जनहित याचिका हर समस्या का समाधान है?

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उच्चतम न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान, जनहित याचिकाओं के संदर्भ में सही कहा था, ''अगर इसको सही ढंग से नियंत्रित न किया गया और इसके दुरुपयोग को नहीं रोका गया, तो यह अनैतिक हाथों द्वारा प्रचार, प्रतिशोध और राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि का हथियार बन सकता है.''

जनहित की आड़ में आधारहीन याचिकाओं की निरंतर बढ़ती बाढ़ का भयावह खतरा, अदालतों के सिर पर मंडरा रहा है. विशेषकर तब, जब वर्षों से लंबित विचाराधीन मुक़दमे बढ़ते जा रहे हैं, जो एक बड़ी चुनौती भी है और गंभीर चेतावनी भी.

दरअसल 1979-80 के आसपास विचाराधीन क़ैदियों, लावारिस बच्चों, वेश्याओं, बाल मज़दूरों और पर्यावरण के मुद्दों पर तमाम लोगों ने जनहित याचिकाएं दायर कीं. अदालत ने भी 'जनहित याचिकाओं' की अनिवार्यता को समझा.

न्याय व्यवस्था में आम लोगों के बढ़ते आक्रोश को शांत करने के लिए, यह ज़रूरी भी था और मजबूरी भी. हालांकि इससे सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक न्याय के लक्ष्य 'आधे-अधूरे' ही रहे. शोषितों की आंख के आंसू कम नहीं हुए और राष्ट्रीय स्तर पर विषमता की खाई, लगातार चौड़ी और गहरी होती रही.

सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति ए.के. माथुर और मार्कंडेय काटजू ने एक मामले का फ़ैसला सुनाते समय, अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए लिखा, ''भारत में मौजूदा न्यायिक हालात से जनता बेहद क्षुब्ध है. मुक़दमों में होने वाली ज़रूरत से अधिक देरी के कारण, न्याय व्यवस्था में उसकी आस्था तेज़ी से घट रही है. हम संंबंधित अधिकारियों से आग्रह करते हैं कि अगर न्यायपालिका में नागरिकों का विश्वास बनाए-बचाए रखना है, तो तुरंत आवश्यक कार्यवाही करें ताकि मामलों को गति से निपटाया जा सके.'' (2007,(11) सुप्रीम कोर्ट केस 37)

'जनहित' में याचिकाओं की मंज़ूरी मिलते ही, एक के बाद एक महत्वाकांक्षी 'स्वयंसेवी संगठन' प्रबुद्ध समाजसेवी, बड़े वकील, पत्रकार और अन्य ‘क्रांति-धर्मी’ या ‘स्वप्न-जीवी’ अपने या प्रायोजित मुद्दों पर अदालत में तर्क-कुतर्क करने लगे.

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कुछ ने तो अपनी सारी ऊर्जा और प्रतिभा ‘जनहित योजनाओं’ पर ही केंद्रित कर दी. इन लोगों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फंड और ‘मान-सम्मान’ भी कमाया. ऐसे अधिकांश स्वयं-सिद्ध संगठनों और नगर-नायकों या ‘नरक मसीहाओं’ की विश्वसनीयता और प्रतिबद्धता, हमेशा संदेह के घेरे में रहेगी.

सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों ने इनकी बेबुनियाद याचिकाओं पर कई बार सख्त टिप्पणी करते हुए याचिकाएं खारिज कीं और भारी जुर्माना भी लगाया है.

समय-समय पर ऐसी अनेक हास्यास्पद याचिकाएं दायर हुईं जैसे भारत का नाम बदलकर हिंदुस्तान करने, अरब सागर का नाम बदलकर सिंधु सागर करने और राष्ट्रगान बदलने संबंधी याचिकाएं. यही नहीं, इंदौर खंडपीठ के समक्ष एक याचिका में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों के विरुद्ध ही एक केस दायर हुआ था, जो भारी जुर्माने के साथ ख़ारिज हुआ.

जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के बावजूद, ग़रीबों को कोई बड़ी राहत नहीं मिली. अदालतों के पर्यावरण प्रदूषण पर अनेक आदेश, हज़ारों फैक्ट्रियों को बंद करने के निर्णय, झुग्गी-झोंपड़ियां हटाने के हुक्म समाजोपयोगी होने की बजाए जनविरोधी सिद्ध हुए.

वर्ष 1999 में रिहायशी इलाक़ों से फ़ैक्ट्री हटाने के निर्णय से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में मज़दूर घर से बेघर हुए और झुग्गी-झोपड़ियां उजाड़ी गईं, जिससे 20 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए.

एमसी मेहता बनाम भारत संघ मामले में प्रदूषण कम करने के लिए 2001 में सीएनजी वाले फ़ैसले के बावजूद, प्रदूषण पहले से अधिक बढ़ गया और राजधानी 15 दिन ‘ऑड-ईवन’ में उलझती-सुलझती रही.

सच यह है कि ‘जनहित याचिकओं का सुपर हाइवे’, हर समस्या का समाधान नहीं है. न्यायिक विडंबना यह है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न संबंधी ‘विशाखा दिशानिर्देश’ लागू करने और विधेयक बनाने में 17 साल का समय लगा. इससे लिंग समानता और स्त्री रक्षा-सुरक्षा के सवाल पर, सरकारी गंभीरता का अनुमान लगाया जा सकता है.

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‘हवाला-कांड’ से लेकर काले-धन, तमाम ‘जी’ और अन्य जनहित मुक़दमों और निर्णयों के बाद भी, आम समाज और न्याय के बीच की दूरी, कम होने के बजाए लगातार बढ़ती जा रही है. वर्षों से अनेक अदालती आदेश, संसद या सरकार की राह देख रहे हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, मानवाधिकार के बुनियादी मसले मुंह बाएं खड़े हैं.

निसंदेह न्याय सस्ता और शीघ्र सुलभ होना चाहिए, मगर इसके लिए समय रहते पूरे क़ानून और न्याय-व्यवस्था में भारी बदलाव करना पड़ेगा. हालांकि पहले ही काफ़ी देर हो चुकी है.

तथाकथित जनहित याचिकाओं या उदारवादी-सुधारवादी संशोधनों (कॉस्मेटिक सर्जरी) द्वारा, न्याय व्यवस्था के जर्जर मूल ढांचे को, अपने ही बोझ तले दबने-ढहने से बचना-बचाना असंभव लगता है.

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