फिर दिखा दलितों का असहाय चेहरा

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भारत की साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़, अनुसूचित जाति, जनजाति की तादाद कुल आबादी की लगभग 25 फ़ीसदी है.

इनमें से 16.60 प्रतिशत दलित और 8.60 प्रतिशत आदिवासी हैं. इन समुदायों को दूसरे नामों से भी पुकारा जाता है.

भारत की एक चौथाई आबादी का मतलब है लगभग 30 करोड़ लोग. यदि वे अपने आप में एक देश होते तो वह देश आबादी के लिहाज से चीन, भारत और अमरीका के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश होता.

लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था में उनकी मौजूदगी नहीं के बराबर है.

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इसकी मुख्य वजहें अच्छी शिक्षा तक उनकी पहुंच का नहीं होना और उन्हें रोज़गार के मौके नहीं मिलना है. ऐसा लंबे समय से होता आया है.

इसे दुरुस्त करने के लिए संविधान में व्यवस्था की गई. शैक्षणिक संस्थानों में दाख़िले और सरकारी नौकरियों में उनके लिए आरक्षण का इंतज़ाम किया गया.

शहरों में रहने वाले मध्य वर्ग यानी ऊंची जाति के लोगों को लगता है कि आरक्षण से उनके ख़िलाफ़ भेदभाव किया जाता है. उनका मानना है कि उनकी 'योग्यता' की बलि नहीं चढ़ाई जानी चाहिए.

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मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी शहर के किसी भी बड़े दफ़्तर में दलितों की जगह ग्रेड वन कर्मचारियों की ही है. इनमें वे भी शामिल हैं जो साफ़ सफ़ाई करते हैं.

इन संस्थानों को इस हक़ीक़त पर कोई शर्म भी नहीं है. इन बातों पर तो कोई सोचता तक नहीं है.

भारत की अर्थव्यवस्था और मीडिया में दलित और आदिवासी पूरी तरह हाशिए पर हैं.

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Image caption रोहित वेमुला

मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं कि हैदराबाद में एक दलित छात्र ने आत्महत्या कर ली है.

केंद्र सरकार के कथित दबाव के बाद पीएचडी छात्र रोहित वेमुला और दूसरे चार छात्रों को हॉस्टल से निकाल दिया गया.

इसके पहले वे लोग 'मौत की सज़ा' पर भारतीय जनता पार्टी की छात्र इकाई से भिड़ चुके थे.

इसका नतीजा यह हुआ कि एक केंद्रीय मंत्री ने शिक्षा मंत्री को चिट्ठी लिखकर इन छात्रों को राष्ट्र विरोधी और जातिवादी क़रार दिया. दलितों पर जातिवादी होने का आरोप लगाना अजीब है.

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शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने विश्वविद्यालय को चार ख़त लिख कर इन छात्रों पर कार्रवाई करने को कहा. हैरत होगी यदि शिक्षा मंत्री अपने दूसरे कामकाज में भी ऐसी ही तत्परता दिखाती हों.

इस दबाव के बाद छात्रों का हॉस्टल में रहने का हक़ और अनुदान ख़त्म कर दिया गया.

आत्महत्या के पहले रोहित के लिखे नोट से गौरव झलकता है.

जिस तरह सुकरात ने मरने से पहले कहा था कि देवता एसक्लीपायस के साथ उनका हिसाब चुका दिया जाए, रोहित ने दोस्तों से अपने 40,000 रुपए के कर्ज़ को चुका देने का आग्रह किया.

उन्होंने यह भी कहा कि उनके इस कृत्य के लिए उनके दुश्मनों पर दोष न मढ़ा जाए.

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Image caption पांच छात्रों को हैदराबाद विश्वविद्यालय के होस्टल ने निकाला गया था.

लेकिन यह तो साफ़ है कि उन्होंने ख़ुदकुशी क्यों की थी.

अपमानित होने, असहायता महसूस करने और पैसे देने से इंकार किए जाने की वजहों से ही उन्हें आत्महत्या करनी पड़ी.

स्थिति इतनी साफ़ होने की वजह से ही यह ख़बर राष्ट्रीय बन गई. इसने एक और अनचाहा काम कर दिया.

अब तक बीफ़ और मौत की सज़ा पर तमाम बहसें निहायत ही सामान्य ढर्रे पर चल रही थीं.

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ऐसा कर दिया गया था मानो यह विवाद हिंदू बहुसंख्यक और उदार मुसलमानों के बीच का हो.

हैदराबाद की इस घटना ने साफ़ कर दिया कि इन दोनों ही मुद्दों पर सभी हिंदू एकमत नहीं है, उनके विचार एक जैसे नहीं है.

यह निश्चित तौर पर ऊंची जातियों के कई सदस्यों का मत है, जिसे बाकी सभी लोगों पर ज़बरन थोपा जा रहा है.

ऊंची जातियों के हिंदुओं की तरह दलितों और आदिवासियों में बीफ़ खाना एकदम निषिद्ध नहीं है.

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जहां तक मौत की सज़ा की बात है, लोकतांत्रिक समाज के बहुसंख्यक लोग इसके ख़िलाफ़ हैं. सिर्फ़ कुछ देशों में ही न्याय करने के लिए अपने ही नागरिकों को मौत के घाट उतार देते हैं.

मुझे लगता है कि रोहित के 'बलिदान' का एक तीसरा नतीजा भी है.

वह यह है कि अब कॉर्पोरेट जगत और निजी क्षेत्र के लोग अपने 'दफ़्तरों में चल रहे रंगभेद' की ओर ध्यान दें.

जिन नौकरियों को बड़ी आसानी से ऊंची जातियों के लिए मान कर चला जाता है, वो दरअसल दूसरों को नहीं देने की वजह से ही इन्हें मिलती हैं.

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यह कहना सरासर झूठ होगा कि भारत में शिक्षा और रोज़गार के मौके सबको बराबर मिलते हैं.

स्वेच्छा से सकरात्मक पहल (अफ़र्मेटिव एक्शन) करते हुए दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को नौकरी में रखने से दफ़्तरों में ही विविधता आएगी.

कॉर्पोरेट जगत के मध्य वर्ग को एक बात बिल्कुल साफ़ कर दी जानी चाहिए.

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यदि दुनिया के चौथे सबसे बड़े देश जितनी आबादी को जान-बूझकर पीछे रखा गया तो भारत सही अर्थों में विकास कर ही नहीं सकता.

उनके ऊपर उठने पर ही भारत अपने आप को ग़रीबी और बदहाली से निकाल पाएगा.

और अनेक भारतीय, चाहे उनकी विचारधारा और सोच कुछ भी क्यों न हो, यह चाहते हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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