मिस्र के 2011 के विद्रोह के नायक आज कहां हैं?

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Image caption काहिरा के तहरीर चौक पर विद्रोही

पांच साल पहले मिस्र में विद्रोह हुआ था, जिसने पूरे देश के राजनीतिक और मीडिया परिदृश्य को बदल कर रख दिया था.

जनवरी 2011 में शुरु हुए विद्रोह ने तत्कालीन राष्ट्रपति होस्नी मुबारक की सत्ता को उखाड़ फेंका था.

सवाल यह उठता है कि उस लोकप्रिय विद्रोह के नायक आज कहां हैं और क्या कर रहे हैं?

उस विद्रोह के नायकों में कई आज अलग-अलग जेलों में बंद हैं या विदेशों में बस गए हैं. कुछ लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं तो अन्य को यक़ीन है कि जनवरी क्रांति आज भी मायने रखती है.

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Image caption वाएल ग़ोनिम, जनवरी क्रांति के प्रमुख नेता

वाएल ग़ोनिम जनवरी क्रांति के प्रतीक बन गए थे. उन पर मुक़दमा चला ताकि उनकी राष्ट्रीयता ख़त्म की जा सके. बाद में उन्हें देश छोड़ना पड़ा.

क्रांति का बिगुल फूंकने का श्रेय ग़ोनिम को ही जाता है. उन्होंने 'हम सब खालिद सईद हैं' नाम का फ़ेसबुक पेज शुरू कर लोगों से विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी.

होस्नी मुबारक के सत्ता से हटने के बाद उन्होंने देश छोड़ दिया. अब वो ख़बरों में नहीं हैं.

बीते साल ग़ोनिम ने कहा था, "क्रांति के बाद की घटनाएं ऐसी थीं, मानो किसी ने हमारे पेट पर घूंसा मारा हो. लोगों का उत्साह ठंडा पड़ गया. हम आम सहमति बनाने में नाकाम रहे और राजनीतिक संघर्ष से ज़बरदस्त ध्रुवीकरण हो गया."

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Image caption मुक़दमे के दौरान होस्नी मुबारक

वे आगे कहते हैं, "सत्ता के दो मुख्य केंद्रों- सेना के समर्थकों और इस्लाम के पक्षधरों के बीच ज़ोरदार ध्रुवीकरण हो गया. इन दो ध्रुवों के बीच रहने वाले मुझ जैसे लोग असहाय महसूस करने लगे."

मुस्लिम ब्रदरहुड और राष्ट्रपति मुहम्मद मोरसी के सत्ता से हटने के बाद गोनिम जैसे लोगों की स्थिति बदतर ही हुई.

ग़ोनिम ने कहा, "लोगों के तीन दिनों के प्रदर्शनों के बाद जब सेना ने मिस्र में पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राष्ट्रपति को पद से हटा दिया, तो मैंने पूरी तरह चप्पी साध लेने का फ़ैसला किया."

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Image caption कटघरे में मुहम्मद मोरसी

वो आगे कहते हैं, "यह पराजय का क्षण था. मैं दो साल से अधिक समय तक चुप रहा."

ग़ोनिम अब अमरीका में रहते हैं. उन्होंने वहां साल 2015 में नया ऑनलाइन प्लैटफ़ॉर्म शुरू किया. उनका रवैया सरकार विरोधी है.

प्रमुख ब्लॉगर और लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता अला अब्द-अल-फ़तह पर विरोध प्रदर्शन के दौरान क़ानून तोड़ने के आरोप में मुक़दमा चला. बीते साल उन्हें पांच साल की क़ैद की सज़ा दी गई.

इसके पहले उन्हें 15 साल जेल की सज़ा सुनाई गई थी. उन पर साल 2013 में प्रदर्शनकारियों को संगठित करने का आरोप है.

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अब्द-अल-फ़तह साल 2011 के विद्रोह के मुख्य धर्मनिरपेक्ष नेता थे. उनकी ख्याति नगारिकों पर सैनिक अदालतों में मुक़दमा चलाने का विरोध करने वाले शख़्स के रूप में थी.

उनके जेल जाने के बाद उनकी रिहाई की मांग सोशल मीडिया पर लगातार उठती रही.

अब्द-अल-फ़तह की मां लैला सुवायफ़ ने जनवरी क्रांति के पांच साल पूरे होने पर बीबीसी मॉनीटरिंग से बात की है.

