'सौ दिन रोज़गार से परिवार नहीं चलता पर'

  • 2 फरवरी 2016
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महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को शुरू हुए मंगलवार को 10 साल पूरे हो गए. इससे जुड़े कुछ अनुभव खट्टे हैं, कुछ मीठे.

मनरेगा को लांच करने के वक़्त कई तरह की आशंकाएं जताई गई थीं लेकिन कार्यक्रम ने कई नई चीज़ें कर दिखाई हैं.

कार्यक्रम ने यह साबित कर दिया कि इससे ग्रामीण भारत में बहुत बड़ा फ़र्क़ आ सकता है.

दूसरी अहम बात: योजना भारतीय अर्थव्यवस्था को डूबोएगा नहीं, बल्कि उसकी मदद करेगा. कई अर्थशास्त्री कह रहे थे कि इस योजना पर दो-तीन लाख करोड़ रुपए खर्च हो जाएंगे और पैसा व्यर्थ जाएगा.

तीसरी इसने दलितों, महिलाओं और भूमिहीनों की काफी मदद की. लेकिन सबसे बड़ी बात ये हुई कि कुछ हद तक इसने मार्किट मैकेनिज्म की तरह काम किया.

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जिन लोगों को मजदूरी मिल रही थी या नहीं भी मिल रही थी, तब भी उसका बड़ा असर था, क्योंकि लोगों को मोलभाव करने की शक्ति मिली और उन्होंने कहा कि कम मज़दूरी में काम करने नहीं आएंगे.

मनरेगा के कुछ खट्टे अनुभव भी हैं. मनरेगा के शुरू होने के बाद ही इसके पैसे रोके जाने लगे. जो खर्चा 2010-2011 में था, वही आज भी है, जबकि महंगाई बहुत बढ़ गई है.

साल 2014-2015 तो मनरेगा के लिए काफी मुश्किलों वाला साल था, उसे ख़त्म होने की कगार पर पहुंचा दिया गया. लेकिन इस साल थोड़ी स्थिति बेहतर हुई है. पिछले साल से काफी बेहतर.

पैसे जारी हुए हैं, तो मनरेगा चलने लगा है. लेकिन अभी तक पूरी तरह ठीक से चलना नहीं हो पाया है. मुझे लगता है कि मनरेगा में कुछ चीज़ें और हो सकती थीं, जो नहीं हो पाईं.

लेकिन मनरेगा ने विकास के कार्यक्रमों में कुछ चीज़ें स्थापित की हैं. एक-एक पाई का हिसाब इसका वेबसाइट पर है. चोरी भी हुई है, लेकिन चोरी पकड़ी भी गई है. इस कार्यक्रम में सोशल ऑडिट की व्यवस्था भी है, जो किसी दूसरे कार्यक्रम में नहीं है.

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हालांकि इसको लेकर दो आलोचनाएं भी हैं, जो अपनी जगह सही भी हैं. पहली आलोचना तो यही है कि इसमें अधिकतम सौ दिन का रोजगार मिलता है. सौ दिन के रोजगार से पूरा परिवार तो चल नहीं सकता है.

लेकिन यह तब काम आता है, जब कोई दूसरा काम नहीं मिल रहा हो. इसने महिलाओं का पलायन रोका है. महिलाओं के रुकने से बच्चे घर पर रहते हैं, स्कूल भी जा पाते हैं और घरों का सुधार भी होता है.

दूसरी आलोचना ये होती है कि मनरेगा में लोगों से ठीक तरह से काम नहीं लिया जा रहा है. दरअसल, अलग-अलग ज़िलों में जिलाधिकारी के फ़ैसलों के मुताबिक़ इसका डिज़ाइन तैयार होता है. एक सकंट ये भी है कि मनरेगा के मज़दूरों की कहीं सुनी नहीं जाती है.

हालांकि जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार आई तो ऐसा लगा कि ये लोग कार्यक्रम खत्म ही कर देंगे. प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अपने भाषण में इसे पिछली सरकार की विफलताओं का स्मारक कहा था.

लेकिन अब जिस तरह से सरकार के प्रति ग्रामीण इलाकों में नाराजगी बढ़ रही है, जगह-जगह सरकार के सामने संकट बढ़ रहा है. इस संकट को मनरेगा कम कर सकता है. जब-जब आर्थिक बाज़ार डूबता है, तब-तब मनरेगा बहुत काम आता है.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)

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