्टेसरी स्कूल में शिक्षिका के बतौर भी काम किया.

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जब वह माँ बनने वाली थीं, उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी. उसके बाद माधवी ने 1964 से अपना समय पूरी तरह से चित्रकला को समर्पित कर दिया.

1972 से अब तक वह कई एकल और समूह प्रदर्शनियों में अपने चित्र प्रदर्शित कर चुकी हैं.

साल 1992 में विदेश विभाग ने माधवी और मनु पारेख पर 'द्वित्या' नाम से एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म भी बनाई थी.

साल 1972 से 1993 के बीच में माधवी की आठ एकल प्रदर्शनी लग चुकी हैं. अब तक माधवी लंदन,एम्स्टर्डम , न्यूयॉर्क, ऑस्ट्रेलिया और कुवैत में प्रदर्शनी कर चुकी हैं.

फ़िलहाल, माधवी दिल्ली में रहती हैं और अपनी नई सिरीज़ पर काम कर रही हैं.

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माधवी के चित्रों में ग्रामीण परिवेश की झलक मिलती है.

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माधवी मानती हैं कि किसी भी कलाकार के लिए रोज़ अभ्यास करना बहुत ज़रूरी है.

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माधवी बताती हैं कि उनके पिता शिक्षक थे जो उन्हें और उनकी बहनों को दुर्गा, काली, लक्ष्मीबाई की कहानियां सुनाते थे.

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माधवी बचपन में डॉक्टर बनना चाहती थीं पर 15 साल की उम्र में उनकी शादी मनु पारेख से हो गई.

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मनु पारेख ने पेंटिंग में उनकी रुचि देखकर उन्हें कला की बारीकियां सिखानी शुरू कीं.

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रूस में उन्होंने कई चर्च देखे. जीसस की मूर्ति ने माधवी को बहुत प्रभावित किया. उन्होंने भारत लौटकर जीसस सिरीज़ पर चित्र बनाए, जो बहुत पसंद किए गए.

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साल 1968 में माधवी ने कोलकाता में अपनी पहली चित्र प्रदर्शनी की. वे कहती हैं उन्होंने कला अपने पति और कोलकाता शहर से सीखी.

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पारिवारिक ज़िम्मेदारियों और कला साधना में माधवी ने सामंजस्य बिठाया और दोनों ज़िम्मेदारियां वह बखूबी निभा रही हैं. माधवी रोज़ पांच से छह घंटे अपने स्टूडियो में बिताती हैं.

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माधवी बताती हैं, "उन दिनों हमें बजट में घर चलाना होता था. उसमें से मैं सौ रुपए कैनवस और रंगों के लिए बचाती थी."

माधवी मानती हैं यदि कोई महिला पारिवारिक ज़िम्मेदारियों और कला के बीच सामंजस्य बनाकर चले, तो उसका काम प्रभावित नहीं होता.

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