अमित शाह पर मोदी को कितना भरोसा है?

  • 31 जनवरी 2016
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सितंबर, 2009 की बात है. अमित शाह गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन का अध्यक्ष बनने के लिए संबंधित फॉर्मों पर हस्ताक्षर करने जा रहे थे.

उनके साथ कार में तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे. जब वो एसोसिएशन दफ़्तर के नज़दीक पहुँचे तो, कहा जाता है कि मोदी का मन बदला और उन्होंने शाह को कहा, “नहीं यार, हुंज बानू” (मुझे लगता है कि ये पद मुझे लेना चाहिए).

अंतिम क्षणों में मोदी गुजरात क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बने और हमेशा की तरह वफ़ादार शाह को इससे कोई मुश्किल नहीं थी. कांग्रेस के पास शाह जैसा कोई आदमी नहीं था.

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शाह निष्ठावान भी हैं और दक्ष भी. मोदी को उन पर इतना भरोसा है कि उन्हें उन्होंने पार्टी प्रमुख बनाया है. राजनीतिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी में शाह ही असली नंबर दो हैं.

24 जनवरी को शाह एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष चुने गए और अगले तीन साल तक इसी पद पर रहेंगे.

इस बीच उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, केरल और तमिलनाडु जैसे अहम राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान शाह पार्टी का नेतृत्व करेंगे.

इनमें से कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी ख़ुद को मज़बूत करने में जुटी है. और जैसा दलित नेता कांशीराम ने एक बार कहा था कि चुनाव ही वह समय है, जब कोई पार्टी बढ़ सकती है या फल-फूल सकती है.

मुझे लगता है कि चुनावी तौर पर साल 2016 शाह के लिए और पार्टी के लिए अच्छा साबित होगा.

मीडिया को लगा था कि साल 2015 भारतीय जनता पार्टी के लिए अच्छा साल नहीं था. दिल्ली में उसे आम आदमी पार्टी ने बुरी तरह हराया तो बिहार में जनता दल (यू)-आरजेडी से उसे अप्रत्याशित रूप से बड़े अंतर से हारना पड़ा.

अगर इससे शाह का आत्मविश्वास डिगा होगा तो उन्होंने इसे जाहिर नहीं होने दिया. यह ठीक भी है. दोनों राज्यों में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी ने वोट बैंक को बरक़रार रखा.

दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी अरविंद केजरीवाल के करिश्मे से हारी, जबकि बिहार में सभी विरोधी पार्टियों की एकजुटता के चलते उसे हारना पड़ा.

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गुजरात में भी, जहां कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी और आरक्षण को लेकर पाटीदार समुदाय के विरोध के बावजूद पार्टी ने भारत के सबसे बड़े शहरीकरण वाले राज्य के सभी प्रमुख शहर अपने पास बनाए रखे.

अब भी भारतीय जनता पार्टी फ़ायदे में दिख रही है. इसकी एक वजह अमित शाह की प्रतिभा है. वह बेहतरीन संगठनकर्ता हैं और अपनी रणनीति ज़मीनी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर बनाते हैं.

कहते हैं कि बराक ओबामा 2008 में राष्ट्रपति पद का चुनाव 'ज़मीनी खेल' के चलते ही जीत सके थे. इसका मतलब उम्मीदवार की प्रतिभा के बजाय उसका संचालन और अभियान से है. यह कड़ी मेहनत और योजना का काम है.

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अमित शाह इसमें खासे निपुण हैं. वह कारोबारी पृष्ठभूमि वाले जैन परिवार से हैं. भारी भरकम काया और समृद्ध दिखने वाले शाह गुजरात के आम मध्यवर्गीय परिवारों की तरह ही हिंदुत्ववादी हैं.

उनकी छवि मोदी की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक जैसी नहीं है. इसके बावजूद वे अपने लक्ष्य के प्रति किसी स्वयंसेवक की तरह ही प्रतिबद्ध रहते हैं. उनकी कारोबारी पृष्ठभूमि उन्हें चीज़ों को ज़्यादा साफ़ और व्यवहारिक तौर पर देखने में मदद करती है.

उनके पार्टी अध्यक्ष चुने जाने के बाद घोषणा की गई कि अध्यक्ष का पद संभालने के बाद बीते डेढ़ साल में वह पार्टी को खड़ा करने और मज़बूती देने के लिए औसतन रोज़ 500 किलोमीटर यात्रा कर चुके थे.

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कांग्रेस में किसी के अपनी पहल पर ऐसा करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती लेकिन शाह लगातार यह कर रहे हैं.

कुछ महीने पहले मैं अहमदाबाद में था. मैंने वहां पाया कि पार्टी का सदस्यता अभियान जारी है और मिस्ड कॉल्स के ज़रिए डाटाबेस बन रहा है. यह तब है, जब वहां कांग्रेस के जीतने की कोई संभावना नहीं है.

जब मैं 11 साल पहले अहमदाबाद में काम करता था, तब मुझे शाह से बातचीत का मौक़ा मिला था. वह मीडिया के प्रति अविश्वास रखने वाले कठोर व्यक्ति हैं. जहां तक मैं जानता हूँ, उसके मुताबिक़ केवल शीला भट्ट को रेडिफ़ और इंडियन एक्सप्रेस के लिए उनसे साक्षात्कार मिलता रहा है.

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उनके धीरज से भरे इंटरव्यू और जुझारू अंदाज़ में पूछे गए सवालों से हमेशा नई जानकारी मिलती है.

मुझे लगता है कि शायद उन्हें ही इंटरव्यू करने का मौक़ा इसलिए मिलता है क्योंकि वह गुजराती बोल सकती हैं, जिसमें शाह सबसे सहज हैं.

शाह को प्रभारी बनाकर मोदी ने यह तय कर दिया है वे अपनी चुनावी रणनीति को लालकृष्ण आडवाणी जैसे असंतुष्टों के दख़ल के बिना चला सकते हैं.

यह साझेदारी प्रभावी और सार्थक भी है. आडवाणी-वाजपेयी की जोड़ी के उलट इसमें बहुत साफ़ है कि नंबर वन कौन है.

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यह देखना दिलचस्प होगा कि शाह 2016 के बड़े चुनावों में कैसी रणनीति बनाते हैं, ताकि मोदी को राज्यसभा में भी बहुमत मिल सके.

मैंने गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन से कहानी शुरू की थी, तो इसे वहीं ख़त्म करूंगा. उस घटना के 5 साल बाद 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और गुजरात क्रिकेट संघ के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

उसके नए अध्यक्ष थे-अमित शाह.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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