प्रोटोकॉल नया लेकिन हंगामा होगा वही पुराना

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शुक्रवार से शुरू होने वाला विधानमंडल का सत्र इस मायने में ऐतिहासिक होगा कि पहली बार राज्यपाल का स्वागत नए प्रोटोकॉल के तहत होगा.

दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करने के लिए इस बार राज्यपाल बाक़ायदा गाजे-बाजे के साथ आएंगे और मुख्यमंत्री अपने संसदीय कार्य मंत्री और मुख्य सचिव के साथ पोर्टिको में ही उनकी अगवानी करेंगे.

लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि इससे सदन के भीतर भी किसी ऐतिहासिक बदलाव या फिर नई व्यवस्था की उम्मीद है.

सरकार के साथ विपक्ष भी चुनावी मूड में आ चुका है. ऐसे में बुंदेलखंड में सूखा और भुखमरी, क़ानून व्यवस्था, गन्ना किसानों की समस्या के अलावा ताज़ातरीन लोकायुक्त की नियुक्ति जैसे कई मुद्दे हैं जो लगभग डेढ़ महीने तक चलने वाले इस सत्र को हंगामेदार बना सकते हैं.

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सरकार जहां लोकलुभावन बजट के साथ जनता को खुश करने की कोशिश करेगी वहीं विपक्ष सरकार की कमियां गिनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता. बहुजन समाज पार्टी नेता मायावती ने कल लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस में इसकी भलीभांति झलक दिखा दी.

बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती पिछले कुछ समय से लखनऊ में ही डेरा डाले हैं और सदन में सरकार को घेरने की पूरी रणनीति उन्हीं के नेतृत्व में बन रही है. कल दिन भर उनकी नेताओं के साथ इस बाबत बैठक होती रही.

वहीं भारतीय जनता पार्टी भी सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती. भाजपा विधायक दल के नेता सुरेश खन्ना कहते हैं कि क़ानून व्यवस्था के मामले में सरकार पूरी तरह से असफल हो चुकी है और राज्य में पुलिसकर्मी तक सुरक्षित नहीं हैं.

वहीं कांग्रेस भी इस मामले में पीछे नहीं है. कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश सिंह ने कहा कि बुंदेलखंड से लेकर लोकायुक्त की नियुक्ति तक के मामले में सरकार को सदन में घेरा जाएगा.

वहीं जानकारों का कहना है कि जिस तरह से राजनीतिक मुद्दों पर सदन के बाहर बहस और विवाद चल रहे हैं उन्हें देखते हुए लगता है कि पहले दिन से ही विवाद शुरू होगा.

अब तक घोषित कार्यक्रम के अनुसार, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बतौर वित्तमंत्री 12 फरवरी को वित्तीय वर्ष 2016- 17 का आम बजट पेश करेंगे और सत्र की अवधि 11 मार्च तक तय है.

गुरुवार को हुई सर्वदलीय बैठक में विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने सभी दलों से सदन चलाने में सहयोग की अपील की.

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लेकिन जानकारों का कहना है कि सरकार को सदन के भीतर ही नहीं सत्र के दौरान विधानसभा के बाहर होने वाले प्रदर्शनों और तमाम संगठनों की मांगों से भी निपटना होगा क्योंकि चुनावी समय में किसी भी संगठन और वर्ग की नाराज़गी उसको नुकसान भी पहुंचा सकती है.

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