जिन्हें मिला 68 साल बाद वोट का हक़

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Image caption रामजतन प्रधान तो बन गए हैं, लेकिन अब भी कई अधिकार उनके पास नहीं हैं

बीते साल 2015 के खाते में यूं तो कई सियासी हलचलें दर्ज हैं, लेकिन एक बड़ी हलचल पर शायद बहुत ही कम लोगों का ध्यान गया है.

एक घटना है देश की आजादी के 68 साल बाद भी मताधिकार से वंचित एक समुदाय को वोट का अधिकार मिलना.

बात लगभग सात महीने पुरानी है जब 65 वर्षीय रामजतन 23 वन ग्रामों में रहने वाले सैकड़ों वनटांगियों के साथ 'घेरा डालो-डेरा डालो' आंदोलन में शामिल होने के लिए गोरखपुर के कमिश्नर कार्यालय पर पहुंचे थे.

आंदोलन की एक प्रमुख मांग थी कि पंचायत चुनाव में वन ग्रामों को भी शामिल किया जाए और उन्हें वोट देने का अधिकार मिले. दो दिन तक कमिश्नर कार्यालय घेरने के बाद प्रशासन ने उनकी मांग मान ली.

आजादी के 68 वर्ष बाद पहली बार गोरखपुर-महराजगंज के 23 वन ग्रामों में रहने वाले 23 हजार वनटांगियों ने पंचायत चुनाव में हिस्सा लिया.

अब रामजतन अपने गांव चंदन चाफी बरहवां के प्रधान हैं और इसके विकास की योजना बनाने में मशगूल हैं.

रामजतन का गांव बरहवां गोरखपुर से 45 किलोमीटर दूर परतावल-पनियरा मार्ग पर जंगल के बीच है. यह जंगल साखू और सागवान के हैं जिन्हें रामजतन और उनके जैसे हजारों वनटांगियों की तीन पीढ़ी ने अपने खून-पसीने से तैयार किया.

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अंग्रेजी राज में 100 वर्ष पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश में रेल लाइन बिछाने और दूसरे सरकारी विभागों के लिए इमारती लकड़ी मुहैया कराने के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए.

वन विभाग के रिकार्ड में दर्ज है कि हर वर्ष 300 एकड़ वन साफ़ किए गए.

उम्मीद थी काटे गए पेड़ों की खूंट से फिर जंगल तैयार हो जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तब अंग्रेजों ने 1920 में बर्मा (म्यांमार) में आदिवासियों द्वारा पहाड़ों पर जंगल तैयार करने के साथ-साथ खाली स्थानों पर खेती करने की पद्धति 'टोंगिया' को आजमाया.

इसके लिए बड़ी संख्या में आस-पास के इलाकों से गरीबों को लाया गया. जमींदारों के जुल्म की चक्की में पिस रहे दलित और अति पिछड़े वर्ग के ये मजदूर राहत पाने के लिए आए लेकिन यहां आकर वह शोषण के एक नए जाल में फंस गए.

अंग्रेजों ने उन्हें गुलामों की तरह रखा. यही मजदूर वनटांगिया कहलाए. रामजतन के दादा झकरी भी उन हजारों गरीब मजदूरों में से एक थे. दोनों जिलों में करीब 55 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र का अधिकांश भाग इन टांगिया किसानों की देन है.

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Image caption फ़ाइल फ़ोटो

साखू और सागवान के पेड़ तैयार करने के लिए उन्हें कोई मेहनताना नहीं दिया जाता था. दो क्यारियों के बीच की जमीन अनाज उगाने के लिए दी जाती थी.

पौधे जब बड़े हो जाते तो उन्हें दूसरे स्थानों पर भेज दिया जाता. आजादी के बाद वन विभाग 1980 तक वनटांगियों से इसी तरह काम लेता रहा.

वन निगम बनने के बाद वनटांगियों से काम लेना बंद कर दिया गया और उन्हें जंगल से बेदखल करने की कोशिश हुई लेकिन वे अपनी जमीन छोड़ कर जाने को तैयार नहीं हुए. उन्होंने संगठन बनाया और संघर्ष करते रहे.

आखिरकार वर्ष 2006 में वन अधिकार कानून (अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन अधिकारों की मान्यता कानून 2006) बनने के बाद दोनों जिलों के 4,745 टांगिया परिवारों को उनकी खेती और आवास की 1842.199 हेक्टेयर ज़मीन पर मालिकाना हक दे दिया गया.

वनटांगियों को वह सभी हक हासिल नहीं हैं जो दूसरे गांवों में रहने वाले ग्रामीणों को हैं. वनटांगियों को लोकसभा और विधानसभा में वोट देने का अधिकार 1995 में मिला. उनके गांवों में स्कूल, अस्पताल, बिजली, सड़क पानी, आंगनबाड़ी केन्द्र जैसी कोई सुविधा नहीं है.

बारिश के दिनों में कच्ची सड़कें बुरी तरह खराब हो जाती हैं और गांव से बाहर जाना मुश्किल हो जाता है.

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प्रशासनिक अधिकारी वन ग्रामों में सरकारी योजना ले जाने से इसलिए मना कर देते हैं क्योंकि उनके गांव को राजस्व गांव का दर्जा प्राप्त नहीं है.

317 टांगिया परिवार वाले बरहवां गांव को पास के एक दूसरे गांव चंदन चाफी के साथ जोड़ कर पंचायत बनाई गई. दलित रामजतन चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं रहे थे.

मुखिया भरत निषाद ने बैठक बुलाकर उन्हें चुनाव लड़ने को कहा तो वह तैयार हुए. निरक्षर रामजतन को किताब चुनाव चिन्ह मिला और वह 527 मत प्राप्त कर विजयी हुए. इसी गांव की दलित अनीता क्षेत्र पंचायत सदस्य चुनी गई हैं.

ग्राम प्रधान बनने के बाद रामजतन में ज्यादा कुछ बदलाव नहीं आया है. अब वह कुर्ते के ऊपर सदरी पहनने लगे हैं और सदरी की जेब में छोटी से डायरी रखने लगे हैं. एक मोबाइल भी ले लिया है.

उनके पास गांव के विकास की पूरी कार्ययोजना है. वह गांव की सड़क को खड़ंजा कराना चाहते हैं.

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Image caption फ़ाइल फ़ोटो

स्कूल, आंगनबाड़ी सेंटर बनवाने, गांव में बिजली लाने के साथ-साथ गांव के सभी विकलांगों, बूढ़ी महिलाओं, विधवाओं को पेंशन और इंदिरा आवास दिलाना उनके एजेंडे में है.

वह जंगली सूअर, नीलगाय और शहरों से जंगलों में छोड़ दिए गए पशुओं से फसल को बचाने का भी उपाय करना चाहते हैं लेकिन वह इस बात से परेशान हैं कि वन विभाग कह रहा है कि उनकी अनुमति के बिना वह गांव में पक्का काम नहीं करा सकते.

इसके लिए सरकार से आदेश की ज़रूरत होगी क्योंकि उनका गांव वन क्षेत्र में आता है. उनका सवाल है, "ग्राम प्रधान होने का क्या मतलब रहेगा जब वह बरहवां में स्कूल नहीं बनवा सकते? हमारे बच्चे पढ़ने के लिए कब तक तीन किलोमीटर दूर जाते रहेंगे?"

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