मेटरनिटी लीव बढ़ी तो कम महिलाएं नौकरी करेंगी?

रश्मि शर्मा और आर्या

भारत में सरकार सवैतनिक मातृत्व अवकाश को 12 हफ़्ते से बढ़ाकर 26 हफ़्ते करने जा रही है. इसका मांओं और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने स्वागत किया है.

मातृत्व अवकाश बढ़ाने के लिए संसद की मंज़ूरी की ज़रूरत होगी. लेकिन केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री का कहना है कि सरकार जल्द से जल्द मातृत्व लाभ क़ानून में संशोधन के लिए प्रतिबद्ध है.

अध्यापिका रश्मि शर्मा पांच महीने पहले मां बनीं. 12 हफ़्ते के सवैतनिक मातृत्व अवकाश के बाद उन्होंने तीन महीने का अवैतनिक अवकाश भी लिया.

कुछ दिन बाद फिर से काम शुरू करने जा रहीं रश्मि कहती हैं, "काश, ऐसा (क़ानून संशोधन) मेरे समय में हो गया होता. तीन महीने बहुत कम होते हैं. मैं कहूँगी कि काम पर जाने से पहले अपने नवजात के साथ बिताने के लिए छह महीने ठीक-ठाक समय है."

यक़ीनन यह उन महिलाओं को राहत देगा जिनके हाल ही में बच्चे हुए हैं. लेकिन क्या यह इतना अधिक है कि वह अपने बच्चों की देखरेख के लिए नौकरी न छोड़ें?

उद्योगों के संगठन एसोचैम की ओर से हाल में कराए एक सर्वेक्षण में पता चला कि एक चौथाई भारतीय महिलाएं बच्चा होने के बाद अपना करियर छोड़ देती हैं.

भारत की श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है. विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में इसकी रैंकिंग बहुत ख़राब है. कुल कर्मचारियों में महिलाएं मात्र एकचौथाई हैं. यह संख्या पिछले दशकों में और भी कम हुई है.

हालांकि असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली कुछ महिलाओं को सरकारी आंकड़ों में गिना नहीं जाता. इसकी प्रमुख वजह पितृसत्तात्मक सोच की वजह से महिलाओं में शिक्षा का निम्न स्तर है, जो उनके लिए नौकरी मिलना और मुश्किल बनाता है.

महिलाओँ के बच्चा पैदा होने के बाद नौकरी छोड़ने की एक बड़ी वजह समाज का नज़रिया भी है.

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भारत में बच्चा पालना मुख्यतः मां की ज़िम्मेदारी मानी जाती है, दोनों अभिभावकों की संयुक्त ज़िम्मेदारी नहीं. बच्चा पैदा होने के बाद काम पर वापस जाने वाली महिलाओं के लिए 'महत्वाकांक्षी' और 'पेशेवर नज़रिए वाली' कहा जाता है, और यह तारीफ़ में नहीं कहा जाता.

बहुत सी महिलाएं अपने बच्चे से दूर होने पर अपराधी महसूस करने लगती हैं.

इसके अलावा इसका कॉरपोरेट प्रभाव भी है. भारत की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों में भी लिंगभेद स्पष्ट है.

देश के बाज़ार नियामक सेबी ने 2014 में स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड सभी कंपनियों के लिए अपने बोर्ड में कम से कम एक महिला निदेशक रखना अनिवार्य कर दिया था. इसके बाद भारतीय उद्योग जगत में खलबली मच गई.

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बहुत सी कंपनियों ने अपने प्रमोटरों की महिला रिश्तेदारों को नियुक्त कर दिया और 13 फ़ीसद कंपनियां समय सीमा तक भी यह नहीं कर पाईं.

एक ह्यूमन रिसोर्स कंसल्टेंसी चलाने वाले अनुराग श्रीवास्तव कहते हैं कि महिलाओं के प्रति भेदभाव पहले ही बहुत अधिक है. इंटरव्यू के दौरान महिलाओं से शादी करने या बच्चा करने के सवाल असामान्य नहीं हैं, हालांकि हो सकता है कि ये छिपे हुए ढंग से पूछे जाते हों.

अनुराग को लगता है कि मातृत्व अवकाश बढ़ने से महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह और बढ़ेगा. वह कहते हैं, "बहुत सारे मैनेजरों के साथ काम करने के बाद और उनका नज़रिया देखने के बाद मुझे भविष्य में महिलाओं के रोज़गार को लेकर चिंता हो रही है."

और मान लें कि आपको मदद करने वाले नियोक्ता और परिवार मिल भी जाते हैं तो आपको एक और मूलभूत समस्या का सामना करना पड़ता है, जब काम पर जाएं तो अपने बच्चे को कहां छोड़ें.

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हालांकि पिछले कुछ सालों में बच्चों की देखरेख करने वाली संस्थाएं काफ़ी बढ़ गई हैं. लेकिन उन्हें नियंत्रित करने वाला कोई क़ानून नहीं है.

क्रेचों को नियमित करने के लिए अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नियमावली हैं. लेकिन उनमें क्वालिटी की निगरानी बमुश्किल ही की जाती है. जो क्रेच नियमों का पालन करते भी हैं वह ज़्यादातर दंपत्तियों की जेब से बाहर होते हैं.

इसी तरह प्रशिक्षित नैनी का मिलना भी मुश्किल ही है. ज़्यादातर भारतीय घरों में ऐसी ही नौकरानियां होती हैं जिन्हें परिवार वाले ही बच्चे की देखरेख करना सिखाते हैं.

हालांकि कुछ कंपनियों ने पिछले एक-दो साल से अपने कर्मचारियों के लिए परिसर में ही क्रेच सुविधा शुरू की है. इनमें भारतीय ब्रांड गोदरेज, हिंदुस्तान यूनिलीवर और कॉस्मेटिक कंपनी लॉरीयल शामिल हैं.

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महत्वपूर्ण यह भी है कि श्रम मंत्रालय का प्रस्ताव है कि 30 से अधिक महिला कर्मचारी वाली कंपनियों के लिए कार्यालय परिसर या थोड़ी सी दूरी पर क्रेच बनाना ज़रूरी कर दिया जाए.

यह उन महिलाओं के लिए परिदृश्य बदल सकता है जो काम करना चाहती हैं. लेकिन इस प्रस्ताव का कॉरपोरेट जगत विरोध कर सकता है जिसके लिए व्यवसाय करने की लागत बढ़ जाएगी. और जैसा कि भारत में अक्सर होता है, इस प्रस्ताव को अमल में आने में सालों लग सकते हैं.

फ़िलहाल रश्मि जैसी महिलाओं के लिए यह जल्द ही हक़ीकत बनने नहीं जा रहा है.

फ़िलहाल उनकी सास उनके साथ रहने आई हैं ताकि जब वह ऑफ़िस जाएं तो आर्या की देखभाल की जा सके. रश्मि एक बाहरी शिक्षक (आउटडोर एजुकेटर) हैं.

वह बच्चों को बाहर शिविरों में ले जाती हैं, जहां उन्हें प्रकृति और वन्यजीवन के बारे में बताया जाता है. वह जानती हैं कि संतुलन बनाना आसान नहीं होगा.

वह कहती हैं, "देखते हैं, क्या होता है."

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