'साला खड़ूस' के पंच झेल पाएंगे दर्शक!

साला खड़ूस

फ़िल्म: साला खड़ूस

निर्देशक: सुधा कोंगारा प्रसाद

अभिनेता: माधवन, रितिका सिंह

रेटिंग: **

कुछ दिनों पहले मैंने पढ़ा था कि यह फ़िल्म दो भाषाओं - हिंदी और तमिल में बनी है. तमिल में इसे 'इरुधी सुत्रु' नाम से रिलीज़ किया गया है. शायद इसीलिए पहले ही सीन से लगा कि यह फ़िल्म दक्षिण भारतीय फ़िल्म की नकल है, लेकिन ऐसा है नहीं.

मैं यह इसलिए नहीं कह रहा कि फ़िल्म में हर पात्र - 1990 की मणिरत्नम की फ़िल्म की याद दिलाते हुए- आसानी से अजीब शब्दों के साथ हिंदी बोलता है. लेकिन फ़िल्म में हाव-भाव, व्यवहार सब कुछ थोड़ा 'तमिल' सा लगता है.

फ़िल्म का ज़्यादातर हिस्सा चेन्नई में फ़िल्माया गया है. फ़िल्म में माधवन एक तमिल अभिनेता की तरह ही लगते हैं. वे एक दाढ़ी वाले बॉक्सिंग कोच का भूमिका में हैं जो महिलाओं को बॉक्सिंग सिखाते हैं. एक बार राष्ट्रीय स्तर खेलों में ग़लत कारणों से अपमान सहने के बाद वे अपने आप को साबित करने की ज़िद में हैं.

उनके साथ हैं युवा अभिनेत्री रितिका सिंह, जो मछली बेचने वाली महिलाओं की कॉलोनी में रहती हैं. माधवन उन्हें देखते हैं और उन्हें एक विश्व स्तर की बॉक्सिंग खिलाड़ी बनाना चाहते हैं. लेकिन रितिका ज़िद्दी हैं और कुछ सीखना नहीं चाहतीं. लेकिन कोच पक्के इरादे के हैं जो काम लेना जानते हैं, उन्हें 'ना' सुनना ही नहीं है.

अपनी-अपनी भूमिकाओं के लिए दोनों अभिनेताओं ने कड़ी मेहनत की है और अपने किरदार में वे बख़ूबी जंचते भी हैं. रितिका पहले से ही मार्शल आर्ट और किक बॉक्सिंग जानती हैं. उन्होंने यह सीखा होगा. दूसरी ओर माधवन ने मोटा, कड़े तेवर और एक पूर्व बॉक्सिंग खिलाड़ी की तरह दिखने के लिए काफ़ी मेहतन की होगी.

अगर आप फ़िल्म 'चक दे इंडिया' के बारे में सोच रहे हैं तो आप सही सोच रहे हैं. लेकिन इसके साथ अाप खेलों और डांस पर आधारित सैकड़ों उन फ़िल्मों के बारे में भी विचार करें - क्योंकि इनमें हारते-हारते जीत जाने की कहानी होती है.

ऐसी फ़िल्मों में एक ख़ास समस्या ये होती है कि आप फ़िल्म ख़त्म होने से काफ़ी पहले यह कह सकते हैं कि कहानी किस दिशा में जा रही है. 'साला खड़ूस' भी कुछ अलग नहीं है.

इसके बावजूद इसमें आपको मज़ा आता है. पूरी फ़िल्म क्लाइमैक्स के इर्द-गिर्द होती है, और इस फ़िल्म में यह भाग बेहतर तरीके से दिखाया गया है. काश कि पूरी फ़िल्म भी इतनी सधी और सरल होती.

सिखाने वाले ज़िद्दी कोच और न सीखने वाले ज़िद्दी खिलाड़ी के बीच की खींच-तान के साथ इसमें है - युवा बॉक्सर और उसकी बहन के बीच के झगड़े, परिवार में माता-पिता और बच्चों के बीच की समस्याएं- कोच और उसके बॉस और उसके साथ खेल रहे अन्य लोगों के बीच की राजनीति और स्पोर्ट्स फेडेरेशन में शारीरिक शोषण की राजनीति.

बॉक्सिंग का एक पाठ जो मैंने सीखा वो है कि चार तरह के पंच होते हैं - जैब, क्रॉस, हुक और अपर कट,. लेकिन फ़िल्म में इतने तरीक़े के पंच हैं कि इस सबके बाद आप चाहेंगे कि आप थिएटर के बाहर निकल जाएं.

इस सबके बावजूद दर्शकों को एक और समस्या से जूझना पड़ेगा - वे पहले ही 'मैरी कॉम' की कहानी देख चुके हैं, जो महिला बॉक्सिंग के बारे में अब तक की सबसे बड़ी कहानी है.

फ़िल्म के निर्माता राजकुमार हिरानी हैं. मुझे पता है कि 'पीके' के साथ भी उन्हें ऐसी ही समस्या का सामना करना पड़ा होगा, क्योंकि उससे पहले दर्शक उसी विषय पर 'ओ माय गॉड' देख चुके थे. इसके बावजूद वे आमिर ख़ान के साथ मिलकर दर्शकों को हंसाने में क़ामयाब हुए.

मुझे पक्का नहीं पता कहीं 'मैरी कॉम' ही वह वजह तो नहीं जिस कारण यह फ़िल्म अलग-अलग दिशा में भागती है. लेकिन फ़िल्म का मूल मुद्दा जाना पहचाना है और फ़िल्म विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में जीत की तरफ ही बढ़ती जाती है.

और हां, वह कहानी भी क्या कहानी जो आपको सच की तरह न लगे और आपको यह न महसूस करा दे कि आपके नज़दीक ही किसी रिंग में बॉक्सिंग का मैच चल रहा है.

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