उन्होंने कहा, "इस समय तो मैं अपने बेटे, उसके परिवार और देश में जो कुछ हो रहा है, उसे लेकर काफ़ी चिंतित हूं. मिस्र में इस समय दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के मामले बढ़ रहे हैं."

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सुवायफ़ ख़ुद वामपंथी कार्यकर्ता हैं. उन्होंने कहा, "क्रांति से जुड़े सभी बड़े चेहरे जेल में बंद हैं या डरे हुए हैं. दूसरों ने दमन के डर से देश छोड़ दिया है."

वो आगे कहती हैं, "25 जनवरी क्रांति का कोई मक़सद पूरा नहीं हुआ. मिस्र ने आज जैसा बुरा शासन पहले कभी नहीं देखा था."

जनवरी क्रांति के एक और प्रमुख नेता अहमद दूमा आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे हैं. उन पर दंगा करने, लोगों को भड़काने और सुरक्षा बलों पर हमले करने के आरोप हैं.

दूमा की पत्नी नूरहन हिफ़्ज़ी ने बीबीसी मॉनीटरिंग को बताया, "दूमा जेल में दो साल काटने के बाद परेशान हैं. उन्हें लगता है कि 2011 की क्रांति को ज़ोरदार धक्का लगा है."

हिफ़्ज़ी के मुताबिक़, दूमा अभी भी "बदलाव के सपने" में यक़ीन करते हैं.

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इसरा अब्द-अल-फ़तह 6 अप्रैल आंदोलन की संस्थापकों में से एक हैं. उन्होंने इस विद्रोह का नेतृत्व भी किया था.

उन्हें अरेबियन बिज़नेस ने 100 सबसे प्रभावशाली अरब महिलाओं में से एक माना था. उन्हें 2011 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार के लिए नामित भी किया गया था.

इसरा अब्द-अल-फ़तह ने बीबीसी मॉनीटरिंग को बताया, "क्रांति के पांच साल बाद कुछ लोग हमें धोखेबाज़ और एजेंट मानते हैं."

वे इसके लिए देश के मीडिया को ज़िम्मेदार ठहराती हैं. वे कहती हैं कि मीडिया ने 25 जनवरी क्राति के नेताओं की छवि ख़राब की है.

उनके मुताबिक मीडिया ने विद्रोह को "मिस्र को अस्थिर करने के लिए रची गई साजिश" क़रार दिया.

इसरा कहती हैं, "मैं आज भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हूं. देश का राजनीतिक माहौल राजनीति में सक्रिय रूप से जुड़ने लायक नहीं है. दमन का माहौल है. मुबारक युग की वापसी हो रही है."

Image caption अब्दुल फ़तह अल-सीसी

उन्होने बीबीसी मॉनीटरिंग को बताया, "मैं सत्ता में मौजूद लोगों से हटने को नहीं कह रही, मुझे फ़िलहाल कोई विकल्प नहीं दिख रहा है. पर मैं उनसे यह ज़रूर कहती हूं कि वे अपना रास्ता बदलें और 25 जनवरी क्रांति के मक़सद को पूरा करें. वे लोगों को रोटी, आज़ादी और सामाजिक न्याय दें."

लोगों का कहना है कि अभी भी मीडिया में कुछ लोग बचे हैं, जो क्रांति के मक़सदों को जायज़ ठहराते हैं.

ख़ालिद तलीमा उनमें एक हैं. वे 2011 की जनवरी क्रांति का चेहरा रहे हैं. इन दिनों वो मिस्र के निज़ी टेलीविज़न चैनल ओएन टीवी के प्रेंजेंटर हैं.

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Image caption काहिरा के तहरीर चौक पर विद्रोही

तलीमा 'पॉपुलर करेंट' आंदोलन के सह संस्थापक रहे हैं. वे साल 2013 में युवा मामलों के मंत्री भी बने थे.

वो कहते हैं, "जनवरी क्रांति में मेरा भरोसा अडिग है. देश की स्थिति सुधारने के लिए वह निहायत ही ज़रूरी था. विकास का एक ही रास्ता है -आज़ादी और लोकतंत्र."

उनके मुताबिक़, मौजूदा सत्ता सोचती है कि आज़ादी और लोकतंत्र विकास के विरुद्ध है.

वो अंत में कहते हैं, "क्रांति का कोई मक़सद पूरा नहीं हुआ. आज़ादी का मुद्दा आज भी बना हुआ है. पर हम उन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए काम करते रहेंगे."

( बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की ख़बरें ट्विटर और फेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं.)

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